The Token System – Chapter 125
"भवानी की बही में।" उसने मेरी आँखों में देखा। "जिस बही की तुम बात कर रहे हो — वो सिर्फ़ हिसाब की नहीं है। उसमें नाम हैं। हर औरत का नाम, जिसे भवानी ने अपने हिसाब से इस्तेमाल किया। और हर नाम के आगे… एक तारीख़।"
"कैसी तारीख़?"
"जिस दिन उसे भवानी के होम से निकाला गया।" चंदा ने हाथ जोड़े। "बाबा, मुझे यहाँ से निकालो। अगर भवानी के लोग आए, तो मैं ज़िंदा नहीं बचूँगी।"
बाहर बंसी की आवाज़ आई। "मन्नू! जल्दी! पीछे से रोशनी आ रही है!"
मैंने चंदा के हाथ खोले। रीना ने उसे पानी पिलाया।
"चंदा," मैंने कहा, "रास्ते में बताना। एक-एक बात।"
हम बाहर निकले। पीछे की तरफ़, पगडंडी के मोड़ पर, दो मोटरसाइकिल की रोशनी दिख रही थी।
बंसी ने गाड़ी की चाबी निकाली। "अंदर बैठो। सब।"
"नहीं।" मैंने चंदा को पीछे विक्रम के पास बैठाया। "बंसी, तू सीधा गाँव नहीं ले जाएगा। पहले बसवा में बुढ़िया का घर। वहाँ चंदा का बयान लिखवाएँगे। वही हमारा सबूत होगा।"
बंसी ने गाड़ी चालू की। "और अगर वो पकड़ लें?"
"तो हम किसी के सामने सच बोलेंगे। भवानी का नाम छिपाने वाला हम नहीं, वो है।"
गाड़ी भागी। पीछे रोशनी भी भागने लगी।
विक्रम ने पीछे से मेरा कंधा थपथपाया। "मन्नू, वो सूची में मेरी माँ का नाम था। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। मेरी माँ तो यहाँ कभी आई ही नहीं।"
"आई नहीं, इसलिए तो अजीब है," मैंने कहा। "पापा ने उनका नाम क्यों लिखा?"
चंदा ने पीछे से कहा, "क्योंकि तेरे पापा को भवानी के हिसाब में गड़बड़ी मिली थी। एक नाम ऐसा था जो हर साल आता था, और हर साल काट दिया जाता था। सरोज।"
विक्रम जम गया। "माँ का नाम सरोज है।"
"हाँ," चंदा ने कहा। "और वो कभी भवानी के होम में काम नहीं करती थी। तेरे पापा ने उसका नाम तारीख़ के साथ लिखा था — और वो तारीख़ वो थी जिस दिन तेरी माँ ने भवानी को कुछ बेचने से मना किया था।"
मैंने गाड़ी रोकने को कहा। बंसी ने ब्रेक मारे।
मैं मुड़ा। "चंदा, ठीक-ठीक बोल। क्या बेचने से मना किया?"
चंदा ने होंठ कसे। "भवानी तेरी माँ से तेरी ज़मीन के काग़ज़ माँग रही थी। तेरी माँ ने मना किया, और कहा — जाकर गाँव में बता दूँगी। भवानी ने उसे धमकाया। फिर कुछ दिन बाद तेरी माँ की तबीयत खराब हो गई।"
विक्रम का चेहरा सफ़ेद हो गया। "माँ की तबीयत…"
"वो अचानक बीमार हुई थी, है ना?" चंदा ने कहा।
विक्रम ने सिर हिलाया। "कहा गया था कि पानी में कुछ मिला था।"
रीना ने मेरी तरफ़ देखा। बंसी ने गाड़ी को स्टार्ट रखा।
विक्रम की आँखों में पानी आ गया। "तो मेरी माँ उस सूची में इसलिए थी क्योंकि उसने भवानी का हाथ रोका था?"
"और भवानी ने उसे हिसाब में काट दिया," मैंने कहा। "यही पापा बराबर करना चाहते थे। जो नाम काटे गए, उनका हिसाब सबके सामने आए।"
पीछे की रोशनी करीब आ गई थी।
बंसी ने कहा, "मन्नू, फ़ैसला तेरा। भागें या रुकें?"
मैंने विक्रम की आँखों में देखा। "रुकेंगे। भागने से पापा का हिसाब पूरा नहीं होगा।"
मैं गाड़ी से उतरा। मोटरसाइकिल आई, रुकी। दो आदमी उतरे — दोनों पर काली बनियान, और एक के हाथ में लाठी।
"बाबा ने कहा है," वो बोला, "औरत को लौटाओ।"
"कौन बाबा?" मैंने कहा। "भवानी तो मर चुकी।"
"भवानी मर नहीं सकती। बाबा उसी का नाम है।"
मैं हँसा। "भवानी का नाम अब कहिये मत। गाँव जानता है कि भवानी का घर अब खाली है। और चंदा यहाँ से नहीं जाएगी। वो गाँव के सामने बोलेगी।"
आदमी ने लाठी उठाई। बंसी गाड़ी से उतरा, हाथ में पानी की बोतल — और उसे फ़ेंक दिया। आदमी लड़खड़ाया।
"भागो!" मैंने रीना को धक्का दिया। "गाड़ी में!"
