The Token System – Chapter 142
"क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तू —" मैंने जेब में हाथ डाला, टोकन निकाला। अब वो सामान्य था, ठंडा, बस पीतल सा भारी। "क्योंकि ये चीज़ मुझे नहीं पता कि क्या है। मैं सिर्फ़ ये जानता हूँ कि जब ये बोलती है, तब मुझे जाना होता है। और जब मैं जाता हूँ, तब किसी की मदद होती है, पर किसी का कुछ और भी होता है — जो मैं अभी तक पूरा नहीं समझ पाया।"
"पापा की चीज़ है," रीना ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "माँ ने कहा। ये पापा वाली चीज़ है। मतलब पापा भी —"
"पापा भी इसी में थे," मैंने कहा। "और पापा इसी में —" मैंने अपना मुँह बंद कर लिया। माँ ने कहा था, पहले बैठा हुआ, बाद में हिसाब। पर मैंने आधी बात बोल दी थी।
रीना ठिठक गई। "क्या बोला तूने?"
तभी मेरे कान में एक आवाज़ आई।
पहले मैंने सोचा हवा है। पर वो हवा नहीं थी। वो शब्द थे, धीमे, जैसे किसी ने मेरे कान के बिल्कुल पास खड़े होकर फुसफुसाया हो। "मोहल्ला। एक छत। बारिश।"
मैंने रीना की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी। मुझे पता चला वो कुछ पूछ रही है, पर मैं सुन नहीं रहा था। मैं सिर्फ़ उस आवाज़ को सुन रहा था।
मैं उठा और खिड़की के पास गया। बाहर आसमान काला था। दोपहर के तीन बजे थे, पर आसमान ऐसा था जैसे शाम ढल गई हो। और फिर खिड़की के शीशे पर एक बूँद गिरी। सूखी मिट्टी पर गिरी और उसने एक छोटा सा धब्बा बना दिया। फिर दूसरी। फिर तीसरी।
मैंने टोकन जेब में रखा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
रीना ने रास्ता रोका। "कहाँ?"
"बाहर।"
"क्यों?"
"रीना, अभी —"
"अभी क्या? भाई, तूने अभी-अभी मुझे बताया कि तेरे पास एक चीज़ है जो पापा की थी, जो गरम होती है, जो तुझे कहीं भेजती है — और तू अभी चला जा रहा है? तू मुझे आधी बात बताकर छोड़कर जा रहा है?"
"हाँ," मैंने कहा। "क्योंकि अगर मैं नहीं गया, तो कुछ ऐसा हो जाएगा जो मैं बाद में ठीक नहीं कर पाऊँगा।"
रीना मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने रास्ता छोड़ दिया। "जा," उसने कहा। "पर लौटकर जवाब देगा। और भाई — आज शाम सुनीता से मिलने मैं भी चलूँगी, ये तय है।"
मैंने सिर हिलाया।
माँ दहलीज़ पर खड़ी थी। उसने कुछ नहीं कहा। बस मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया और मेरे कंधे पर हाथ रखा। उसका हाथ ठंडा था, पर उसमें वो ताक़त थी जो सिर्फ़ माँओं के हाथ में होती है। "जो भी हो," उसने कहा, "होने दे। हम यहाँ हैं।"
मैं गली में निकला। बारिश अब तेज़ हो रही थी। मिट्टी की खुशबू उठ रही थी, और वो खुशबू मुझे बचपन में ले गई — जब हम छत पर सोते थे और माँ कहती थी, "बारिश के पहले मिट्टी की खुशबू आती है, इसे पहचान।"
मैंने मोहल्ले की तरफ़ देखा। टोकन ने कहा था — मोहल्ला, एक छत, बारिश। कौन सी छत?
मैंने बंसी की दुकान की तरफ़ चलना शुरू किया। पर जैसे ही मैंने दो कदम बढ़ाए, दूर से आवाज़ आई।
"छोटू! छोटू कहाँ है रे!"
काकी की आवाज़ थी। वो इतनी दूर से इतनी ऊँची आवाज़ में कैसे चिल्ला रही थी, मैं समझ नहीं पाया। मैंने रुककर सुना। बारिश की आवाज़ में काकी की आवाज़ मिल रही थी — और उसमें जो डर था, वो मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन खींच ले गया।
मैं दौड़ पड़ा।
बंसी की दुकान पर काकी खड़ी थी, उसके सिर पर कुछ नहीं था — न दुपट्टा, न छाता। बारिश उसके सफ़ेद बालों को पोंछ रही थी और वो किसी को नहीं देख रही थी, बस गली की तरफ़ देख रही थी।
"काकी!" मैंने दौड़कर उसका कंधा पकड़ा। "क्या हुआ? छोटू कहाँ है?"
"मैंने उसे सुबह स्कूल भेजा था," काकी ने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी। "दोपहर को लौटना था। लौटा नहीं। मैंने सोचा मास्टर जी ने रोक लिया होगा। मैं गई स्कूल — वहाँ कहा कि वो आज आया ही नहीं। दो बजे से मैं पूरे मोहल्ले में ढूँढ रही हूँ। कोई कुछ नहीं बोल रहा। कोई कुछ नहीं बोल रहा!"
