The Token System – Chapter 139
मैंने काग़ज़ नीचे किया। मेरे हाथ काँप रहे थे। "सुनीता? पर वो तो मरी —"
"नहीं मरी," माँ ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक और गहरी हो गई। "वो ज़िंदा है। और कल सुबह तुझे उससे मिलना होगा।"
बूढ़ा वहीं बैठा रहा, और उसके हाथ से काग़ज़ों का बंडल मेरी तरफ़ सरक गया। "ले," उसने कहा। "ये सब तेरा है। मैं सिर्फ़ अपने बेटे के साथ जाना चाहता हूँ।"
सोमू ने एक कदम आगे बढ़ाया, फिर रुक गया। "पहले ये बताओ," उसने कहा, "कि जब आपको पता था कि मेरे पापा — मतलब आप — इतने साल कहाँ थे, तो मुझे क्यों नहीं बुलाया?"
बूढ़े ने उसकी तरफ़ देखा। "क्योंकि मैं डरता था कि कहीं तू भी इस हिसाब में न फँस जाए। मैंने सोचा, गरीबी में रहेगा तो सुख से रहेगा।"
"गरीबी में सुख?" सोमू हँसा, पर वो हँसी नहीं थी। "मैंने सोलह साल की उम्र से दूसरों के काग़ज़ लिखे हैं। रोज़ सुना है कि हमारा हिसाब कभी बराबर नहीं होगा। और आप कहते हैं कि सुख से रहेगा?"
बूढ़े ने सिर नीचा कर लिया।
राजेंद्र ने काग़ज़ समेटे और एक बंद लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया, जो उसने पीपल के नीचे पड़े आदमी की जेब से निकाला था। "ये भी तेरे नाम का है। पर इसे अभी मत खोल।"
"क्यों?"
"क्योंकि इस पर लिखा है — सुबह, सुनीता के सामने।"
मैंने लिफ़ाफ़ा अपनी जेब में रखा। उसका वज़न अजीब था, जैसे अंदर कुछ ज़्यादा ही भारी हो।
बंसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "अब चल," उसने कहा। "सुबह जल्दी उठना है। और मैं तुझे एक बात बता दूँ — सुनीता से मिलने जाने से पहले, मेरी दुकान पर आ जाना। मैं तुझे वो बताऊँगा जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताया।"
"क्या?"
"कि बीस साल पहले, जिस रात तेरे पापा गए थे, मैं भी उस गाड़ी में था।"
मैं रुक गया। पीछे मुड़ा। बंसी वहीं खड़ा था, और उसके चेहरे पर वो हँसी नहीं थी जो रोज़ होती थी। बस थकान थी, और एक पुराना डर।
"तू —" शब्द मेरे गले में अटक गए।
"हाँ," बंसी ने कहा। "मैं उस रात बच गया। और मैंने ही तेरे पापा को गाड़ी से खींचकर बाहर निकाला था। पर तब तक देर हो चुकी थी।" उसने अपनी जेब से एक छोटी सी पुरानी चीज़ निकाली — एक टूटा हुआ पीतल का कोना। "ये पापा की जेब से गिरा था। मैं इसे बीस साल से रखे हुए था। अब इसे तेरे हवाले करता हूँ।"
मैंने कोना लिया। वो टोकन के उस टूटे कोने से मिलता था जो मेरे पास था। दोनों जुड़ते ही एक हल्की सी गरमाहट मेरी हथेली में फैल गई, और टोकन पर नया नाम उभरा — बंसी।
मैंने टोकन उसकी तरफ़ बढ़ाया। "ये तेरा है।"
बंसी ने हाथ ऊपर उठाए। "नहीं। मैंने बीस साल पहले ही हिसाब छोड़ दिया था। अब ये मेरा नहीं हो सकता।" वो पीछे हटा। "पर एक बात कहूँ? तेरे पापा ने उस रात जो काग़ज़ मुझे दिया था, वो मेरे पास है। और उसमें लिखा है कि हिसाब पूरा उसी दिन होगा जिस दिन दोनों टोकन वापस दीवार में जाएँगे — एक साथ।"
"एक साथ?"
"हाँ। और उसके लिए तुझे और सोमू को साथ खड़ा होना पड़ेगा।"
सोमू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसकी तरफ़। हम दोनों के बीच जो चीज़ थी, वो न दुश्मनी थी, न दोस्ती — बस एक हिसाब था, जो दोनों से ऊपर था।
"कल सुबह," सोमू ने कहा। "सुनीता के सामने।"
"कल सुबह," मैंने दोहराया।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखें भरी हुई थीं। "अब घर चल," उसने कहा। "बहुत रात हो गई।"
हम गली के मोड़ की तरफ़ बढ़े। पीछे पीपल के नीचे पुलिस की रोशनी धीमी पड़ रही थी, और हवेली का दरवाज़ा खुला पड़ा था, जैसे कोई साँस ले रहा हो। मेरी जेब में टोकन था, और उसका वज़न अब कुछ और था — जैसे किसी ने उसमें एक और ज़िम्मा डाल दिया हो।
घर पहुँचकर मैंने दरवाज़ा खोला और सबसे पहले दीवार पर टँगी घड़ी की तरफ़ देखा। सुइयाँ बारह पर थीं। पर वो चल रही थी। हल्की-सी टिक-टिक, जो पहले नहीं थी।
मैंने जेब से वो बंद लिफ़ाफ़ा निकाला जिस पर लिखा था — सुबह, सुनीता के सामने। मैंने उसे मेज़ पर रख दिया।
रीना दरवाज़े पर आकर खड़ी थी, हाथ में चाय का कप। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर लिफ़ाफ़े की तरफ़, और बिना कुछ पूछे कहा, "कल सुबह मैं भी चलूँगी।"
"क्यों?"
