The Token System141 / 1154

The Token System – Chapter 141

7 min read November 6, 2026

"कौन सी बात?"

"कि आज रीना की शादी की बात है।" लालाजी ने हाथ से मुँह छिपाया। "बस यही।"

आँगन में सन्नाटा था। माँ दहलीज़ पर खड़ी थी और उनके हाथ में मेरी तरफ़ बढ़ाया हुआ एक कप था, जो अब भी वहीं था। रीना अंदर गई और वापस नहीं आई।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। टोकन गरम हो रहा था — एक तेज़ गरमाहट, जैसे किसी ने जेब में अंगारा रख दिया हो।

और फिर मैंने रीना का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनी।

वो आँगन में आई। उसने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और मेरी तरफ़ चलकर आई।

"भाई," उसने कहा, और आवाज़ शांत थी। "तेरे हाथ में वो क्या है?"

मैंने हाथ जेब से बाहर निकाला। मुट्ठी खोली। टोकन वहीं था।

रीना ने उसकी तरफ़ देखा, और फिर उसके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। "इसी से सब चल रहा है, है ना? ये गरम हो रहा है जब भी कुछ होने वाला होता है। मैं देखती आ रही हूँ, भाई। तीन महीने से।"

"रीना —"

"मैंने आज तक तुझसे नहीं पूछा। आज पूछ रही हूँ — जो कुछ भी चल रहा है, उससे मेरा आज का दिन टूटा है या नहीं?"

मैंने सच बोला। "हाँ।"

वो एक पल के लिए रुकी, और फिर बोली, "तो जो भी है — बताने का वक़्त आ गया ना?"

मैंने टोकन जेब में रखा। "अभी नहीं। शाम को। सुनीता से मिलने के बाद। और उसके बाद — तुझे सब बताऊँगा। माँ के सामने।"

रीना ने देर तक मेरी तरफ़ देखा। फिर बोली, "शाम को मैं भी चलूँगी। सुनीता से मिलने।" और वो मुड़कर अंदर चली गई।

लालाजी अभी भी आँगन में बैठा था, सिर हाथों में। मैंने उसके सामने खड़े होकर कहा, "उठिए। मुंशी की कॉपी, फ़ोन नंबर, सब लिखकर दीजिए। आज शाम तक।"

वो सिर उठाकर मेरी तरफ़ देखने लगा।

"और लालाजी, अगर आपके बेटे अंकित की बात मानी होती, तो आज ये दिन नहीं आता। अंकित ने आपको रोका था, है ना?"

लालाजी की आँखें भर आईं।

मैं आँगन से बाहर निकलकर गली की उस सफ़ेद गाड़ी की तरफ़ बढ़ा। पर वो जा चुकी थी। मोड़ पर सिर्फ़ पीली धूल बैठी थी।

मैंने घड़ी देखी — एक बजे थे। चार बजे सुनीता से मिलना था। और उसके बाद, उसी रात, हवेली के सामने तीनों हिस्से खड़े होना थे।

जेब में टोकन गरम था, पर मैंने उसे नहीं निकाला।

माँ ने पीछे से आवाज़ दी — "चाय बना दूँ?"

और मैं आँगन में खड़ा रहा, ये सोचते हुए कि किसी ने आज रीना का दिन नहीं, बल्कि मेरा हिसाब चुराने की कोशिश की है — और वो हिसाब अब सिर्फ़ टोकन का नहीं, इस घर का भी हो चुका है।

॥

मैंने मुट्ठी खोली। टोकन हथेली पर रखा था — पीतल का वो पुराना सिक्का, जिसकी लकीरें उँगली के नीचे दबी थीं। पर आज वो सिक्का नहीं था, आज वो एक अंगारा था। इतना गरम कि मेरी हथेली की खाल जलने लगी और मैंने झटके से हाथ पीछे खींच लिया।

टोकन नीचे आँगन की मिट्टी पर गिरा। एक बार उछला, दो बार घूमा, और फिर सीधा रीना के पैरों के पास जाकर रुका।

रीना ने उसे देखा। देर तक देखा। फिर वो नीचे झुकी, उँगली बढ़ाई — और जैसे ही उसका अंगूठा टोकन से लगा, वो पीछे हट गई।

"ये तो गरम है," उसने कहा।

"रीना, इसे मत —"

"भाई, ये तो पापा वाली चीज़ है।"

आँगन में हवा रुक गई। मेरे पीछे माँ की चूड़ियों की आवाज़ आई, जो अभी भी चाय का कप लिए दहलीज़ पर खड़ी थी। वो कप उसके हाथ में काँपा, चाय का एक कतरा उँगली पर गिरा, पर उसने कप नीचे नहीं रखा। उसने बस आँखें मूँद लीं।

"रीना," माँ ने कहा, और आवाज़ कहीं दूर से आ रही थी। "अंदर चल। लड़के वाले बैठे हैं।"