बंसी दुकान के अंदर से निकला, हाथ में एक छोटी दरी थी। उसने काकी के कंधों पर डाल दी। "काकी, शांत हो। छोटू कहीं खेलने गया होगा —"
"छोटू खेलने नहीं जाता!" काकी ने बंसी की तरफ़ पलटकर कहा। "वो दस साल का है पर उसके दिमाग़ में साठ साल का आदमी बैठा है। वो बिना बताए कहीं नहीं जाता। वो —" उसकी आवाज़ रुक गई। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। "तूने उसे कहीं भेजा है?"
"मैंने नहीं, काकी।"
"तो कौन ले गया उसे? वो सफ़ेद गाड़ी वाले? वो —"
"काकी, रुको।" मैंने उसके दोनों हाथ पकड़ लिए। हाथ ठंडे थे, बारिश से भीगे। "मैं ढूँढता हूँ उसे। पर तुम्हें घर जाना होगा। ऐसे बारिश में —"
"मैं घर नहीं जाऊँगी।"
"काकी —"
"मैं घर नहीं जाऊँगी!" उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो सिर्फ़ उस उमर में आती है जब इंसान जानता है कि माँगने के लिए कुछ नहीं बचा। "मेरा बेटा गया, मेरा बेटा आया, मेरा पोता — वो मेरा आख़िरी है। तू समझता है मैं बैठकर चाय पीऊँगी?"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो बात थी जो वो बोल नहीं रहा था — काकी को कुछ पता चल गया तो बात बिगड़ेगी।
"काकी," मैंने कहा, "तुम मेरे घर चलो। माँ है वहाँ। रीना है। मैं वादा करता हूँ — सूरज डूबने से पहले छोटू घर होगा।"
"तू वादा करता है?"
"हाँ।"
काकी ने देर तक मेरी तरफ़ देखा। बारिश उसके चेहरे पर गिर रही थी और उसके गालों पर बह रही थी, और उनमें कितना पानी था और कितने आँसू, मैं नहीं बता सकता था।
"अगर नहीं लाया," उसने कहा, "तो मेरे पास कुछ नहीं बचेगा।"
उसके जाने के बाद बंसी ने धीमे से कहा, "मन्नू, छोटू के स्कूल के पीछे एक आदमी को देखा गया है। सफ़ेद कुर्ता, पतला। उसने किसी बच्चे से कुछ पूछा था — छोटू का पता।"
"कब?"
"आज सुबह। स्कूल खुलने से पहले।"
मेरे हाथों की मुट्ठी अपने आप बंध गई। टोकन जेब में था, और अब वो गरम नहीं था। ठंडा था। बिल्कुल ठंडा। जैसे वो भी जानता हो कि अब काम सिर्फ़ टोकन का नहीं, मेरा भी है।
"बंसी, तू दुकान पर रुक। जो भी आए, उसे बता — छोटू मिल गया है। पर मिला नहीं है। समझा? जो पूछे, उलटा सवाल कर।"
"तू कहाँ जा रहा है?"
मैंने ऊपर आसमान की तरफ़ देखा। बारिश तेज़ थी, और बादल काले थे। पर टोकन ने कहा था — एक छत। कौन सी छत? मोहल्ले में वो एक छत मैं जानता था जहाँ हर गली से देखा जा सकता था। जहाँ से पूरे मोहल्ले का नक्शा सामने रखा होता था।
"काकी के घर की छत," मैंने कहा। "छोटू वहीं जाता है जब डरता है। वो छत पर जाकर आसमान देखता है — काकी ने एक बार बताया था। अगर वो कहीं छिपा है, तो वहीं होगा।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "पर वहाँ तो हमने ढूँढा था —"
"तूने ढूँढा था। मैंने नहीं। और छोटू किसी को दिखता नहीं जिसे वो जानता न हो। वो अजनबियों से छिपता है।"
मैं भागा।
काकी के घर की गली संकरी थी। बारिश की वजह से कीचड़ हो गया था, और मेरी चप्पल दो बार उलझी। पर मैं रुका नहीं।
घर का दरवाज़ा खुला था — काकी भागते वक़्त बंद करना भूल गई थी। मैंने अंदर देखा। कमरा खाली था। चारपाई पर काकी की साड़ी पड़ी थी, और चूल्हे पर एक बर्तन रखा था जिसमें दाल जल चुकी थी। जले हुए दाल की बदबू पूरे कमरे में फैली थी।
मैं सीढ़ी की तरफ़ बढ़ा। पत्थर की सीढ़ियाँ थीं, और बारिश में वो रपट रही थीं। मैं ऊपर चढ़ा, हाथ दीवार पर टिकाया।
छत पर पहुँचकर मैंने देखा — कोई नहीं था।
बस एक टूटा मटका था, कुछ बिखरे कपड़े, और छत के उस कोने में एक टिन का शेड था जिसके नीचे सूखी जगह थी।
मैं शेड की तरफ़ बढ़ा। मेरे कदमों की आवाज़ बारिश में दब रही थी। और जैसे ही मैंने शेड के नीचे झाँका, मुझे एक जोड़ी आँखें दिखीं।
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