The Token System129 / 1154

The Token System – Chapter 129

7 min read November 6, 2026

"मैं तेरे साथ चलूँगी?"

"नहीं," मैंने कहा। "तू घर पर माँ के पास रह। और सरोज के पास।"

रीना ने सिर हिलाया। वो पलटी और सरोज के कमरे में चली गई।

मैं बाहर आया। अस्पताल के दरवाज़े के बाहर सूरज ढल रहा था। पीले रंग की रोशनी सड़क पर फैल रही थी।

बाहर फुटपाथ पर मरीज़ों के परिवार बैठे थे। उनके बीच एक किनारे, एक कुर्सी पर बैठा आदमी तंबाकू मल रहा था। मैंने उसे देखा — वो उठा और चल दिया। उसके जाने के बाद मैंने देखा कि वहाँ ज़मीन पर एक छोटा काग़ज़ पड़ा था।

मैंने उठाया।

उस पर लिखा था — "अंकित ठीक है। पर उसका काग़ज़ आज रात तक लालाजी के पास पहुँचेगा। उससे कह दो — अंगूठा लगा दे।"

मेरी मुट्ठी भिंच गई।

बंसी मेरे पीछे आया और काग़ज़ पढ़ा।

"अब वो अंकित से अंगूठा लगवाना चाहते हैं," बंसी ने कहा। "इसका मतलब — अंकित ज़िंदा है, और उनके कब्ज़े में है।"

"पर कहाँ?" मैंने कहा।

बंसी ने चारों तरफ़ देखा।

"मन्नू, एक बात सोच," उसने कहा। "बाबा ने कहा था — सोमवार को हवेली में अकेले आ। उसके पहले वो हमें कमज़ोर करना चाहता है। अंकित को ज़रिया बनाकर।"

"तो मैं अंकित को ढूँढूँगा," मैंने कहा।

"कहाँ?"

मैंने सोचा।

"वही जगह जहाँ से सब चलता है," मैंने कहा। "भवानी का होम।"

बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।

"अंकित को भवानी के होम में रखा होगा — क्योंकि वहाँ अब कोई नहीं जाता। पुलिस ने वहाँ से रजिस्टर उठा लिया, मेनेजर भाग गया। वो जगह अब खाली है। खाली जगह में कुछ छिपाना सबसे आसान है।"

"तो चल," बंसी ने कहा। "पर अकेले नहीं।"

"किसे बुलाऊँ?"

"राजेंड्र को," बंसी ने कहा। "और होम के पीछे के रास्ते से चलेंगे — वही रास्ता जो गंगा ने बताया था।"

मैंने सिर हिलाया।

उसी वक़्त अस्पताल के गेट पर एक सफ़ेद जीप आकर रुकी। उसकी बोनट पर धूल थी। मैंने उसे देखा और खड़ा हो गया।

जीप का दरवाज़ा खुला। भवानी उतरा।

वो मुस्कुरा नहीं रहा था।

वो सीधा मेरी तरफ़ आया। उसके पीछे दो आदमी थे, पर वो उन्हें इशारे से रोककर अकेला आगे आया।

वो मेरे सामने खड़ा हो गया। कोई हथकड़ी नहीं थी। कोई पुलिसिया साथ नहीं था।

"तूने मुझे फँसाया," उसने कहा। "पर मैं बाहर आ गया। ज़मानत मिल गई।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"अपराध कम था," मैंने कहा।

वो हँसा — पर हँसी ठंडी थी।

"एक बात सुन ले," भवानी ने कहा। "मेरे पास जो टोकन का कोना है — वो मेरे पास रहेगा। तू कितने भी काग़ज़ जोड़ ले, तेरा हिसाब पूरा नहीं होगा। क्योंकि जिस दीवार से ये आया है, वो अब मेरे नाम पर है। और उस दीवार में जो कुछ है, वो मेरा है।"

"हवेली," मैंने कहा।

"हवेली," उसने कहा। "और उसका हर पत्थर।"

वो मुड़ा और जीप की तरफ़ चल दिया। फिर रुककर पलटा।

"तेरे पास तीन दिन हैं," उसने कहा। "तीन दिन बाद हवेली की नीलामी है। मैंने काग़ज़ तैयार कर लिए हैं। तू चाहे जो कर ले, हवेली बिक जाएगी।"

वो जीप में बैठा। जीप चली गई।

मैं वहीं खड़ा रहा। बंसी मेरे पास आया।

"नीलामी?" उसने कहा। "किसने तय की?"

"उसने," मैंने कहा। "उसके पास काग़ज़ हैं।"

"तो हमें उससे पहले हवेली में जाना होगा," बंसी ने कहा। "और जो कुछ है, वो निकालना होगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"आज रात," मैंने कहा।

"आज रात," बंसी ने दोहराया।

मैंने जेब से वो पर्ची निकाली जो बाबा ने गिराई थी — "अगला सोमवार, हवेली, सिर्फ़ तू।"

मैंने उसे फाड़ दिया।

"बाबा चाहता है कि मैं सोमवार को अकेला आऊँ," मैंने कहा। "पर मैं आज रात आऊँगा। और अकेला नहीं।"

बंसी ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया।

"अब बात बन रही है," उसने कहा।

मैंने पर्ची के टुकड़े जेब में ठूँसे और बंसी के साथ सड़क पर चल दिया। राजेंद्र को फ़ोन लगाया — तीन रिंग के बाद उसने उठाया।

"भाई, आज रात हवेली चलना है," मैंने कहा।

दूसरी तरफ़ चुप्पी रही। फिर आवाज़ आई — "तू पागल हो गया है?"