"क्योंकि सुनीता को एक औरत की ज़रूरत होगी," उसने कहा, और चाय मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "तुम दोनों आदमी हो — तुम्हारे पास सिर्फ़ हिसाब होगा।"
कप हाथ में लेते वक़्त मुझे लगा कि आज पहली बार घर की छत मुझ पर झुकी नहीं है।
बाहर आँगन में बबूल का पेड़ हवा में हिल रहा था। और कहीं दूर, हवेली के पीछे, तीन कब्रों में से एक पर रखा गेंदे का फूल गिर गया — जैसे किसी ने ख़ुद उसे हटा दिया हो।
॥
घर पहुँचकर मैंने दरवाज़ा बंद किया और सीधा मेज़ पर रखे उस बंद लिफ़ाफ़े के पास बैठ गया। रीना चाय का कप मेरे हाथ में देकर चली गई, और माँ दालान में चली गई। मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर से पापा की लिखाई का एक काग़ज़ निकला, जो दो तहों में मुड़ा था, और पीछे कुछ लिखा था।
मैंने पढ़ना शुरू किया।
"मन्नू, अगर ये तक तू पढ़ रहा है, तो मैं तेरे साथ नहीं हूँ। बात लंबी नहीं है, पर सीधी भी नहीं है। टोकन का हिसाब सिर्फ़ बीस हज़ार का नहीं है। ये हिसाब तीन हिस्सों में है — एक सुनीता का, जो बसवा में बैठी अपने बच्चे का मुँह देखती रह गई; एक बंसी का, जिसने उस रात मुझे गाड़ी से खींचा; और एक सोमनाथ का, जो हवेली के तहख़ाने में सालों से बैठा है।"
मैंने पन्ना पलटा।
"तीनों हिस्से एक धागे से बँधे हैं। जो एक उतारेगा, बाक़ी दो अपने आप उतर जाएँगे। पर उसके लिए तीनों का एक साथ होना ज़रूरी है — उसी दिन, उसी वक़्त, हवेली के सामने। जो तीनों को साथ नहीं लाएगा, उसका उतारा हुआ हिस्सा वापस भारी हो जाएगा।"
नीचे एक लाइन और थी।
"और मन्नू, तीसरा हिस्सा सबसे भारी है। सोमनाथ का हिस्सा उतारने के लिए तुझे उसके बेटे को साथ लाना पड़ेगा। वो बेटा अब हवेली के सामने खड़ा है, और उसे घर ले जाने वाला कोई नहीं। ये तेरा काम है।"
मैंने काग़ज़ मेज़ पर रख दिया। बाहर आँगन में अंधेरा था और बबूल का पेड़ हवा में झूल रहा था। मैंने घड़ी की तरफ़ देखा। डेढ़ बज रहा था। सुइयाँ चल रही थीं।
फिर मैंने वो काग़ज़ पढ़ा जो बद्री का भाई पीपल के नीचे लाया था। दोनों काग़ज़ सामने रखे, तो बात समझ में आने लगी — पापा ने एक में सुनीता का ज़िक्र किया था, दूसरे में बंसी का। दोनों को साथ लाना था। और सोमनाथ का नाम अभी तक किसी काग़ज़ पर नहीं था, बस टोकन पर।
रात भर मैं बैठा रहा। दो बजे माँ उठकर आई, मेरे पास बैठी, और कुछ देर मेरा चेहरा देखती रही। फिर बोली, "तेरे पापा ने मुझे भी एक बात कही थी जो मैंने किसी को नहीं बताई। कहा था — जिस दिन तीनों हिस्से एक जगह हों, उस दिन हवेली की दीवार से दोनों खाँचे खुद खुल जाएँगे। बंद नहीं रहेंगे।"
"तीसरा खाँचा?" मैंने पूछा।
"तीसरे खाँचे में जो है, वो कोई टोकन नहीं है," माँ ने कहा। "वो हिसाब का काग़ज़ है — सेठ की बही का आख़िरी पन्ना। और उस पन्ने को पढ़ने का हक़ सिर्फ़ उसी को है जिसने तीनों हिस्से उतारे हों।"
वो उठकर चली गई।
मैंने काग़ज़ तह करके जेब में रखा और सिर तकिये पर रखा। आँख लगी तो सपने में टोकन की आवाज़ आई — "सुनीता। अस्पताल। सात बजे।" मैं उठ बैठा। घड़ी देखी — चार बज रहे थे।
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