The Token System128 / 1154

The Token System – Chapter 128

7 min read November 6, 2026

बाहर गली में फिर कोई गाड़ी आई। इस बार हॉर्न नहीं बजा। सिर्फ़ इंजन की आवाज़ आई और फिर बंद हो गई।

विक्रम दरवाज़े तक गया और झाँका।

"मन्नू," उसने धीरे कहा, "एक गाड़ी रुकी है। उसमें से कोई उतरा नहीं। सिर्फ़ खिड़की खुली है।"

मैंने थैला माँ को दिया और दरवाज़े तक गया।

गाड़ी काली थी। खिड़की से एक हाथ बाहर आया — झुर्रियों वाला, सफ़ेद बालों वाला हाथ — और उसने एक मुड़ा काग़ज़ ज़मीन पर गिरा दिया। फिर खिड़की बंद हुई और गाड़ी चली गई।

मैंने काग़ज़ उठाया।

उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी — "अगला सोमवार। हवेली। सिर्फ़ तू। बाकी सब बाहर।"

मैंने काग़ज़ जेब में रखा और पलटकर सबकी तरफ़ देखा।

"कौन था?" रीना ने पूछा।

"वही," मैंने कहा। "बाबा।"

॥

सरोज ने पलंग से उठने की कोशिश की। माँ ने उसे रोका, पर वो रुकी नहीं। उसने अपनी साड़ी का पल्लू खोला और उसके भीतर से एक फटा हुआ पन्ना निकाला — मुड़ा हुआ, किनारों से फटा, ऊपर से पीला पड़ चुका।

"ये मैंने होम की मेज़ की दराज़ से निकाला था," उसने कहा। "जब वो मुझे रसोई में बंद करके गए थे। मैंने इसे साड़ी में सिल लिया था।"

मैंने पन्ना खोला।

उस पर तीन नाम लिखे थे, हर नाम के आगे एक तारीख़, और हर तारीख़ के आगे एक छोटा सा शब्द — "नहीं रही"। नीचे एक लाइन थी, जो मैंने पहचान ली। पापा की लिखाई। मोटी, टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें।

"हिसाब बाकी है।"

बंसी ने पन्ना मेरे हाथ से लिया और पास ले जाकर रोशनी में देखा। उसका चेहरा कस गया।

"ये तो…" उसने उँगली उस पहले नाम पर रखी। "ये तो शकुंतला है। जो रात ग्यारह बजे भर्ती हुई थी।"

"और ये दूसरा," सुमन ने कहा। वो दरवाज़े पर खड़ी थी। मुझे पता नहीं चला कब आई। "गेंदा देवी। दूसरी रात।"

"तीसरा किशन लाल," मैंने कहा। "पाँच साल पहले का।"

सरोज ने मेरी तरफ़ देखा।

"मन्नू," उसने धीरे से कहा, "तेरे पापा ने ये पन्ना इसलिए छिपाया था कि ये किसी के हाथ न लगे। इन तीनों की मौत का हिसाब भवानी के होम के रजिस्टर से मिलता है। पर रजिस्टर में इनके नाम नहीं हैं। रजिस्टर में इनकी जगह और नाम चढ़े हैं।"

"और ये हिसाब बाकी है वाली लाइन?" रीना ने पूछा।

"ये पापा की लिखाई है," मैंने कहा। "मैं इसे पहचानता हूँ।"

माँ ने पन्ना अपने हाथ में लिया और देर तक देखती रही। फिर उसने उसे मेज़ पर रख दिया और चूल्हे की तरफ़ चली गई। इस बार उसने चाय बनाई।

विक्रम दरवाज़े के पास खड़ा था। वो अब भी उसी जगह था जहाँ खड़ा था, जैसे उसे कोई हिला न सके। उसकी निगाहें सरोज पर थीं।

मैं उसके पास गया।

"तेरी माँ अब सुरक्षित है," मैंने कहा।

वो मेरी तरफ़ मुड़ा। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर वो रोया नहीं।

"मुझे नहीं पता था," उसने कहा, "कि वो इतने दिन… मैं सोचता रहा कि वो अपनी मर्ज़ी से गई है।"

"वो बंद थी," मैंने कहा। "तूने क्या किया होता?"

उसने कुछ नहीं कहा।

मैंने उसे गले लगा लिया। वो पहले तो अकड़ा रहा, फिर उसके कंधे हिले।

"तेरे पापा का हिसाब तेरे ऊपर नहीं है," मैंने धीरे कहा। "अपना अलग रख।"

उसने सिर हिलाया और मुझसे अलग हुआ। उसने आँखें पोंछीं।

सुमन अंदर आई और सीधी सरोज के पास पहुँची। उसने सरोज की नाड़ी देखी, पलकें देखीं, ज़ुबान के नीचे झाँका, फिर पीछे हटकर खड़ी हो गई।

"इन्हें अस्पताल लाना होगा," उसने कहा। "आज ही। बहुत कमज़ोरी है। पानी की कमी है। और वो दवा जो इन्हें होम में नहीं दी गई, उसका असर भी देखना होगा।"

"अभी चलते हैं," मैंने कहा।

"पर वार्ड में तो…" बंसी ने शुरू किया।

"वार्ड में सोनल की जगह अब कोई और है," सुमन ने कहा। "शालिनी ने उसका काग़ज़ देख लिया। वो भवानी की आदमी थी, पर उसकी जानकारी अब बेकार है।"

