The Token System – Chapter 1152
"मैंने कभी नहीं सोचा था," माँ ने कहा, "कि इस बरसी पर हवेली का कोई आदमी इलाज के लिए आएगा।" उसने कलम की तरफ़ देखा। "अब तू जानता है, ये कलम अच्छी नहीं है।"
"माँ?"
"हरि सिंह ने इससे अपने बेटे का नाम लिखा — जो कभी पैदा नहीं हुआ। भवानी के बाप ने इससे जमीनें लिखीं — जो कभी उसकी थीं नहीं। मैं डरती हूँ, मन्नू। ये कलम सच लिखती है, पर सच लिखने वाला भी तो इंसान होता है।"
मैंने कलम उठाई। पर्ची खोली। जो पहले शब्द थे — "जो लिखेगा, सोचकर लिखना।" — वो अब भी वहीं थे।
पर उसके नीचे, जो पहले नहीं थे, दो नए शब्द उभरे थे। स्याही के सूखे धब्बे जैसे। लिखे हुए —
"अब गिनती।"
मैंने पर्ची माँ को दिखाई। माँ ने देखा और मुँह पर हाथ रख लिया।
"तूने लिखा?"
"नहीं," मैंने कहा। "ये तो खुद आया।"
माँ ने कलम को छुआ। "तेरे पापा ने कहा था — ये कलम जब खुद लिखने लगे, तो उसका आख़िरी सच आने वाला है।"
"आख़िरी सच?"
"हाँ, मन्नू। हवेली के हिसाब का आख़िरी पन्ना।"
मैंने कलम जेब में रखी। फिर आँगन में आकर खड़ा हुआ। आसमान साफ़ था, दीये की लौ सीधी जल रही थी।
तभी मोबाइल फिर बजा।
अमर का मैसेज —
"मैं अमर हूँ। कल तेरे अस्पताल में एक मरीज़ को भर्ती कराना है — पैसा मेरा, इलाज तेरा।"
नीचे एक लाइन और —
"और मन्नू — मरीज़ भवानी नहीं है।"
मैंने स्क्रीन को देखा। फिर माँ को देखा।
"कौन है फिर?" मैंने टाइप किया।
एक मिनट। दो मिनट। जवाब नहीं आया।
फिर आया।
"हरि सिंह का बेटा — जो कभी पैदा नहीं हुआ था। वो ज़िंदा है, मन्नू। और वो तेरे अस्पताल में भर्ती होना चाहता है।"
मेरे हाथ से मोबाइल फिसला। माँ ने पकड़ा।
"क्या हुआ?"
मैंने माँ को स्क्रीन दिखाई। माँ ने पढ़ा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"ये नाम तो…" वो रुकी।
"कौन है ये, माँ?"
माँ ने आँखें बंद कर लीं। और फिर वो बोली जो मैंने कभी नहीं सोचा था —
"तेरे पापा का सगा भाई।"
॥
माँ की आवाज़ कान में गूँज रही थी — "तेरे पापा का सगा भाई" — और मैं सुबह छह बजे अस्पताल के गेट पर खड़ा था, हाथ में चाय का गिलास, जो ठंडा हो चुका था।
गलियारे में भीड़ कम थी। सफ़ाई वाली औरतें बाल्टी लेकर निकल रही थीं और बाहर बेंच पर मरीज़ों के परिवार बैठे थे, कंबल में लिपटे। मैंने गिलास कचरे के डिब्बे में डाला और अंदर बढ़ा।
तीसरे मोड़ पर वो खड़ा था।
साधारण सफ़ेद कुर्ता, पैरों में सस्ती चप्पल, हाथ में छोटा काला बैग। उम्र पचास के आसपास। चेहरा पतला, आँखें धँसी हुईं — और वो आँखें देखकर मुझे लगा कि मैं किसी को देख रहा हूँ जिसे मैं जानता हूँ, पर पहचानता नहीं। नाक पर चश्मा नहीं था, पर आँखों के नीचे चश्मे की पुरानी लकीरें बनी थीं।
"मनोहर," उसने कहा। आवाज़ धीमी, जैसे बहुत कम बोलता हो।
"तू अमर है?"
"अमर मुझे लेकर आया। बाहर गाड़ी में है। उसने कहा — तू ख़ुद मिल लेना, मैं रास्ते में रुकूँगा।"
"और तू?"
"मैंने सोचा, पहले तुझसे मिलूँ।" उसने बैग दूसरे हाथ में लिया। "एक बूढ़ी औरत मिली थी रास्ते में — बस स्टैंड के पास। पैर टूटा है, पैसा नहीं है। मैंने उसे रास्ते वाली बेंच पर बैठाया है। बोली — अस्पताल ले चल।"
"तू ले आया?"
"मैं घर का नाम लेकर आया हूँ। इलाज के लिए पैसा भी लाया हूँ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "पहले बूढ़ी औरत, बाद में अपना काम। ये तेरी आदत है या आज की सोच?"
