The Token System – Chapter 1151
"नाम भी अमर है," औरत ने कहा। "पर वो कोई और है।"
मैं हँसा नहीं। मैंने बच्चे की नाड़ी देखी, आँखों में टॉर्च डाली। फिर सिस्टर को बुलाया। "वार्ड तीन खाली है? इसे तुरंत अंदर ले जाओ। पर्ची मेरे नाम से काटो।"
बुज़ुर्ग की आँखें भर आईं। "डॉक्टर, मेरे पास पैसे—"
"पैसा आपका नहीं है," मैंने कहा। "किसी और का है। उससे ले लेंगे।"
उसी पल फ़ोन बजा। सुमन का नंबर था। "तुम फ़ॉर्मलिटी में मत उलझो," उसने कहा। "इमरजेंसी के बाहर एक आदमी खड़ा है — वही अमर है। कह रहा है डॉक्टर साहब से बोलिए, जो खर्चा, मेरे नाम पर लिख दे।"
मैं बाहर गया। सात साल बाद अमर को देखा। वो दुबला हो गया था, हाथ जेब में, कमीज़ के बटन आधे खुले।
"तू खुद क्यों नहीं आया अंदर?" मैंने पूछा।
"क्योंकि तेरे अस्पताल की रौनक मैं खराब नहीं करना चाहता," वो हँसा। पर हँसी कमज़ोर थी, आधी रास्ते में रुक गई।
"अमर, सीधी बात कर। मरीज़ कौन है?"
"बता दूँगा। पहले एक टहल।"
हम पीछे के पार्किंग की तरफ़ गए। उसने सिगरेट निकाली, फिर रख दी, फिर निकाली। मैंने कहा, "यहाँ मना है।"
"पता है," उसने कहा। "इसीलिए मैंने निकाली ही नहीं।" फिर बोला, "बंसी ने तुझे बताया होगा, नर्सिंग होम अब कम्मो देवी के नाम है।"
"बताया।"
"कम्मो देवी ने मुझे रख लिया। बोली — तू ठीक से काम सीख। मैं सीख रहा हूँ, मन्नू। खून देखकर हाथ काँपते थे, अब नहीं काँपते। सुबह छह बजे जाता हूँ, रात दस बजे लौटता हूँ। मुझे अच्छा लगता है।"
मुझे यही सुनना था और यही डर भी था। भवानी के गुंडे का बेटा, जो कभी दूसरों का मुँह तोड़ता था, अब खून देखकर काँपता था और फिर नहीं काँपता।
"तो मरीज़ कौन है?" मैंने फिर पूछा।
वो चुप हो गया। दो मिनट। तीन। फिर बोला, "भवानी।"
मेरे पैर जम गए।
"कहाँ है वो?"
"शहर में नहीं है। पर जो उसे शहर से बाहर ले गया, उसने छोड़ दिया। वो लौट आया है। और मन्नू…" उसकी आवाज़ टूटी। "वो बीमार है। बात करना कम कर दिया है। बिस्तर से उठता नहीं। राजेंद्र ने कल रात मुझे फ़ोन किया।"
"तूने देखा है उसे?"
"अभी नहीं। राजेंद्र कह रहा है सुबह ग्यारह बजे लाएगा। बैक गेट से। बोल — तेरे अस्पताल के सबसे गंदे कमरे में रखना। ताकि किसी की नज़र न पड़े, और इलाज भी हो जाए।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। "तू भवानी को मेरे अस्पताल भेज रहा है। तू जानता है ये क्या मतलब है?"
"जानता हूँ," उसने कहा। "कल अदालत में मैंने उसके ख़िलाफ़ गवाही दी। आज वो मेरे सामने बिस्तर पर लेटा है। तू बता — मैं उसका इलाज छोड़ दूँ?"
अंदर से सिस्टर भागी आई। "डॉक्टर साहब, बच्चे की हालत बिगड़ रही है।"
मैं दौड़ा। अमर भी पीछे आया। वो दरवाज़े पर रुका। मैंने कहा, "अंदर आ।"
"मैं? मरीज़ के सामने?"
"तू इंसान है," मैंने कहा। "खड़ा रह, कुछ मत बोल।"
बच्चे को साँस नहीं आ रही थी। मैंने सिस्टर से कहा, "ऑक्सीजन, अभी।" बच्चे की छाती पर हाथ रखा, गिना, फिर तेज़ी से मुड़ा। "इंजेक्शन लाओ।" कमरे में सब भाग रहे थे। अमर दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ जोड़े हुए — जैसे मंदिर में खड़ा हो, बस मूर्ति की तरफ़ नहीं, बच्चे की तरफ़ देख रहा था।
बीस मिनट बाद बच्चे की साँस सीधी चली। बुज़ुर्ग फूट-फूटकर रोई और मेरे पैर छूने लगी। मैंने हटाया।
"पैर मत छुओ," मैंने कहा। "आशीर्वाद दो, डॉक्टर का पैर छूना अच्छा नहीं लगता।"
वो हँसी, आँसुओं में से।
अमर बाहर निकला। मैं पीछे गया। "अब बता," मैंने कहा। "भवानी को लाने का पक्का इरादा है?"
"हाँ।"
"तो एक बात साफ़ कर ले," मैंने कहा। "मैं उसे छिपाऊँगा नहीं। अगर पुलिस पूछेगी, मैं झूठ नहीं बोलूँगा। पर जब तक वो मेरे बिस्तर पर है, मैं उसे डॉक्टर की तरह देखूँगा — न कोई नफ़रत, न कोई हिसाब। हिसाब तेरे और उसके बीच चुकता है। मेरा काम इलाज है।"
अमर ने हाथ बढ़ाया। मैंने मिलाया। उसकी हथेली कड़ी थी, मेहनत से।
"मन्नू," वो बोला, "तूने मुझे कभी गिराया नहीं। उस दिन अदालत में भी नहीं। मैं ये भूलूँगा नहीं।"
"भूल," मैंने कहा। "भूलने से ही तो माफ़ी शुरू होती है।"
दोपहर में सुमन मिली। वो काग़ज़ों का एक बंडल लेकर आई। "भवानी की चिट्ठी अदालत पहुँच गई। जज ने पढ़ी, फिर चुप रहे, फिर बोले — 'ये इंसान खुद को सज़ा दे रहा है, हम क्या करें?'"
"मतलब?"
"जमीनें लौट जाएँगी। केस बंद नहीं होगा, पर सज़ा का वक़्त बदलेगा। भवानी ने अपने वकील से कहा है — मेरी तरफ़ से कोई अपील नहीं होगी।"
मैंने कलम जेब से निकाली। सुमन ने देखा। "ये?"
"हवेली की पुरानी कलम है। अब मेरी।"
"तो इससे क्या लिखेगा?"
"मैंने सोचा था पहले ही कुछ लिखूँगा। पर नहीं। अब जब सच पूरा सामने आ जाए, तब।"
सुमन मुस्कुराई। "तुम डॉक्टर होकर भी कितने दार्शनिक हो, मन्नू।"
"डॉक्टर नहीं," मैंने कहा। "ये कलम है, इसका असर।"
ग्यारह बजे राजेंद्र आया। भवानी को स्ट्रेचर पर लेकर। मैंने देखा — वो पहचाना नहीं जा रहा था। हाँ, चेहरा वही, पर आँखें धँसी हुईं। पीला पड़ गया था। हाथ सूखे हुए, नाखून नीले।
"यहाँ ले आओ," मैंने कहा। "वार्ड चार, आख़िरी बेड।"
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। "तू इलाज करेगा?"
"करूँगा।"
"और हिसाब?"
"वो तेरे और उसके बीच है," मैंने कहा। "मैं बीच में नहीं आऊँगा।"
भवानी ने आँखें खोलीं। उसने मुझे देखा। बहुत देर तक। फिर बोला, "तू वही है न? मजदूर का बेटा।"
"हाँ।"
"कलम ले ली?"
"ले ली।"
"अब क्या लिखेगा?"
"जो इलाज कहता है," मैंने कहा। "बाकी सब बाद में।"
वो हँसा — सूखे होंठों से। "हरि सिंह का हिसाब पूरा करने आया है तू?"
"हरि सिंह का हिसाब तो पहले ही पूरा हो गया," मैंने कहा। "मैं तेरा अपना हिसाब लिखूँगा। जब तक तू ठीक नहीं होता।"
शाम को बंसी दुकान पर मिला। उसने चाय रखी और उसकी भाप में कुछ सोचता रहा।
"सुन," वो बोला। "अमर ने तुझे नहीं बताया — भवानी ने भी एक बात कही थी। गाँव में।"
"क्या?"
"कहा था — 'जो कलम मेरे पास थी, अब जिसके पास है, वो मुझसे बड़ा इंसान है। मैं उसका मुँह नहीं देखना चाहता, क्योंकि मैंने उसके बाप को देखा था। वो आँखें मुझे रात में आती हैं।'"
मैंने चाय का कप रखा। "तो भवानी अब भी डरता है।"
"डरता नहीं," बंसी ने कहा। "शर्माता है। डर और शर्म अलग होते हैं, मन्नू।" फिर मुस्कुराकर बोला, "जब तू अपने बाप के बारे में बात करता है, तो तेरी आवाज़ बदल जाती है। पता है तुझे?"
"नहीं।"
"पता है मुझे।"
तभी मेरे मोबाइल पर मैसेज आया। स्क्रीन जल उठी।
अमर का नंबर। लिखा था —
"मैं अमर हूँ। कल तेरे अस्पताल में एक मरीज़ को भर्ती कराना है — पैसा मेरा, इलाज तेरा।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। "कल?"
"कल," बंसी ने कहा। "वो तो आज भी आया था गाड़ी से। पीछे बैठा था राजेंद्र। और साथ में एक औरत थी — कम्मो देवी। उसने भवानी का हाथ पकड़ा था, बोल रही थी — 'तेरे बाप की हवेली में तू लौटेगा, ये कलम वाले ने तय किया है।'"
"कम्मो देवी?" मैंने पूछा।
"हाँ। भवानी से माफ़ी माँग रही थी। बोल रही थी — 'जो किया, वो तेरे बाप ने किया, तू नहीं। तेरे बाप के कारनामों से तुझे हम छुड़ाएँगे।'"
मैं घर लौटा। माँ आँगन में बैठी थी, दीया जल रहा था। मैंने उसके पास बैठकर सारी बात बताई।
माँ ने सुना। फिर बोली, "कल तेरे पापा की बरसी है।"
मैं चुप हो गया।
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