हमने सरोज को बंसी की गाड़ी से अस्पताल पहुँचाया। रास्ते में सरोज ने एक बार मेरा हाथ पकड़ा और कहा —

"मन्नू, वो पन्ना मेरे पास से मत लेना। जब तक मैं ठीक न हो जाऊँ, वो मेरे तकिये के नीचे रहेगा।"

"क्यों?" मैंने पूछा।

"क्योंकि जो इसे ढूँढ रहा है, वो ये नहीं जानता कि ये अब मेरे पास है।"

अस्पताल पहुँचकर सुमन ने सरोज को वार्ड में भर्ती कराया। उसने खुद सलाह दी कि सरोज को पुराने वार्ड में नहीं, बल्कि उस नए कमरे में रखा जाए जिसकी खिड़की गलियारे की तरफ़ नहीं खुलती। शालिनी ड्यूटी पर थी। उसने सरोज का बिस्तर तैयार किया और सुमन के कहे मुताबिक दवा लगाई।

मैं गलियारे में बाहर आया। दोपहर हो चुकी थी। बंसी बेंच पर बैठा था और चाय की गिलास उसके हाथ में ठंडी हो रही थी।

शालिनी बाहर आई और मेरे पास आकर खड़ी हो गई। उसके हाथ में एक काग़ज़ था।

"मन्नू," उसने कहा, "जो काग़ज़ सोनल ने वार्ड के बोर्ड पर चिपकाया था, वो मैंने उतार लिया था। मैंने उसे जला नहीं। मैंने सोचा, किसी काम आएगा।"

उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।

मैंने उसे खोला।

उस पर वही तीन नाम थे — शकुंतला देवी, गेंदा देवी, किशन लाल — और वही तारीख़ें।

"ये तो…" मैंने कहा।

"हाँ," शालिनी ने कहा। "ये वही काग़ज़ है। सोनल ने इसे भवानी होम से लाकर यहाँ चिपकाया था। मतलब ये सूची भवानी के होम में पहले से थी।"

मैं गलियारे में खड़ा रह गया।

मैंने जेब से सरोज का दिया फटा पन्ना निकाला और दोनों को साथ रखा।

तीन नाम। तीन तारीख़ें। दोनों काग़ज़ों पर एक जैसे।

"नाम वही हैं," मैंने कहा, "पर काग़ज़ अलग हैं। सोनल वाला काग़ज़ भवानी के होम से आया था। और सरोज वाला काग़ज़ पापा ने छिपाया था। मतलब — ये नाम सिर्फ़ सरोज के काग़ज़ तक नहीं हैं। ये भवानी के होम में घूम रहे थे।"

सुमन गलियारे में आई। उसने दोनों काग़ज़ देखे और उसका चेहरा बदल गया।

"मन्नू," उसने कहा, "ये अदालत में बहुत बड़ा सबूत है।"

"कैसे?" मैंने पूछा।

"क्योंकि इससे साबित होता है," सुमन ने कहा, "कि भवानी के होम में मरीज़ों की मौत का हिसाब अलग रजिस्टर में चलता था। यही नाम, यही तारीख़ें — इन्हीं को रजिस्टर से नाम बदलकर भेजा जाता था। और ये पापा की लिखाई है। पापा ने इसे बनाया था — क्योंकि वो जानते थे कि भवानी के होम में क्या होता है।"

"पर पापा तो…" रीना ने कहा। वो भी अब वहाँ आ गई थी।

"पापा ने इसे अपने पास रखा," मैंने कहा, "ताकि जिस दिन हिसाब बाकी का दिन आए, ये सामने आए।"

मैंने दोनों काग़ज़ एक साथ मोड़कर अपनी जेब में रखे।

उसी वक़्त गलियारे के आख़िर से बंसी ने आकर कहा —

"मन्नू, तीन दिन बाद रीना की शादी की तारीख़ तय है।"

सब चुप हो गए।

"और लालाजी का लड़का अंकित…" बंसी ने कहा, "सुबह से ग़ायब है। उसका फ़ोन बंद है। लालाजी घर पर अकेले हैं।"

रीना ने मेरी तरफ़ देखा।

"अंकित के ग़ायब होने का मतलब?" उसने पूछा।

बंसी ने अपनी गिलास मेज़ पर रखी।

"भवानी के पास अब फिर हमला करने का एक ही रास्ता बचा है — रीना की शादी। और शादी का रास्ता लालाजी से होकर जाता है।"

"तो अब भवानी फिर हमला करेगा?" विक्रम ने कहा। "जबकि वो थाने में है?"

"वो थाने में है," बंसी ने कहा, "पर उसके काम बंद नहीं हैं। उसके वकील के बाहर बैठे आदमी अभी भी सक्रिय हैं। और अब उनके पास एक नया रास्ता है — बाबा।"

मैंने सरोज के कमरे की तरफ़ देखा। खिड़की से उसका चेहरा दिख रहा था, वो आँखें बंद किए लेटी थी।

मैंने बंसी की तरफ़ मुड़कर कहा —

"अंकित का पता लगाना है। आज ही।"

फिर मैंने रीना की तरफ़ देखा।

"तेरी शादी तीन दिन बाद है। मैं वादा करता हूँ — तेरी शादी नहीं टूटेगी। पर मुझे आज तीन जगह जाना है।"

रीना ने मेरे हाथ पर हाथ रखा।

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