The Token System – Chapter 140
सुबह सात बजे रीना ने मेरी चादर खींच दी।
"उठ, भाई। लड़के वाले आज आ रहे हैं, दोपहर बारह बजे। माँ ने पकौड़े का आटा गूंद लिया है।"
मैं उठकर बैठा, आँख मलते हुए। "सुनीता से मिलने —"
"वो बाद में," रीना ने कहा, और सामने आकर खड़ी हो गई। "पहले एक वादा कर। आज कोई काग़ज़ नहीं, कोई वकालत नहीं, कोई पुरानी बात नहीं। जो आएगा, उसे यही दिखेगा कि ये घर सीधा-सादा है और यहाँ कोई बड़ी लड़ाई नहीं चल रही।"
"रीना —"
"वादा कर।"
"हाँ, करता हूँ।"
वो मुस्कुराई और चली गई। मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन वहीं था, ठंडा नहीं था — हल्का गरम तो था, पर मैंने हाथ निकाल लिया और उसे जाने दिया। आज वो कुछ नहीं कहेगा, मुझे उम्मीद थी।
दस बजे बंसी की दुकान पर गया। आग से जली दुकान का शटर आधा खुला था, और वो अंदर एक कोने में बैठकर खाली केतली रगड़ रहा था।
"बंसी —"
"आज तेरे घर लड़के वाले हैं, न?" उसने सिर उठाए बिना कहा। "दुकान नहीं खुलेगी तो क्या, मैं आ रहा हूँ। तीन बजे।"
"तुझे किसने बताया?"
"रीना ने। रात फ़ोन किया था। कहा — भाई ज़्यादा बोलता है, तू आकर कुछ हँसी की बातें करना।"
मैं मुस्कुरा दिया। "और सुनीता?"
"चार बजे के बाद। दोपहर को अस्पताल में सफ़ाई वाली औरतों की शिफ़्ट बदलती है, तब वो बाहर आती है।" उसने केतली रखी। "पर एक बात, मन्नू — आज लड़के वालों के सामने तेरा चेहरा ऐसा नहीं होना चाहिए जैसा अभी है। अंधेरे में जागा हुआ आदमी दिख रहा है।"
वो सही था।
बारह बजे से पहले घर आकर मैंने नहाया, साफ़ कुर्ता पहना, और आँगन में चारपाई बिछवा दी। माँ ने पकौड़े सामने रखे। रीना साड़ी पहनकर आई, और एक पल के लिए मुझे लगा कि कुछ साल पहले की रीना सामने खड़ी है।
ठीक बारह बजे लालाजी आया, साथ में एक गोल चेहरे वाला आदमी और एक दुबला-पतला लड़का, जो सबसे पीछे खड़ा था। लड़का आँखें नीची किए हुए आया, सिर्फ़ एक बार रीना की तरफ़ देखा, और फिर ज़मीन की तरफ़।
लालाजी ने हाथ जोड़कर कहा, "ये रामावत जी हैं, और ये उनका बेटा आकाश।"
रामावत जी ने हाथ बढ़ाया। मैंने मिलाया। उनकी हथेली गरम थी, और हाथ में एक मोटी अँगूठी।
बैठक शुरू हुई। माँ ने पहले चाय दी, फिर पकौड़े। रामावत जी बोलते हुए अपने बेटे को सीधा देखते रहे — "ये तो अभी छोटा है, पर हमें उम्मीद है कि सँभल जाएगा।"
रीना मुस्कुराई। "छोटा नहीं है। मेरे स्कूल के बच्चों से बड़ा है।"
सब हँसे। रामावत जी ने बेटे को कोहनी मारी — "बोल कुछ।"
आकाश ने सिर उठाया। "रीना दीदी — मतलब —" और फिर वो लाल हो गया।
रीना फिर हँसी, और इस बार हँसी में वो सहजता थी जो पहले नहीं थी। माँ ने पकौड़े का थाल आगे बढ़ाया।
मैंने सबसे ज़्यादा ध्यान लालाजी पर रखा। वो हँस रहा था, पर उसके हाथ बार-बार चाय की प्याली की तरफ़ बढ़ते और वापस आते थे। एक बार उसने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से मुँह बनाया — "सब ठीक है ना?"
"ठीक है," मैंने कहा।
बात आगे बढ़ रही थी — रीना की नौकरी की, स्कूल के समय की, घर की। रामावत जी ने कहा, "हमारा घर झामा राम की गली के पास है, बस दो गली दूर। रीना बहू को स्कूल नहीं छोड़ना पड़ेगा, बस सुबह का वक़्त थोड़ा बदलना पड़ेगा।"
माँ ने कहा, "वक़्त तो बदल जाता है। आदमी बदलना नहीं चाहिए।"
रामावत जी मुस्कुराए। "ये तो हम भी चाहते हैं।"
तभी रामावत जी की जेब में फ़ोन बजा। उन्होंने निकाला, स्क्रीन देखी, और उठ खड़े हुए। "एक मिनट — बाहर से आता हूँ।"
वो आँगन के बाहर गली में चला गया। मैंने बात जारी रखी, पर कान बाहर थे। उनकी आवाज़ नहीं सुनाई दे रही थी, बस इतना पता चल रहा था कि वो किसी से ऊँची आवाज़ में बोल रहे थे, या बोलने की कोशिश कर रहे थे, और कुछ सुन रहे थे जो उन्हें पसंद नहीं आ रहा था।
दो मिनट बाद वो लौटे। चेहरा वही था, पर मुस्कुराहट कहीं रास्ते में छूट गई थी। उन्होंने बैठते-बैठते लालाजी की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, और अपनी प्याली उठाई — हाथ काँप रहा था।
"मनोहर जी," उन्होंने प्याली रखते हुए कहा, "हमें सोचने का वक़्त चाहिए।"
रीना का हाथ उसी वक़्त चाय की प्याली पर रुका।
माँ ने पूछा, "कुछ ठीक नहीं है?"