हम गाड़ी में चढ़े। बंसी ने गाड़ी घुमाई।
पीछे आदमी दौड़ा, पर गाड़ी आगे निकल गई।
सुबह की हवा आ रही थी। आसमान में रोशनी फैल रही थी। गाँव दूर से दिख रहा था, और उसके बीच में, होम की दीवारें।
रीना ने पीछे से मेरा हाथ पकड़ लिया।
"मन्नू, अब क्या?"
"अब," मैंने कहा, "हम सीधे थाने जाएँगे। चंदा का बयान, पापा की बही, और सरोज के काग़ज़। फिर होम में घुसेंगे — पुलिस के साथ।"
विक्रम ने पीछे से कहा, "और अपनी माँ का हिसाब?"
"वो," मैंने कहा, "गाँव के सामने बराबर होगा। तेरी माँ का चेहरा दुनिया देखेगी। यही पापा चाहते थे।"
गाड़ी थाने की तरफ़ मुड़ी।
रीना ने मेरे कान के पास आकर कहा, "एक बात बोलूँ?"
"बोल।"
"अगर तू इस काम में गया, तो मैं भी साथ चलूँगी।"
मैं मुस्कुराया। "मैं तुझे रोक भी नहीं सकता।"
"नहीं रोक सकता," उसने कहा। "क्योंकि मैंने पापा की कलम अपनी जेब में रख ली है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"माँ ने दी," उसने कहा। "कहा — जो पन्ना निकलेगा, उस पर तेरे पापा की लिखाई होगी। और वो पढ़ने के बाद ये कलम जिसके हाथ में होगी, उसी को हिसाब बाँटना होगा।"
गाड़ी थाने के सामने रुकी। मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था, चुप था। पर पोटली में जो काग़ज़ थे, वो मेरी उँगलियों में गरम लगे।
रीना ने मेरा हाथ पकड़ा, और दुपट्टा कसा।
"चल," उसने कहा। "अब मत रुक।"
॥
थाने की सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त रीना मेरे पीछे-पीछे चली आ रही थी, और मैं बार-बार रुककर उसे देख रहा था।
"तू बाहर रुक," मैंने कहा।
"नहीं।"
"रीना।"
"मैंने कह दिया ना, मत रोक मुझे।"
दरवाज़े पर राजेंद्र बैठा था, हाथ में चाय का गिलास। मुझे देखते ही उठ गया।
"इतनी सुबह?"
"चंदा का बयान दर्ज करना है," मैंने कहा। "और सरोज के काग़ज़ों की शिकायत।"
राजेंद्र ने गिलास रखा और पीछे देखा। "अंदर आ।"
अंदर जाकर हम बैठे। चंदा मेरे पास थी, दुपट्टा मुँह तक खींचे। विक्रम दरवाज़े के बाहर खड़ा रहा, अंदर नहीं आया। राजेंद्र ने रजिस्टर खोला।
"बोल, बच्ची। नाम?"
"चंदा।"
"घर?"
"बसवा। भवानी के होम में रसोई का काम करती थी, दस साल से।"
राजेंद्र ने कलम उठाई। "क्या देखा?"
चंदा ने एक साँस ली और बोलना शुरू किया — पहले धीमे, फिर तेज़। होम के पीछे वाला कमरा, रात दो बजे चौकीदार का बदलना, सुबह के फ़ॉर्म, जिन पर बच्चों के नाम और "बाहर भेजना" लिखा होता था। लड़कियों की बात कहते हुए उसकी आवाज़ फट गई, पर रुकी नहीं।
राजेंद्र ने कलम रख दी। "ये सब लिखा जा रहा है। तेरे हस्ताक्षर लगेंगे।"
"लगा दो," चंदा ने कहा। "पर मुझे वापस उनके पास मत भेजना।"
"नहीं भेजेंगे।"
तभी बाहर से गाड़ी की आवाज़ आई। मैं उठकर खिड़की तक गया। सफ़ेद जीप थी, थाने के गेट पर रुकी। दो आदमी उतरे — दोनों सफ़ेद कुर्ते में, दोनों के हाथ में फ़ाइल।
राजेंद्र भी खिड़की तक आया। "भवानी का वकील है।"
"अभी बजे आ गया?"
"आठ बजे अदालत में अर्ज़ी लगानी थी। जल्दी में है।"
वकील अंदर आया, पर मेरी तरफ़ नहीं देखा। सीधे राजेंद्र के सामने खड़ा हुआ।
"मनोहर के पास जो भी काग़ज़ हैं, सब ज़ब्त होंगे। अदालत का हुक्म आ रहा है।"
राजेंद्र ने कुर्सी खींची और बैठ गया। "हुक्म लेकर आओ, फिर बात करेंगे। अभी तो बयान चल रहा है।"
"ये औरत भवानी के होम की है। इसका बयान नहीं होगा।"
"ये औरत," राजेंद्र ने कहा, "गवाह है। गवाह का बयान हर हाल में होगा। तुम्हारा हुक्म आए, मैं उसे भी देखूँगा। पर बयान रुकेगा नहीं।"
वकील की आँखें सिकुड़ीं। उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया। "मनोहर बाबू, आपकी बहन की शादी का इंतज़ाम अभी भी हो सकता है। बात सिर्फ़ इतनी है कि काग़ज़ लौटा दीजिए।"
"मैं आपके आदमियों से बात नहीं करता," मैंने कहा।
"मैं आदमी नहीं हूँ, वकील हूँ।"
"तो वकील से भी नहीं।"
वकील हँसा। फिर मुड़ा और चला गया। जीप स्टार्ट हुई और गली से निकल गई।
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