रीना ने मेरी तरफ़ देखा। फिर टोकन की तरफ़। फिर माँ की तरफ़। उसके चेहरे पर वो भाव आया जो मैं जानता था — वो भाव जो आता था जब वो किसी बात को समझ नहीं पाती थी पर सवाल पूछने का वक़्त नहीं होता था।

वो अंदर चली गई।

माँ ने कप रखा और मेरे पास आई। उसने टोकन उठाया — धोती से पोंछा, हाथ में दबाया, और मेरी जेब में खुद डाल दिया। "मुँह साफ़ कर," उसने धीमे से कहा। "जो चला गया है उसे भूलता है। जो बैठा है उससे बात करता है।"

"माँ —"

"पहले बैठा हुआ। बाद में हिसाब।"

मैं रामावत जी के पास गया। वो अभी भी चारपाई के किनारे बैठे थे, हाथ में वो काग़ज़, जो काले कुर्ते वाले ने दिया था। उनका बेटा आकाश पास में खड़ा था, आँखें नीची किए। लालाजी दरवाज़े से सटकर बैठा था।

"रामावत जी," मैंने कहा और उनके सामने बैठ गया। "आपने आते वक़्त कहा था, बात अच्छी चल रही थी। अब लौटते वक़्त आपके हाथ में एक काग़ज़ है। मैं नहीं पूछूँगा कि उस पर क्या लिखा है। बस एक बात पूछूँगा — जो भी वो आदमी आपको दे गया, वो मेरी बहन के बारे में है या मेरे बारे में?"

रामावत जी ने काग़ज़ मोड़ा। "मनोहर जी, हम आज यहाँ रिश्ता देखने आए थे। अब लगता है हमें अपने घर जाकर सोचना चाहिए।"

"सोचिए।" मैंने कहा। "पर सोचते वक़्त एक बात याद रखिएगा। जो आदमी आपको गली के मोड़ पर मिला, उसने आपको रोका क्यों? अगर उसके पास सच होता, तो वो हमारे सामने आता। सच वाले को छिपने की ज़रूरत नहीं होती।"

आकाश ने अचानक सिर उठाया। "पापा, ये बात सही है।"

"चुप बैठ," रामावत जी ने कहा। पर उनकी आवाज़ में वो करच थी जो अब टूट रही थी।

वो उठे। माँ ने उन्हें दहलीज़ तक छोड़ा। रामावत जी ने जाते-जाते माँ की तरफ़ देखा और कहा, "बहन जी, आपने चाय अच्छी बनाई।" बस इतना। और वो चले गए। आकाश ने पीछे मुड़कर मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो किसी बाप के दबाव में बेटे के पास होती है — शर्म और ज़िद, दोनों एक साथ।

आँगन अब खाली था। लालाजी उठकर बोले, "मैं चलूँ?"

"आप रुकिए," मैंने कहा। "मुंशी का नंबर और वो कॉपी — शाम तक। पर पहले घर जाकर अंकित से बात कीजिए। वो जो भी कहे, सुनिए। आज आपने अपना नहीं, उसका नहीं — सबका नुक़सान किया है।"

लालाजी ने कोई जवाब नहीं दिया। वो सिर झुकाए चला गया।

माँ सीढ़ी के पास गई और दीवार से टिक गई। मैंने सोचा वो थक गई है। पर वो थकी नहीं थी। वो हम दोनों को अकेला छोड़ना चाहती थी।

रीना दरवाज़े पर आई। उसने आँचल जकड़ा हुआ था, और उसकी आँखें लाल थीं।

"कब से?" उसने पूछा।

"रीना —"

"सीधा जवाब दे भाई। कब से?"

"छह महीने," मैंने कहा। "पहली बार जब वो मेरे पास आया, मैंने सोचा था मज़ाक है। बंसी की दुकान पर एक काग़ज़ मिला था — किसी ने जेब में डाल दिया था। उस पर एक काम लिखा था। मैंने वो काम किया, और उसके आने वाले रोज़ —" मैं रुक गया।

"और वो आता रहा?" रीना की आवाज़ सपाट थी।

"हाँ।"

"और तूने माँ को बताया?"

"नहीं।"

"मुझे?"

"नहीं।"

रीना ने एक कदम आगे बढ़ाया। फिर वो मेरे सामने खड़ी हो गई, और उसकी आवाज़ पहली बार ऊँची हुई। "छह महीने, भाई। छह महीने तू सुबह उठता था, अस्पताल जाता था, आता था, और मैं तेरे चेहरे पर वो थकान देखती थी जो अस्पताल की नहीं थी। मैंने सोचा शिफ़्ट की मार है। मैंने सोचा छोटू के माँ का तनाव है। मैंने सोचा —" उसकी आवाज़ टूटी, फिर वो फिर सँभली। "और आज, जब लड़के वाले बैठे थे, तेरी जेब से वो चीज़ गरम होकर निकली और मेरे सामने गिरी। तूने देखा था ना? तूने देखा था कि वो कितनी गरम थी?"

"देखा था।"

"तो तूने मुझसे क्यों छिपाया?"

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