"नहीं — मतलब —" रामावत जी ने बेटे को देखा, जो अब सीधा उन्हीं को देख रहा था। "कुछ बातें हैं जो पहले तय होनी चाहिए थीं। हमें थोड़ा वक़्त चाहिए।"
लालाजी ने कुर्सी सरकाई। "रामावत जी, सब पहले से तय था —"
"लालाजी, आप चुप रहिए।" रामावत जी ने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार कोई ऐसी चीज़ आई जो पहले नहीं थी। "आपने मुझे बताया था कि सब साफ़ है।"
"साफ़ है," लालाजी ने कहा। "मैंने खुद देखा है —"
"क्या देखा है आपने?" रामावत जी उठ खड़े हुए। "आपने ज़मीन के काग़ज़ों की बात की थी। उसमें कुछ और नाम है क्या?"
लालाजी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
मैंने हस्तक्षेप किया। "रामावत जी, बैठिए। चाय पीजिए। क्या बात है, साफ़ कहिए।"
वो मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में फैसला पहले ही आ चुका था। "मनोहर जी, ये बात अभी पक्की नहीं है। हम बाद में बताएँगे।"
आकाश ज़मीन की तरफ़ देख रहा था, पर उसके मुँह से निकला, "बाबा कह रहे हैं कि सब वापस ले लेंगे।"
"आकाश!" रामावत जी ने कड़ककर कहा।
लालाजी ने मेरी तरफ़ देखा, फिर उठकर बाहर जाने लगा, और मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
"लालाजी, बैठिए।"
"मन्नू भाई, मेरी गाड़ी —"
"गाड़ी बाद में।" मैंने उसका हाथ छोड़ा और आँगन के बाहर देखा। गली के मोड़ पर एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। उसकी बोनट पर धूल नहीं थी — यानी वो अभी-अभी आई थी।
मेरे भीतर कुछ ठंडा हो गया।
मैंने मुड़कर रामावत जी को देखा। "क्या उस फ़ोन पर किसी ने कहा कि मेरे घर में कुछ गड़बड़ है?"
वो चुप रहे।
"किसने कहा?"
"किसी ने नहीं कहा," रामावत जी ने कहा, पर आवाज़ धीमी थी। "बस एक बात बताई गई थी — कि आपके पास कुछ काग़ज़ हैं जो आपके नहीं हैं, और जो अदालत में हैं। और ये भी कि आपके पिता —"
"रुकिए।" मैंने हाथ उठाया। "मेरे पापा की बात मेरे सामने मत कीजिए। जो कहना है, मुझे कहिए।" मैंने उनकी तरफ़ देखा। "किसने फ़ोन किया — कोई नाम?"
रामावत जी ने बाहर देखा।
"किसने?" मैंने दोबारा पूछा।
"नाम नहीं बताया," उन्होंने कहा। "बस ये कहा कि अगर मुझे अपनी इज़्ज़त प्यारी है तो आज ही रिश्ता बंद कर दूँ।"
रीना की चाय की प्याली टेबल पर रखी थी। मैंने देखा — उसमें चाय ठंडी हो चुकी थी। वो उठ खड़ी हुई, और बिना कुछ कहे आँगन के उस पार चली गई।
माँ उसके पास गई।
रामावत जी ने अपना बैग उठाया। "हम चलते हैं।"
"एक मिनट," मैंने कहा। "लालाजी, आप रुकिए।"
लालाजी मेरी तरफ़ नहीं देख रहा था।
रामावत जी और आकाश गली की तरफ़ बढ़े। सफ़ेद गाड़ी के पास एक आदमी खड़ा था — लंबा, काला कुर्ता। उसने रामावत जी को देखা, एक काग़ज़ उनके हाथ में दिया और चला गया। रामावत जी ने काग़ज़ खोला, पढ़ा, और मुझे पता चला — वो क्या पढ़ रहे हैं, मुझे देखने की ज़रूरत नहीं थी।
मैंने लालाजी की तरफ़ देखा। "तुमने किसे बताया?"
"मैंने किसी को नहीं बताया —"
"लालाजी —"
"मैंने भवानी के मुंशी को बताया था," लालाजी ने धीमी आवाज़ में कहा, और उसका चेहरा हाथों में छिप गया। "वो रोज़ सुबह मेरे दरवाज़े पर आता था। मैंने सोचा — बस एक बात और नहीं। बस एक छोटी सी बात।"
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