"हो सकता है। पर सुन। भवानी ने नीलामी की तारीख़ निकाल दी है। तीन दिन। अगर आज रात हम उस हवेली के अंदर जो कुछ है, नहीं निकाल पाए, तो सब उसका।"

"और अगर पकड़े गए तो?"

"तो पुलिस वाला हिस्सा तू सँभाल लेना," मैंने कहा। "तेरे पास वर्दी है।"

वो हँसा। छोटी, थकी हुई हँसी।

"दस बजे," उसने कहा। "हवेली के पिछवाड़े वाली गली में। और मन्नू — इस बार तेरी कोई बात नहीं मानूँगा। ख़तरा दिखा तो पीछे हटेंगे।"

"ठीक है," मैंने कहा। पर मेरे भीतर कहीं ये बात बैठ नहीं रही थी।

अस्पताल लौटा। सरोज के कमरे का दरवाज़ा खुला था। डॉक्टर सुमन उसके पास बैठी थीं, उसकी कलाई पकड़े हुए। उन्होंने मुझे देखा और बाहर इशारा किया।

गलियारे में वो बोलीं, "काग़ज़ कहाँ मिला?"

"भवानी के होम के पुराने रिकॉर्ड रूम से," मैंने कहा। "एक आदमी लेकर आया था।"

"और वो आदमी?"

"भाग गया। पर ये काग़ज़ उसने छोड़ा नहीं — उसने फाड़कर फेंका था। जल्दबाज़ी में।"

सुमन ने अपना चश्मा उतारा और पोंछा।

"मन्नू, ये काग़ज़ जिस हालत में है — फटा हुआ, पुराना — इसकी एक ही कीमत है। अदालत में इसकी उम्र और इसका स्रोत, दोनों जाँचे जाएँगे। और जिसने इसे लिखा है, उसकी लिखाई पहचानी जाएगी।"

"तो मतलब?"

"मतलब ये कि इसे सँभालकर रखो। किसी को दिखाओ मत। और हाँ — सरोज अब ख़तरे से बाहर है। पर उसका दिमाग़ अभी ठीक से काम नहीं कर रहा। उसे आराम चाहिए।"

मैंने सिर हिलाया। फिर मैंने पूछा, "डॉक्टर, आपने इस काग़ज़ पर जो तारीख़ें देखीं — क्या वो तारीख़ें किसी और जगह से मिलती हैं?"

सुमन रुकीं।

"तीन तारीख़ें हैं," उन्होंने कहा। "और तीनों के सामने के नाम — भवानी के होम के मरीज़। पर एक बात अजीब है। तीनों की मौत के बाद भी उनके नाम अस्पताल के रजिस्टर में ज़िंदा दर्ज हैं। यानी किसी ने उनकी मौत छिपाई।"

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

"क्यों छिपाएगा कोई किसी की मौत?" मैंने पूछा।

"क्योंकि ज़िंदा मरीज़ सरकार से पैसा लाता है," सुमन ने कहा। "और मरा हुआ मरीज़ भी — अगर उसकी मौत दर्ज न हो।"

मैं कुछ देर उन्हें देखता रहा।

"ये आपने पहले क्यों नहीं बताया?"

"क्योंकि पहले मेरे पास सबूत नहीं था," उन्होंने कहा। "आज है।"

वो मुड़कर वार्ड की तरफ़ चलीं। फिर रुकीं और बिना पलटे बोलीं, "और मन्नू — तेरी माँ का हाल भी मैंने देखा है। वो बेहतर है। पर उससे ज़्यादा ज़रूरी ये है कि तू ख़ुद ज़िंदा रहे। समझा?"

"कोशिश करूँगा," मैंने कहा।

वो चली गईं।

मैं सरोज के कमरे में गया। वो सो रही थी। साँसें धीमी और साफ़ थीं। मैंने उसके सिरहाने हाथ रखा — बुख़ार उतर गया था। मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा, फिर बाहर आया।

बाहर लॉबी में शालिनी खड़ी थी। हाथ में एक फ़ाइल।

"मिल गया," उसने कहा।

"क्या?"

"भवानी के होम का पुराना स्टाफ़ रजिस्टर। होम में जो काम करते थे — चौकीदार, वार्ड बॉय, खाना बनाने वाले। इनमें एक नाम है — रामलाल। चौकीदार। करीब बारह साल होम में रहा।"

"तो?"

"तो ये रामलाल अब भवानी की हवेली का माली है," शालिनी ने कहा। "और हवेली में माली के पास हर कमरे की चाबी होती है।"

मैंने उसे देखा।

"तू कहाँ से लाई ये?"

"पुराने स्टाफ़ के काग़ज़ नगर निगम के रिकॉर्ड रूम में पड़े थे। एक बाबू को बीस रुपये की चाय पिलाई।"

मैं हँस पड़ा। पहली बार दिन भर में।

"तू ख़तरनाक है," मैंने कहा।

"मुझे पता है," उसने कहा। फिर फ़ाइल बंद करके बगल में दबा ली। "पर एक बात और। राजेंद्र का फ़ोन आया था। कह रहा था — उसे पुलिस के रिकॉर्ड में भवानी की ज़मानत का काग़ज़ मिला। पर वो ज़मानत सुबह की है।"

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