The Token System123 / 1154

The Token System – Chapter 123

7 min read November 6, 2026

"पर ठाकुर के पास ज़मीन का असली काग़ज़ नहीं है," मैंने कहा। "और जब तक वो नहीं है, उसका कारोबार काग़ज़ पर टिका है। एक झटके में गिर जाएगा।"

शालिनी मेरी तरफ़ आई। उसके हाथ काँप रहे थे।

"मन्नू, मैंने बहुत बड़ी गलती की।"

"तूने अपने भाई के लिए की थी। बैठ जा। पुलिस वाले अब इसको ले जाएँगे। तेरा भाई ठीक है। सुमन देख रही है।"

पुलिस भवानी को ले गई। मैं शालिनी को अस्पताल छोड़कर घर लौटा। रात के ग्यारह बजे थे। रीना दरवाज़े पर खड़ी थी।

"देर हो गई," उसने कहा। "माँ परेशान थी।"

माँ चारपाई पर बैठी थी। बही उसके हाथ में थी, पर इस बार खुली हुई। वो उसे पढ़ रही थी। मुझे देखकर बही बंद कर दी।

"क्या हुआ?" मैंने पूछा।

"कुछ नहीं।"

"माँ, तूने बही खोली थी।"

"हाँ।"

"क्यों?"

वो थोड़ी देर चुप रही। फिर उसने बही मेरी तरफ़ बढ़ाई।

"मैंने सोचा आज फिर से देखूँ।"

मैंने आख़िरी पन्ना खोला। वही तीन लाइनें। वही तारीख़। पर उसके नीचे, स्याही सूखी थी, एक नई लाइन जुड़ी थी। या शायद पहले से थी और मैंने देखी नहीं थी।

"माँ, यहाँ कुछ और है।"

"मैंने भी देखा," माँ ने कहा। "तभी तुझे बुलाया था।"

मैंने पढ़ा — "हिसाब बाँटने वाला अगले सोमवार आएगा। उसे ज़मीन नहीं चाहिए। उसे सच को गाँव के सामने रखना है। वो और कोई नहीं, इस घर का ही कोई है।"

मैंने बही बंद की। घर के बाहर हवा चल रही थी। खिड़की का परदा हिला।

"माँ," मैंने कहा, "अगला सोमवार पाँच दिन बाद है।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें सूखी थीं, पर होंठ काँप रहे थे।

"मुझे डर है, मन्नू।"

"डर किस बात का? हम जीत रहे हैं। भवानी पकड़ा गया, सोनल जेल में है—"

"इस बात का नहीं।" उसने बही पर हाथ रखा। "इस बात का कि ये लाइन आज नहीं थी। कल नहीं थी। सालों से नहीं थी। और अब … ये आई है। जैसे कोई बाहर से लिख रहा हो।"

मैंने गौर से देखा। स्याही पुरानी थी, पर वो दूसरी स्याही से मिलती-जुलती नहीं लगती। जैसे किसी ने पहले से लिखी किसी बात को मिटाकर फिर लिखा हो।

"माँ, अगर कोई लिख रहा है, तो लिखने वाला कहीं तो है।"

"कहाँ?"

"आस-पास।" मैंने खिड़की से बाहर देखा। "या शायद इस घर में।"

रीना ने बाहर दरवाज़े की तरफ़ देखा। "मन्नू, ऐसा मत कह।"

मैंने बही को खोलकर आख़िरी पन्ने को रोशनी में रखा। उँगली फेरी। नई स्याही की लाइन में एक चीज़ अलग थी — उसका रंग थोड़ा नीला था। पुरानी स्याही काली थी।

"ये किसकी लिखाई है?"

माँ उठी, अलमारी के करीब गई, एक टिन का डिब्बा निकाला। उसमें पुराने काग़ज़, तस्वीरें थीं। उसने एक पर्ची निकाली। पापा की लिखाई में माँ को लिखी चिट्ठी। "देख," उसने कहा, "तेरे पापा की कलम में स्याही नीली थी।"

मेरे हाथ रुक गए।

"तो ये लाइन…"

"तेरे पापा की लिखाई लग रही है," माँ ने कहा। "पर ऐसा कैसे हो सकता है?"

रीना ने कहा, "शायद कोई उनकी नक़ल कर रहा है।"

"या…" मैंने घर के बाक़ी लोगों की तरफ़ देखा। "या फिर पापा ने ये लाइन कहीं और लिखी थी, और कोई इसे इस बही में पहुँचा रहा है।"

खिड़की के बाहर पेड़ की छाया दीवार पर पड़ रही थी। चाँद ऊपर था। मुझे नींद नहीं आ रही थी।

मैंने बही सीने से लगाई। मन ही मन सोचा — अगले सोमवार, गाँव के सामने, उस ज़मीन का हिसाब खोलना है। और चाहे वो लिखने वाला कोई भी हो, चाहे वो पापा का पुराना हिस्सा हो या कोई और — मुझे वो सच बाहर लाना है।

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उसके हाथ में वो पर्ची थी, पापा की, नीली स्याही में।

"मन्नू," उसने कहा, "तेरे पापा ने शायद जान-बूझकर इस बही में ये सब छोड़ा था। जानते हुए कि एक दिन कोई इसे खोलेगा। और वो कोई तू है।"

