The Token System – Chapter 12
मैंने टोकन को खाँचे के करीब लाया।
और तभी पीछे से आवाज़ आई —
"तो तुम भी वही हो।"
मैं पलटा।
दरवाज़े पर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। सत्तर के आसपास। हाथ में लाठी। सफ़ेद बाल। आँखें तेज़।
"काकी —?" मैंने धीरे से कहा। ये वही औरत नहीं थी जिसे मैं खेत्री में मिला था। ये कोई और थी।
वो हँसी। "मैं काकी नहीं हूँ। मैं वो हूँ जिसे तेरे दादा ने बंधक बनाया था।"
मेरा हाथ रुक गया।
"क्या?"
"तेरे दादा ने मुझे यहाँ बाँधा था। रात भर। और सुबह छोड़ा — ये कहकर कि हवेली की तरफ़ देखा भी तो जान से हाथ धोना।" उसकी आँखें चमकीं। "पर मैंने देखा। मैंने सब देखा। तेरे दादा ने क्या छुपाया था, वो भी देखा।"
वो लाठी टेकती हुई आगे आई।
"और अब," उसने धीरे से कहा, "तू उसी दीवार के सामने खड़ा है। जिसने मेरी ज़िंदगी बर्बाद की।"
मैं पीछे हटा। पीछे दीवार थी। कोई रास्ता नहीं।
मेरी जेब में टोकन — ठंडा हो गया।
॥
बूढ़ी औरत की लाठी फ़र्श पर टिकी तो आवाज़ हुई — ठक। मैं दीवार से चिपक गया।
"डर मत," वो बोली। "मैं तुझे कुछ नहीं करूँगी। मैं तो बस देख रही हूँ, तेरे दादा की शक्ल आज भी वैसी ही है या बदल गई।"
"मेरे दादा मरे हुए बारह साल हो गए, काकी।"
"तो मर गए। अच्छा किया।" उसने लाठी आगे बढ़ाई और मेरी जेब की तरफ़ इशारा किया। "वो निकाल। जो जेब में तप रहा है।"
मैंने टोकन निकाला। ठंडा था, पर उसकी नज़र पड़ते ही फिर गरम हुआ। हल्का सा।
"यही है," वो फुसफुसाई। "यही। मैंने इसे पचास साल पहले देखा था। तेरे दादा के हाथ में। उस रात।"
"कौन सी रात?"
"जिस रात उन्होंने मुझे इस कमरे में बंद किया।" उसने लाठी से पीली दीवार की तरफ़ इशारा किया। "वो खाँचा देखा? उसमें से दो निकले थे। दो। एक तेरे दादा ने लिया। एक… मैंने।"
मेरा हाथ रुक गया।
"तुमने?"
"मैं इस हवेली में काम करती थी। पचास साल पहले। जब ये हवेली सेठ गोवर्धनदास की थी। वो बूढ़ा आदमी जो हिसाब रखता था। गरीबों का पैसा जोड़कर। ब्याज नहीं लेता था, बस हिस्सा लेता था — जो कमाए, उसमें से कुछ उसके पास, कुछ उनके पास। उसके पास दो टोकन थे। दोनों इसी दीवार में।"
"दो टोकन?"
"हाँ। दो।" उसने लाठी से दीवार पर दूसरी जगह ठोका। वहाँ भी एक खाँचा था — छोटा, लगभग मिटा हुआ, पर था। "ये दूसरा। ये अब खाली है। पचास साल से खाली।"
मेरी साँस फूलने लगी।
"सेठ मरने से पहले दोनों टोकन अलग-अलग हाथों में देना चाहता था। ताकि हिसाब दो जगह से चले। पर उसके भतीजे ने हवेली पर कब्ज़ा कर लिया। वो भतीजा — भवानी सिंह का दादा था।"
मैं दीवार से सट गया।
"तो भवानी के पास…"
"पास क्या, पचास साल से उसके खानदान के पास चल रहा है।" वो हँसी — सूखी हँसी। "और वो तेरे दादा जैसा नहीं है। तेरे दादा ने एक बार इस्तेमाल किया, फिर डर गए, इसे दीवार में छुपा दिया। भवानी के दादा ने… उसने कभी नहीं छुपाया। उसने बस काम दूसरों से करवाया।"
"करवाया मतलब?"
"मतलब — जो काम खुद करना था, वो किसी मजबूर से करवाया। नुक़सान उस पर बैठा। पैसा उसके खाते में आया।" उसने मेरी तरफ़ झाँका। "तेरे हाथ में जो है, वो इस्तेमाल करने की चीज़ है। भवानी के पास जो है, वो इस्तेमाल कराने की।"
"तुम्हें ये सब कैसे पता?"
"क्योंकि मैंने उस रात सब देखा था। सेठ मरने वाला था। उसने तेरे दादा को बुलाया — वो यहाँ माली था। सेठ ने कहा — जो मेरा हिसाब है, वो दो हिस्सों में है। एक तू रख, एक भवानी के दादा के पास जाए। पर शर्त एक — जो कमाए, उसमें से हिस्सा उस तक पहुँचाए जिसकी ज़रूरत है। वरना खाता भारी होगा।"
"और फिर?"