उसने कुछ नहीं कहा। बस हल्का सा मुस्कुराया — वैसी मुस्कान जो चेहरे पर ज़्यादा देर नहीं टिकती। और वो मुस्कान मुझे जानी-पहचानी लगी। यही मुस्कान मैंने आईने में देखी थी, बहुत बार।
हम बाहर निकले। बस स्टैंड की बेंच पर एक औरत बैठी थी, उम्र सत्तर के पार, पैर फूला हुआ, साड़ी का पल्लू हाथ में लिपटा। पास में एक बच्ची खड़ी थी — पोती लगी — जो उसके घुटने पर हाथ रखे बैठी थी।
अमर उन्हें इमरजेंसी तक ले गया। मैं साथ था। डॉक्टर सुमन ड्यूटी पर थीं; उन्होंने फ़ाइल उठाई, पैर देखा, और सीधा बोलीं, "एक्स-रे चाहिए। पैर की हड्डी दो जगह से दरार है।"
"कितना लगेगा?" औरत ने पूछा, आवाज़ काँप रही थी।
अमर ने बैग खोला। अंदर से नोटों की गड्डी निकाली — पुराने, मुड़े हुए, कुछ सिक्कों के साथ — और काउंटर पर गिनकर रखे। मैंने गिना: दो हज़ार सात सौ। उसने काउंटर वाले से कहा, "जो बचे, उससे दवा दे देना।"
औरत ने उसका हाथ पकड़ा। "बेटा, तू कौन है?"
"कोई नहीं," अमर ने कहा। "बस रास्ते से गुज़र रहा था।"
वो औरत रो पड़ी। बच्ची ने अमर की तरफ़ देखा, फिर अपनी दादी की तरफ़।
मैंने अमर को कोने में बुलाया। "यह तेरा पहला हिसाब है।"
"क्या?"
"पहला हिसाब। तूने पैसा गिनकर रखा, किसी से कुछ नहीं माँगा, नाम नहीं बताया। यही हिसाब होता है। यही मेरे दादा कहते थे — कमाई का हिस्सा दूसरों तक पहुँचाना। बाकी सब काग़ज़ है।"
अमर हँसा। "तेरे साथ सीखा।"
"मेरे साथ क्या सीखा? मैंने तो तुझे कुछ नहीं सिखाया।"
"तूने वो किया जो कोई नहीं करता," उसने कहा। "मेरे बाप का इलाज किया। मेरे बाप के बाद भी मुझे वही कमरा दिया जहाँ वो था। तूने मुझे इंसान की तरह खड़ा होने दिया, मन्नू — बेटे की तरह नहीं, हिसाब की तरह भी नहीं। बस इंसान की तरह।"
मैंने उसका कंधा थपथपाया। "अब जा। वो औरत अंदर है, उसे डॉक्टर साहब की बात सुननी है और उसे कोई चाहिए जो उसकी भाषा बोले।"
वो मुड़ा, फिर रुका। "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"तूने मेरे बाप को माफ़ कर दिया? सच में?"
मैंने उसकी आँखों में देखा। "माफ़ी काग़ज़ पर नहीं लिखी जाती। माफ़ी जब इंसान सामने खड़ा हो और तुझे उसकी बीमारी दिखे, तब होती है। मैंने उसे वो कमरा इसलिए नहीं दिया कि मैं बड़ा दिल वाला हूँ। मैंने उसे इसलिए दिया क्योंकि मैं जानता हूँ — अगर मैंने उसे बाहर कर दिया, तो मेरे हिसाब में एक और पन्ना जुड़ जाता जो मैं कभी बंद नहीं कर पाता।"
अमर ने सिर हिलाया। कुछ नहीं बोला। अंदर चला गया।
मैं गलियारे में खड़ा रहा। जेब में हाथ गया तो टोकन की ठंडक महसूस हुई। निकाला। पीतल पर कोई नया शब्द नहीं था। बस वही पुरानी लकीरें, और शब्द "कल" — जो कल से वहीं पड़ा था। मैंने टोकन हिलाया। कुछ नहीं। मैंने कान के पास लाया। कुछ नहीं। मैंने जेब में वापस रखा।
वार्ड चार का दरवाज़ा खुला था। मैंने अंदर झाँका।
भवानी बिस्तर पर लेटा था। चादर ठुड्डी तक खींची हुई, आँखें बंद। सिरहाने पर एक गिलास, उसमें पानी आधा। नर्स ने ड्रिप लगाई थी। उसकी साँस चल रही थी, धीमी और लंबी।
मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा। मुझे कुछ कहना था? नहीं। कुछ नहीं। मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया और वापस मुड़ा।
बाहर निकलते वक़्त सुमन मिलीं, हाथ में फ़ाइल। "मन्नू, वो औरत — नाम पूछा तो बोली, गेंदा की बहन है।"
मैं रुका।
"गेंदा की बहन? कहाँ से आई?"
"बस स्टैंड से। कहती है — कहीं से सुना कि इस अस्पताल में एक आदमी हवेली का हिसाब बराबर करता है। उसकी बहन गेंदा ने हवेली में काम किया था। बीस साल पहले। उसके बाद कोई नाम नहीं मिला।"
"उसे अंदर रखो। मैं उससे मिलूँगा।"
सुमन ने फ़ाइल थोड़ी ऊपर की। "और ये — भवानी के ख़िलाफ़ केस का आख़िरी काग़ज़। अदालत ने आज सुबह मंज़ूर कर दिया। सब कुछ लौटाना है — ज़मीनें, काग़ज़, जो भी उसने लिया। वो अपील नहीं करेगा।"
मैंने फ़ाइल नहीं खोली। "पता है।"
"तुझे कैसे पता?"
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