The Token System – Chapter 1150
"मन्नू।"
वो हाथ में फ़ाइल लिए खड़ी थी। चेहरा थका हुआ, पर आँखें तेज़।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"भवानी के केस में अमर गवाही दे रहा है। आज दोपहर दो बजे।"
"अच्छा," मैंने कहा। "और?"
"और भवानी ने ख़ुद अदालत को चिट्ठी लिखी है।" सुमन ने फ़ाइल से एक पन्ना निकाला। "लिखा है — मुझे कोई सज़ा मत दीजिए। ज़मीनें लौटा दीजिए। बाकी मैं अपना हिसाब ख़ुद चुकाऊँगा।"
मैं कुछ देर खड़ा रहा। "भवानी ने ये ख़ुद लिखा?"
"उसके हाथ की लिखाई है," सुमन ने कहा। "मैंने शेखर बाबू से मिलान करवाया।"
मैंने फ़ाइल वापस की। "अमर ठीक है?"
"ठीक है," सुमन ने कहा। "व्हीलचेयर पर है, पर बोल रहा है। और मन्नू — वो भवानी के ख़िलाफ़ नहीं, सच के साथ खड़ा है। यही फ़र्क़ है।"
मैं एक्स-रे कमरे में गया। दिन भर मरीज़ों की लाइन लगी रही। किसी की टाँग, किसी की छाती, एक बच्चे का हाथ। मैंने एक-एक फ़िल्म लगाई, एक-एक रिपोर्ट लिखी। कलम जेब में रही। मैंने उसे एक बार भी नहीं निकाला — क्योंकि आज इस कमरे में सब हिसाब मशीन का था।
शाम छह बजे शिफ़्ट खत्म हुई। मैं सीढ़ियों से उतर रहा था कि फ़ोन बजा। बंसी।
"दुकान पर आ," उसने कहा। "कुछ है।"
मैं बंसी की दुकान पहुँचा। वो खटिया पर बैठा था, सामने चाय रखी थी। मेरे लिए भी एक गिलास।
"भवानी शहर छोड़कर चला गया," उसने कहा, चाय घूँटते हुए।
मैं रुक गया। गिलास हाथ में ही रहा। "कब?"
"आज सुबह। किसी को नहीं बताया। बस राजेंद्र को कह गया — 'जो काग़ज़ मेरे नाम पर हैं, वो सब लौटा देना।'" बंसी ने चाय रखी। "गाड़ी भी नहीं ली। बस पकड़ी।"
"अमर का क्या?" मैंने पूछा।
"वो नर्सिंग होम अब कम्मो देवी के नाम है," बंसी ने कहा। "काग़ज़ भी हो गए। और अमर वहीं काम सीख रहा है — काउंटर पर बैठता है, मरीज़ों के फ़ॉर्म भरता है। अपने हाथ से, अपना हिसाब।"
मैंने चाय पी। गरम थी, तेज़।
"और मीना की माँ?" मैंने पूछा।
"कल गवाही है। तैयार है।" बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, अब जो बचा है, वो तेरे हाथ में है। भवानी का हिसाब बंद हो गया, पर हवेली का हिसाब अभी बंद नहीं हुआ। अभी तो बस वो दीवार सपाट हुई है।"
मैंने जेब से कलम निकाली। बंसी ने देखा।
"ये अब क्या?"
"कलम," मैंने कहा। "हरि सिंह की। भवानी ने भेजी।"
बंसी हँसा। "तो अब क्या? किताब लिखेगा?"
मैंने कलम जेब में रखी। "नहीं। पर जो काग़ज़ आएँगे, उन पर इससे हस्ताक्षर करूँगा। नाम नहीं, हिसाब।"
बंसी ने चाय खत्म की और गिलास रख दिया। "एक बात कहूँ?"
"कह।"
"तेरे पापा ने भी यही सोचा था," उसने कहा। "और उन्होंने उस कलम से हिसाब लिखना शुरू किया, तो काग़ज़ बढ़ते गए। फिर वो ख़ुद दब गए। तू ध्यान रखना — कलम नहीं, आदमी लिखता है।"
मैं हँसा। "तू अब भी वही है, बंसी। हर बात में एक चुटकी।"
"चुटकी में ही सच निकलता है," उसने कहा।
मैं घर लौटा। माँ चूल्हे पर रोटी बना रही थी। मीना आँगन में बैठी थी, मेरी पुरानी पुस्तकें पलट रही थी।
"माँ," मैंने कहा। "भवानी शहर छोड़ गया।"
माँ ने तवा नहीं हिलाया। बस एक पल रुकी, फिर रोटी पलट दी।
"अच्छा किया," उसने कहा।
"तूने सुना?"
"सुना है," माँ ने कहा। "उसने आज सुबह मीना की माँ के घर की तरफ़ भी जाना था।"
मैं रुक गया। "भवानी गया था?"
"नहीं," माँ ने कहा। "उसका आदमी आया था। एक लिफ़ाफ़ा छोड़ गया। मीना की माँ ने खोला — अंदर सिर्फ़ एक लाइन थी — 'तूने जो सुना, वो मत भूलना।'"
मैं आँगन में गया। मीना ने सिर उठाया।
"मेरी माँ को भवानी की चिट्ठी मिली," उसने कहा। "माँ रोई नहीं। बस काग़ज़ तह करके रख लिया।"
"तेरी माँ ठीक है?"