"फिर सेठ मर गया उसी रात। भवानी के दादा ने तेरे दादा को बंधक बना लिया। मुझे भी। कहा — टोकन दे दे। तेरे दादा ने नहीं दिया। उन्होंने मुझसे एक काग़ज़ पर हस्ताक्षर करवाए — कि मैं गवाह नहीं रहूँगी। फिर मुझे छोड़ दिया। धमकाकर।" उसने लाठी उठाई। "मैं यहाँ से गई। फिर कभी नहीं आई। पचास साल। आज तेरे दादा की शक्ल देखकर लौट आई।"
"तुम्हें कैसे पता कि मैं आज आऊँगा?"
"मुझे नहीं पता था। मैं तो यहाँ आती रहती हूँ। महीने में एक बार। इस दीवार को देखने। ये मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी गलती है — वो काग़ज़ जिस पर मैंने हस्ताक्षर किए।" उसकी आवाज़ धीमी हुई। "आज रात मैंने यहाँ रोशनी देखी। सोचा, कोई और आया है। तो मैं आई।"
"काकी, मुझे वो काग़ज़ चाहिए।"
"कौन सा?"
"जिस पर तुमने हस्ताक्षर किए थे। अगर वो काग़ज़ मिल जाए, तो साबित हो जाएगा कि भवानी का खानदान पचास साल से हड़प रहा है।"
वो चुप हो गई। फिर बोली, "वो काग़ज़ भवानी के दादा ने जला दिया होगा।"
"नहीं जलाया।" मैंने जेब से दादा का नया काग़ज़ निकाला। जो छोटू की माँ ने दिया था। "ये देखो। मेरे दादा की लिखाई है। 'हम दो, हिसाब बराबर — भवानी, तेरा हिसाब मेरे पास है।' मेरे दादा ने कुछ छुपाया था। वो कहीं है।"
वो काग़ज़ उसने हाथ में लिया। उँगलियाँ काँप रही थीं।
"तेरे दादा… उन्होंने मुझे कभी नहीं बताया कि उन्होंने कुछ बचाया है।"
"क्योंकि उन्हें भी डर था।" मैंने काग़ज़ वापस लिया। "पर अब डरने का वक़्त नहीं है। दो दिन बीत चुके। भवानी के आदमी छोटू की माँ को उठाने आ रहे हैं। मेरी बहन की शादी की धमकी दी है। और शेखर बाबू मेरी माँ का रिकॉर्ड दबा रहा है।"
"शेखर?" वो चौंकी। "वो चश्मे वाला? जो अस्पताल में बैठता है?"
"तुम उसे कैसे जानती हो?"
"वो भी तो इसी हवेली का था। पहले। उसका बाप यहाँ चौकीदार था। शेखर बच्चा था तब। मैंने उसे देखा है — उस रात। वो कोने में खड़ा रो रहा था।"
मेरे हाथ से टोकन फिसल गया।
मैंने उसे उठाया। उस पर लिखा था — एक लाइन। मैंने पढ़ा।
"भवानी के पास सबूत है — तेरे दादा का लिखा।"
मैंने आँखें मींच लीं।
"क्या बकवास है ये? भवानी के पास सबूत है — और वो मुझे धमका रहा है?"
"वो धमका नहीं रहा," बूढ़ी औरत बोली। "वो तुझे तेरे ही हथियार से डरा रहा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"काकी, तुम मेरे साथ चलोगी? थाने?"
वो हँसी। "पचास साल बाद? मैं मरने वाली हूँ, लड़की।"
"मरना किसे है? मुझे भी नहीं। पर मेरी बहन की शादी है। एक औरत जिसका आदमी मर गया हवेली पर — वो गवाही देने को तैयार है। अगर तुम भी खड़ी हो जाओ, तो भवानी का हिसाब सामने आ जाएगा।"
वो देर तक देखती रही। फिर लाठी टेककर बैठ गई — दीवार के सहारे।
"तेरे दादा जैसा है तू। ज़िद्दी।"
"नहीं, काकी। मेरे दादा डर गए थे। मैं नहीं डरूँगा।"
"…कल सुबह दस बजे। थाने के बाहर। अगर मैं आई, तो समझ लेना मेरा हिसाब भी बराबर करना है।"
मैंने सिर हिलाया। फिर पीली दीवार की तरफ़ देखा।
"एक बात और। वो काग़ज़ — जिस पर भवानी के पास सबूत है — कहाँ हो सकता है?"
"तेरे दादा ने मुझे कभी नहीं बताया। पर उन्होंने एक बार कहा था — 'जो चीज़ हवेली की है, हवेली में रहेगी। जो चीज़ हिसाब की है, हिसाब में रहेगी।'"
"हिसाब में?"
"उसका सबसे पुराना हिसाब। सेठ की बही। मैंने उसे बहुत साल पहले देखा था — नीचे के रिकॉर्ड कमरे में।"
नीचे? मैंने रिकॉर्ड कमरे के बारे में सोचा — जहाँ शेखर बैठता है। वो कमरा। शेखर।
"मैं यहाँ से जा रहा हूँ," मैंने कहा।
"अब?" वो चौंकी। "रात के दो बज रहे हैं।"
"तो क्या? शेखर की शिफ़्ट अभी खत्म नहीं हुई होगी।"
"तू पागल है।"
"यही तो मेरा सबसे बड़ा हुनर है।"
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