The Token System126 / 1154

The Token System – Chapter 126

6 min read November 6, 2026

राजेंद्र ने रजिस्टर बंद किया। "बयान हो गया। अब सुन, मन्नू। अदालत का हुक्म आने में दो-तीन दिन हैं। तब तक तुम्हारे पास जो काग़ज़ हैं, सबकी फ़ोटो रख लो। और असली काग़ज़ होम में मत छोड़ना।"

"होम में?"

"हाँ। तुमने सरोज को होम से निकाला — ये बात अब पूरे शहर में है। भवानी के आदमी सोचेंगे तुम ख़ुद काग़ज़ लेने पहुँचोगे। उन्हें लगेगा, होम में पापा का काग़ज़ अब भी पड़ा है।"

मैंने रीना की तरफ़ देखा। वो चुप बैठी थी, हाथ जोड़े।

"तो होम में जाना पड़ेगा," मैंने कहा। "अभी।"

"दिन चढ़ रहा है," राजेंद्र ने कहा। "दोपहर बाद जाओ। साथ में मेरे दो आदमी चलेंगे।"

"नहीं। अगर पुलिस साथ गई, तो अंदर का सब कुछ साफ़ कर देंगे। हमें भीतर से जाना होगा — जैसे चंदा से मिलने गए थे।"

राजेंद्र ने कुछ सोचा। "ठीक है। पर एक शर्त। शाम तक लौट जाना। और अगर कुछ दिखे, छिपाना मत।"

बाहर निकले तो विक्रम दीवार से टिका खड़ा था।

"माँ कहाँ है?" उसने पूछा।

"सुमन के घर, पीछे वाले कमरे में। बंसी ने पहुँचाया था।"

"मैं उससे मिलना चाहता हूँ।"

"मिलेगा। पहले एक काम है।"

गाड़ी में बैठे तो बंसी ने पीछे मुड़कर देखा। "अब कहाँ?"

"होम।"

"अभी?"

"अभी।"

"मन्नू, दिन हो गया है। दीवार पर सब देख लेंगे।"

"जान-बूझकर ऐसे जाएँगे जैसे सब्ज़ी वाले जाते हैं। चंदा के साथ।"

चंदा ने सिर उठाया। "मैं?" वो

"तू रसोई में काम करती थी। तेरा आना कोई नई बात नहीं। तू अंदर जाएगी, हम पीछे के दरवाज़े से।"

रीना ने कहा, "मैं भी जाऊँगी।"

"नहीं…"

"मन्नू," उसने काट दिया। "मैं गाड़ी में ही बैठूँगी। पीछे के फाटक पर। अगर तेरा कोई नहीं आया, तो मैं अंदर नहीं जाऊँगी। पर मैं यहाँ नहीं रुकूँगी।"

मैंने बंसी की तरफ़ देखा। वो हँसा।

"तेरी बहन आसामी निकली।"

"चुप," रीना ने कहा।

होम के पिछले फाटक तक गाड़ी सीधी चली। सुबह के दस बजे थे। धूप तेज़ थी और रास्ते पर सिर्फ़ एक साइकिल वाला मिला। फाटक पर ताला नहीं था। चंदा उतरी और रसोई की तरफ़ चल दी, जैसे यह उसका रोज़ का काम हो। मैं और बंसी दीवार से सटकर चले।

रसोई के पीछे एक छोटी खिड़की थी, जिस पर जाली लगी थी। चंदा ने भीतर से उसे खोला।

"अंदर दो औरतें हैं, दोनों बर्तन माँज रही हैं। तीसरी मैं हूँ। कोई पूछे तो कहेगी बाज़ार गई थी।"

"ऊपर जाने का रास्ता?"

"रसोई के बाद सीढ़ियाँ हैं, जो पीछे की तरफ़ मुड़ती हैं। दो मंज़िल ऊपर।"

"तीसरी मंज़िल?"

"वहाँ पहले सिर्फ़ स्टोर था। पिछले साल दो कमरे बने। छोटू वहीं रखा गया था।"

मैंने बंसी को देखा।

"तू पीछे रुक," उसने कहा। "मैं पहले चढ़ूँगा।"

"नहीं। साथ चलेंगे।"

हम भीतर घुसे। रसोई में तेल और धुएँ की गंध थी। दो औरतें बर्तन माँज रही थीं — एक पचास के आसपास, दूसरी जवान। उन्होंने सिर उठाया और फिर नीचे कर लिया। कोई कुछ नहीं बोली। यही सबसे अजीब था। चंदा ने हमें पीछे की सीढ़ियों की तरफ़ इशारा किया।

पहली मंज़िल साफ़ थी — चमकदार फ़र्श, बंद दरवाज़े। दूसरी मंज़िल पर टूटी सीढ़ियाँ, दीवार पर पुराना प्लास्टर। तीसरी मंज़िल पर पहुँचे तो एक गलियारा था, जिसके आख़िर में एक लोहे का दरवाज़ा। उस पर ताला लगा था।

बंसी ने कान दिया। भीतर से खाँसने की आवाज़ आई — रुक-रुक कर, कमज़ोर।

"सरोज?" मैंने धीरे कहा।

खाँसी रुकी। फिर फिर शुरू हुई।

"लोहा है," बंसी ने कहा। "इसके लिए छड़ी चाहिए।"

मैंने खिड़की की तरफ़ देखा। उसकी एक सलाख ढीली थी। हमने मिलकर उसे घुमाया। बंसी ने उसे पूरा उखाड़ लिया और ताले में डाला। दो बार झटका दिया। क्लिक की आवाज़ आई।

दरवाज़ा खुला।

कमरे में सिर्फ़ एक चारपाई थी, एक टूटी कुर्सी, और कोने में बाल्टी। सरोज चारपाई पर औंधी पड़ी थी। उसका चेहरा पीला था और होंठ सूखे। कमरे में पानी की गंध और बंद हवा थी।

"उठाओ इसे," मैंने कहा।

बंसी ने उसका कंधा पकड़ा। सरोज की आँखें खुलीं, फिर बंद हो गईं। हमने उसे बैठाया। कमरे की मेज़ पर एक गिलास पानी रखा था — आधा। बंसी ने उसके होंठों से लगाया। सरोज ने एक घूँट लिया।

"विक्रम?" उसने फुसफुसाया।

"बाहर है," मैंने कहा। "सब ठीक है।"

"गंगा… गंगा ने बताया था तुम आओगे।"

"हम निकलते हैं। उठो।"

मैंने उसका हाथ अपने कंधे पर रखा। बंसी दूसरी तरफ़ से। सरोज की टाँगें काँप रही थीं, पर वो चल पड़ी। बाहर निकले और सीढ़ियों तक आए। पहली सीढ़ी उतरी — और नीचे से आवाज़ आई।

"कौन है ऊपर?"

भवानी का मैनेजर। मैंने उसकी आवाज़ पहचानी। पतला आदमी, चालीस के आसपास, जो रजिस्टर लेकर आया था।

वो सीढ़ियों के मोड़ पर आ गया। हाथ में फ़ाइल थी। हमें देखकर रुक गया।

"तुम…" उसने सरोज को देखा। "ये यहाँ कैसे?"

"उसी तरह जैसे तू यहाँ है," बंसी ने कहा। "रोज़गार पर।"

"तुमने कैसे…"

"दरवाज़ा खुला छोड़ गए थे," मैंने कहा।

मैनेजर ने एक क़दम पीछे किया। फ़ाइल उसके हाथ में काँपी।

बंसी उसके सामने आ गया। "एक मिनट, मिस्टर मेनेजर। तूने ख़ुद थाने में कहा था ना — रजिस्टर छिपाने का हुक्म मिला था? किसका हुक्म?"

मेनेजर ने कुछ नहीं कहा।

"बोल," बंसी ने कहा। "नहीं तो अब ये औरत सरोज का बयान भी होगा — और वो तेरा नाम पहले लेगी।"

मेनेजर का चेहरा बदला। "मैंने… मैंने किसी को नहीं छिपाया।"

"और रजिस्टर?"

"रजिस्टर… हुक्म था।"

"किसका हुक्म?"

वो चुप रहा। फिर फुसफुसाया, "बाबा का।"

मेरी टाँगें रुक गईं।

"कौन बाबा?" मैंने कहा।

"मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ," उसने कहा। "फ़ोन आता है, हुक्म आता है, काग़ज़ बदल जाते हैं। मैंने कभी चेहरा नहीं देखा।"

"तो तू झूठ बोल रहा है।"

"नहीं।" उसकी आवाज़ टूटी। "मैंने सिर्फ़ अपनी नौकरी बचाई। और अब… अब मैं ये सब नहीं कर सकता।"

वो सीढ़ी की रेलिंग पकड़कर खड़ा रहा। फिर उसने सरोज की तरफ़ देखा और बोला, "उसे डॉक्टर के पास ले जाओ। दवा सुबह दी थी, आधी रात को देनी थी। मैं भूल गया।"

"तू भूला नहीं," मैंने कहा। "तूने जान-बूझकर नहीं दी।"

मेनेजर ने आँखें नीची कर लीं। फिर एक तरफ़ हट गया और रास्ता छोड़ दिया।

हम सरोज को लेकर नीचे उतरे। रसोई से गुज़रते वक़्त वो दोनों औरतें अब भी बर्तन माँज रही थीं, जैसे कुछ हुआ ही न हो। चंदा दरवाज़े पर खड़ी थी, आँखें फैली हुई।

"जल्दी," उसने कहा।

पिछले फाटक तक पहुँचे। रीना गाड़ी के पास खड़ी थी — मुझे देखते ही दौड़ी आई। सरोज को देखकर उसका हाथ मुँह पर चला गया।

"इसे गाड़ी में लिटाओ," मैंने कहा।

हमने सरोज को पीछे की सीट पर लिटाया। रीना पीछे चढ़ी और सरोज का सिर अपनी गोद में रखा। चंदा सामने बैठी। बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की।

फाटक से निकलते वक़्त मैंने पीछे देखा। मेनेजर दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ में फ़ाइल। वो हिला नहीं।

गाड़ी शहर की तरफ़ भागी। सरोज की साँसें धीमी थीं, पर चल रही थीं। रीना उसका माथा सहला रही थी।

"माँ…" सरोज ने धीरे कहा।

"मैं हूँ," रीना ने कहा। "मैं रीना हूँ। तुम आराम करो।"

सरोज ने आँखें खोलीं। उसने रीना को देखा, फिर मुझे। उसके होंठ हिले।

"पापा का काग़ज़…" वो फुसफुसाई।

"अभी मत बोलो," मैंने कहा।

"नहीं।" उसने मेरी कलाई पकड़ ली। उसकी पकड़ कमज़ोर थी, पर ज़िद्दी। "सुन। कल रात… जब मैं सीढ़ियों पर थी… मैंने एक काग़ज़ देखा। मेज़ पर पड़ा था। उस पर पापा का नाम था।"

मेरी साँस रुक गई।

"कौन सा काग़ज़?" मैंने पूछा।

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