मैंने बही

॥

मैंने बही सीने से नहीं हटाई थी, पर माँ अब मेरे सामने बैठी थी और उसकी निगाहें उसी आख़िरी पन्ने पर टिकी थीं। मैंने बही को मेज़ पर रख दिया। पन्ना पलटा।

वही तीन लाइनें। वही नीली स्याही। पर उसके नीचे, दूसरी तरफ़, कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं देखा था। एक छोटी सूची — पापा के हाथ की लिखाई में। चार नाम। दो पर कलम फेरी हुई थी, दो खुले पड़े थे।

मैंने पढ़ा — "गंगा।" कटा हुआ। "सुनीता।" कटा हुआ। और फिर, फिर से, बिना कटा हुआ — "सरोज।" और नीचे, चौथा — "चंदा।"

"माँ," मैंने कहा, "ये सरोज का नाम है। विक्रम की माँ।"

माँ ने बही अपने हाथ में ली। उसकी उँगली सूची पर फिरी।

"ये वो औरतें हैं," उसने कहा, "जिनका हिसाब तेरे पापा बराबर करना चाहते थे। दो कर पाए, दो नहीं।"

"गंगा तो अभी हमारे सामने थी। उसका हिसाब…"

"गंगा का हिसाब हो गया, मन्नू। वो तीन महीने बंद रही, फिर छूटी, फिर बच्चे मिले। तेरे पापा ने उसकी लाइन काट दी थी। सुनीता की भी।"

"क्यों काटी?"

"क्योंकि उनका हिसाब बराबर हो गया था।" माँ ने बही मेरी तरफ़ बढ़ाई। "जो नहीं हुआ, वो खुला छोड़ दिया। सरोज का नहीं हुआ। और चंदा का भी नहीं।"

"चंदा कौन है?"

माँ कुछ देर चुप रही। बाहर हवा ने खिड़की का किवाड़ा खटखटाया।

"पता नहीं। पर नाम के आगे एक जगह लिखी है — भवानी होम, रसोई, सुबह की सब्ज़ी।"

मैं उठ खड़ा हुआ। "मतलब वो अभी भी उसी होम में है।"

"हो सकता है।"

रीना दरवाज़े पर आ गई। हाथ में चाय का कप था, पर उसने रख दिया।

"क्या बात है? रात के दो बज रहे हैं और तुम दोनों बही के ऊपर झुके हो।"

"रीना," मैंने कहा, "कल सुबह मुझे होम जाना है।"

"फिर से?"

"आख़िरी बार। मुझे चंदा नाम की औरत मिलनी है। पापा की सूची में उसका नाम है। और सरोज का हिसाब बाकी है।"

रीना मेज़ के पास आई। "सरोज तो छूट गई। भवानी जेल में है। अब क्या बाकी है?"

"भवानी जेल में है, पर उसका हिसाब अभी बंद नहीं हुआ। सरोज ने जो भुगता, वो किसने लिखा? उसका पैसा किसने खाया?"

रीना ने मेरी तरफ़ देखा। "तू पापा बन रहा है, मन्नू।"

"नहीं, मैं उनका काम पूरा कर रहा हूँ।"

माँ उठकर अलमारी के पास गई। उसने एक छोटी पोटली निकाली, कपड़े में बँधी हुई। मेरे हाथ में रखी।

"क्या है?"

"तेरे पापा की कलम। नीली स्याही। और उनका पुराना हिसाब का काग़ज़ — जिन औरतों का हिसाब बाकी था, उनके नाम।" उसने मेरी आँखों में देखा। "मैं डरती थी इसे देने से। पर अब लगता है वो तेरे लिए ही छोड़ गए थे।"

मैंने पोटली खोली। एक कलम, सूखी स्याही। और एक मुड़ा काग़ज़ — बही के पन्ने जैसा। उस पर सरोज का नाम, और उसके नीचे एक लाइन — "जो काम अधूरा छोड़ा, वो तेरे सामने खुला है।"

"माँ," मैंने कहा, "ये तो अभी लिखा हुआ लगता है।"

"वही तो।" माँ ने कहा। "इसीलिए तुझे बुलाया था।"

सुबह छह बजे बंसी की दुकान पर मैं और विक्रम पहुँचे। विक्रम ने सिर पर कपड़ा बाँधा था, आँखों में नींद नहीं थी।

"माँ ठीक है?" मैंने पूछा।

"बुआ के घर है। डर रही है, पर ठीक है।" वह रुका। "मन्नू, तूने कहा था कि मेरी माँ का हिसाब खुलेगा।"

"हाँ।"

"तो आज?"

"आज।"

बंसी ने तीन गिलास चाय रखे। "मैंने रसोई की उन दो औरतों को खबर भेज दी है। जो सुबह सब्ज़ी लेने आती हैं, वो मेरी जान-पहचान है।"

"क्या कहा?"

"कि होम में एक औरत है, चंदा, जिसका हिसाब बाकी है। जो भी उससे मिलवा सके।"

विक्रम ने चाय नहीं पी। "चंदा कौन है?"

"मुझे भी नहीं पता," मैंने कहा। "पापा की सूची में उसका नाम है। भवानी के होम में रसोई में काम करती है।"

तभी सब्ज़ी की एक औरत दुकान के सामने आई। सिर पर गमछा, हाथ में टोकरी। बंसी ने इशारा किया। वो अंदर आई।

"चंदा दीदी तो पिछले हफ़्ते से गायब है," उसने कहा। "कहते हैं उसे बसवा भेज दिया।"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho