The Token System124 / 1154

The Token System – Chapter 124

7 min read November 6, 2026

"बसवा?" मैंने पूछा।

"हाँ। रसोई में काम करती थी, पर उसने होम के मेनेजर से झगड़ा किया। रात की मरीज़ों की लिस्ट देख ली थी। उसके बाद गायब।"

"किसने भेजा?"

"मेनेजर ने। पर अब मेनेजर भी नहीं है।"

विक्रम ने कुर्सी पीछे सरका दी। "मेरी माँ के बारे में कुछ पता?"

औरत ने उसकी तरफ़ देखा। "तू सरोज का बेटा है?"

"हाँ।"

"तेरी माँ को तीन महीने रसोई के पीछे वाले कमरे में रखा था। वही कमरा जहाँ गंगा थी। मैं उन्हें खाना देती थी।" उसने टोकरी नीचे रखी। "तेरी माँ ने एक दिन मुझसे कहा था — जो बही तेरे पापा ने लिखी, वो भवानी ने पढ़ ली। और जो पन्ना सबसे ज़रूरी था, वो उसने छुपा दिया।"

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। "कौन सा पन्ना?"

"पता नहीं। उसने बस इतना कहा था — 'तीन हिस्से थे। माँ, बेटा, बेटी। और चौथा हिस्सा ज़मीन का। भवानी ने ज़मीन का पन्ना निकाल लिया।'"

बंसी ने गिलास रखते-रखते कहा, "यानी बही अधूरी है।"

"बही अधूरी नहीं है," औरत बोली। "पन्ना निकाला गया है। जिस दिन वो पन्ना मिलेगा, बही फिर पूरी हो जाएगी।"

मैंने विक्रम की तरफ़ देखा। उसके होंठ काँप रहे थे।

"मेरी माँ ने बही पढ़ी थी?" वह बोला। "तो वो जानती है कि कौन सा पन्ना गायब है?"

"जानती होगी," औरत ने कहा, "पर वो अब बता सकेगी — यही सोचकर मैं आई हूँ कि तू ज़िंदा है।"

वो टोकरी उठाकर चली गई। बंसी ने चाय ख़त्म की।

"बसवा," मैंने कहा। "चंदा वहीं है।"

"हो सकता है।"

"बंसी, आज दोपहर में चलेंगे।"

"और भवानी का वकील? वो सुबह आठ बजे अदालत में तेरे पापा के काग़ज़ पर रोक लगाने की अर्ज़ी लगाएगा।"

"तो लगाने दे। मेरे पास असली नक्शा है। और अब एक औरत का नाम भी है जो बताएगी कि पन्ना कहाँ गया।"

मैं घर लौटा तो रीना दरवाज़े पर खड़ी थी। हाथ में मेरी जैकेट थी, जिसकी जेब भारी थी।

"ये क्या है?" उसने जेब से छोटी पोटली निकाली। नोटों की थी, और एक चाकू।

"रीना—"

"मन्नू, तू होम में घुसने की बात कर रहा है, बंदूक लेकर नहीं, चाकू लेकर। क्यों?"

"क्योंकि वहाँ कोई अब भवानी का नहीं रहा। पर कोई तो है जो सब चला रहा है।"

"और तू अकेला जाएगा?"

"बंसी और विक्रम साथ हैं।"

रीना ने चाकू मेज़ पर रख दिया। "तू मेरा भाई है, मन्नू। तेरे पापा गए और नहीं लौटे। तू भी…?"

"मैं लौटूँगा।"

"वादा कर।"

"वादा।"

वह कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने पोटली उठाई, चाकू निकालकर अपनी जेब में रखा, और बाक़ी पोटली मेरे हाथ में थमा दी।

"अगर तू इस काम में जाता है," उसने कहा, "तो मैं भी साथ चलूँगी।"

मैं रुका। "रीना—"

"मैं तेरी बहन हूँ, तेरा साया नहीं। जिस दिन तू गया था भवानी के होम की तरफ़, उस दिन मैं यहीं खड़ी रो रही थी। अब नहीं रोऊँगी।" उसने दुपट्टा ठीक किया। "मैं वहाँ रसोई में जाऊँगी। औरतों से औरत ही बात कर सकती है। तू बाहर रहना।"

माँ दरवाज़े पर आई। उसने रीना की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।

"मैं बही अपने पास रखूँगी," उसने कहा। "तू जो पन्ना ढूँढने जा रहा है, वो मिलेगा तो मुझे लाना।"

"क्यों?"

माँ ने पोटली खोली, पापा की कलम निकाली। "क्योंकि जो पन्ना निकाला गया था, उस पर तेरे पापा की लिखाई है। और उसे पढ़ने के बाद ये कलम जिसके हाथ में आएगी, उसी को हिसाब बाँटना होगा।"

मैंने कलम ली। वो ठंडी थी। पर मेरी जेब में जो टोकन था, वो हल्का गरम हुआ। मैंने जेब छूई। टोकन चुप था। पर गरम था।

बाहर बंसी की गाड़ी का हॉर्न बजा। रीना ने दुपट्टा सिर पर ओढ़ा।

"चल," उसने कहा।

मैंने माँ की तरफ़ देखा। उसने आँखें बंद कीं, होंठ हिले — जाने क्या कहा। फिर वो दरवाज़े के अंदर चली गई, और बही अपनी छाती से लगाए खड़ी रही।

गाड़ी में विक्रम पीछे बैठा था। रीना आगे बैठी। बंसी ने गाड़ी चलाई।

रास्ते में बंसी ने कहा, "बसवा सात कोस है। पर मुझे वहाँ का रास्ता पता है। पहले मैं वहाँ सुनीता के काग़ज़ों के लिए गया था।"

"बसवा में किसका घर?"