"ठीक है," मीना ने कहा। "कल गवाही देगी। और उसके बाद…" वो रुकी।
"क्या?"
"उसके बाद मैं स्कूल जाऊँगी। माँ कह रही है, अब काग़ज़ खत्म, अब किताब।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "अच्छी बात है।"
रात को मैंने कलम फिर निकाली। मेज़ पर रखी, दीये के पास। माँ आई, मेरे पास बैठी।
"मैंने ये कलम उस दिन भी देखी थी," उसने कहा, "जिस दिन तेरे पापा हवेली से लौटे थे। उन्होंने इसे मेज़ पर रखा और कहा — 'अब मैं इससे कुछ नहीं लिखूँगा।'"
"तो इससे किसने लिखा?" मैंने पूछा।
"हरि सिंह ने," माँ ने कहा। "फिर भवानी के बाप ने। फिर भवानी ने। और अब…"
"अब मैं," मैंने कहा।
"तू इससे पहले सोचेगा," माँ ने कहा। "तभी लिखेगा।"
मैंने कलम उठाई और दीये की लौ के सामने पकड़ी। पीतल पर लौ का हल्का पीला पड़ रहा था।
"माँ," मैंने कहा, "अब हवेली में तहख़ाना खोलना है। वो जो बीस साल से बंद है।"
माँ ने कुछ नहीं कहा। वो उठी, चूल्हे के पास गई, और चूल्हे के पीछे की ईंट हटाकर एक छोटा कपड़ा निकाला। उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ये तेरे दादा की थी," उसने कहा। "उन्होंने कहा था — जिस दिन तू तहख़ाना खोलेगा, उस दिन ये खोलना।"
मैंने कपड़ा खोला। अंदर एक पर्ची थी, और एक छोटी सी तांबे की तश्तरी, जिस पर वही उल्टा कोना-चिह्न खुदा था।
मैंने पर्ची पढ़ी। दादा की लिखाई थी — "बेटा, उस तहख़ाने में सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है। उसमें वो सच है जो तेरे पापा ने कभी मुझसे पूछा नहीं। जब खोलेगा, तो अकेले खोलना। पर खोलने से पहले माँ से कहना।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। "तूने देखा है अंदर?"
"नहीं," माँ ने कहा। "मैंने ताले की तरफ़ देखा है। बस।"
और तभी मेरे मोबाइल पर मैसेज आया। स्क्रीन जल उठी।
"मैं अमर हूँ। कल तेरे अस्पताल में एक मरीज़ को भर्ती कराना है — पैसा मेरा, इलाज तेरा।"
मैंने माँज की तरफ़ देखा। माँ ने भी देखा।
"अमर?" माँ ने पूछा।
"हाँ," मैंने कहा। "वो मरीज़ नहीं भेज रहा। वो हिसाब भेज रहा है।"
मैंने जवाब टाइप किया — "कल सुबह आठ बजे। इमरजेंसी के बाहर। मरीज़ की जान पहले, बाकी बाद में।"
मैंने कलम उठाई। फिर मेज़ पर रख दी।
माँ ने पूछा, "कुछ लिखेगा?"
"नहीं," मैंने कहा। "आज लिखने का नहीं, गिनने का दिन है।"
मीना आँगन से बोली, "मैं भी कल चलूँ?"
"चल," मैंने कहा। "तेरी माँ की गवाही है। तेरे लिए भी तो हिसाब खुल रहा है।"
मीना हँसी। और उसके हँसने में कुछ था — जो उन्नीस साल की उम्र से ज़्यादा पुराना नहीं लग रहा था। जैसे बीस साल से बंद कमरे की हवा, जो पहली बार खिड़की से आई हो।
रात के ग्यारह बजे थे। मैं टोकन जेब से निकालकर मेज़ पर रखा। उस पर उभरे नए शब्द थे — "कल।"
टोकन ठंडा था। न लकीर, न कोई नई इबारत।
मैंने कहा, "ठीक है। कल।"
और बाहर आँगन में दीया जल रहा था — जो माँ ने रोज़ की तरह जलाया था, पर आज उसकी लौ सीधी थी। हवा नहीं लग रही थी। और दीये के नीचे, फ़र्श पर, उल्टा कोना-चिह्न उभरा था — तश्तरी की तरह साफ़। जैसे किसी ने अभी बनाया हो।
मैंने देखा और मुस्कुरा दिया।
क्योंकि हिसाब जब ख़त्म होता है, तो कोई दीया बुझाता नहीं — बस एक दीया और जला देता है।
सुबह छह बजे मैं अस्पताल पहुँचा। गेट पर सिक्योरिटी वाला झुक रहा था, तभी मैंने देखा — बेंच पर एक बूढ़ी औरत बैठी थी, सिर पर फटा दुपट्टा, गोद में एक छोटा बच्चा। बच्चे की साँस भारी चल रही थी। बुख़ार नहीं, कुछ और।
"कब से?" मैंने पूछा।
"कल रात से," औरत ने कहा। "उलटी कर रहा था। मैं उसे लेकर आई, पर काउंटर वाले ने कहा पहले पैसा, फिर पर्ची।"
मैंने बच्चे को गोद में लिया। "अमर?"
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