"बुढ़िया का। सुनीता की माँ। और वहीं चंदा को रखा गया है।"

विक्रम ने पीछे से कहा, "मन्नू, अगर मेरी माँ का नाम उस सूची में है, तो उसका हिसाब कैसे बराबर होगा?"

मैंने मुड़कर देखा। "जब वो गाँव के सामने बोलेगी। जो उसने देखा, जो उसने भुगता। भवानी ने उससे जो छीना, वो सब सबके सामने आएगा।"

"और तेरा हिसाब?"

मैं रुका। "मेरा?"

"हाँ। टोकन तेरे पास है। तूने जो कमाया, वो किसके नुक़सान से कमाया?"

गाड़ी की खिड़की से हवा आ रही थी। मैंने जेब में हाथ रखा। टोकन गरम था, पर फिर भी चुप।

"मेरा हिसाब," मैंने कहा, "अभी बाकी है।"

बंसी ने गाड़ी मोड़ दी। सामने बसवा की पगडंडी दिख रही थी, और उस पगडंडी के किनारे, एक टूटे मंदिर के नीचे, एक बुढ़िया चूल्हे पर कुछ उबाल रही थी। रीना ने मेरी तरफ़ देखा।

"मन्नू," उसने कहा, "वो औरत पहचानी लग रही है।"

मैंने गाड़ी रोकने को कहा।

बुढ़िया ने सिर उठाया। उसकी आँखें धुँधली थीं, पर आवाज़ साफ़ थी।

"तू कन्हैया का पोता है," उसने कहा। "तेरे पापा ने मुझसे कहा था — जिस दिन ये आए, इसे चंदा के पास भेज देना।"

मैं गाड़ी से उतरा। "चंदा कहाँ है?"

बुढ़िया ने चूल्हे की आग की तरफ़ इशारा किया। "पीछे झोपड़ी में। पर जल्दी कर। सुबह होते-होते कोई उसे लेने आएगा।"

"कौन?"

बुढ़िया ने कुछ नहीं कहा। बस आग में लकड़ी डाल दी।

रीना ने मेरा हाथ पकड़ा। "मैं साथ चलूँगी।"

"रीना—"

"मैंने कहा था, मन्नू।" उसने दुपट्टा कसा। "अब मत रोक।"

झोपड़ी का दरवाज़ा खुला था। अंदर से धुएँ की महक आ रही थी। मैंने अंदर कदम रखा, और मेरी जेब में टोकन ठंडा हो गया।

झोपड़ी के अंदर अंधेरा था, बस एक मिट्टी का दीया जल रहा था। कोने में एक औरत बैठी थी, सिर झुका, हाथ बँधे हुए। उसका चेहरा पतला था, आँखें डरी हुईं।

"चंदा?" मैंने धीरे से कहा।

उसने सिर उठाया। पहले मेरी तरफ़ देखा, फिर रीना की तरफ़। फिर वो रो पड़ी।

"तुम कौन हो?" उसकी आवाज़ काँप रही थी।

"मैं कन्हैया का बेटा हूँ। मन्नू।"

वो एकदम खड़ी हो गई। हाथ बँधे थे, इसलिए लड़खड़ाई। रीना ने उसे सँभाला।

"कन्हैया… कन्हैया ने कहा था कि कोई आएगा," चंदा ने कहा। "वो मुझसे मिलने आते थे। पिछले महीने। कहते थे — चंदा, जो मैंने देखा है, वो मैं लिख रहा हूँ। जिस दिन ये बही पूरी होगी, उस दिन सब सामने आएगा।"

"तुमने क्या देखा था?"

चंदा ने रीना की तरफ़ देखा। रीना ने कहा, "मैं उसकी बहन हूँ। जो तूने भुगता है, वो मेरे भाई ने भी भुगता है। बोल।"

चंदा ने आँसू पोंछे। "मैं भवानी के होम में रसोई में काम करती थी। दस साल। पहले सब ठीक था। फिर भवानी लड़कियों को गाँव-गाँव भेजने लगी। कहती — ये शादी के लिए जा रही हैं। पर वो शादी नहीं थी।"

मेरा हाथ मुट्ठी में बंध गया।

"मैंने एक दिन देखा," चंदा ने कहा। "एक लड़की रात में रो रही थी। मैंने उसे पानी दिया। भवानी को पता चला। उसने मुझे रसोई से निकाल दिया, और कहा — चंदा, तूने देखा है, अब तेरा हिसाब बाकी है। फिर बंसी के आदमी मुझे यहाँ ले आए।"

"कितनी लड़कियाँ?" रीना ने पूछा।

"मैंने गिनना बंद कर दिया था। पर एक कॉपी थी रसोई में, जिसमें खर्च लिखा जाता था। लड़कियों के नाम नहीं, बस गाँव के नाम और साइकल का किराया। साइकल! जैसे लड़कियाँ सामान हों।"

मैं उसकी तरफ़ झुका। "वो कॉपी कहाँ है?"

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