The Token System113 / 1154

The Token System – Chapter 113

7 min read November 6, 2026

हम गाड़ी तक पहुँचे। सरोज पीछे बैठी। बंसी गाड़ी चला रहा था। मैं आगे बैठा, पर दिल पीछे था। मैंने मुड़कर देखा — गली खाली थी।

"माँ," मैंने कहा, "बही में पापा ने तीन हिस्से लिखे हैं। माँ, बेटा, बेटी। क्या तुझे मालूम है?"

सरोज ने आँखें बंद कर लीं। "मालूम है।"

"क्या?"

"वो तीन हिस्से," सरोज ने धीरे से कहा, "भवानी के नहीं हैं। वो पापा की दुकान के हैं। पापा ने लिखा था — अगर मुझे कुछ हो जाए, तो दुकान माँ, बेटे और बेटी में बँटे। भवानी ने वो पन्ना पढ़ लिया था। उसी दिन से वो पापा के पीछे पड़ गया।"

मेरा हाथ गाड़ी की सीट पर जम गया।

"माँ," मैंने कहा, "तो पापा…"

"हाँ," सरोज ने कहा। "पापा भवानी के हाथ से गए थे। पर सबूत कहीं छिपा है। उसी बही के उस आख़िरी पन्ने पर।"

मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन बर्फ़ जैसा ठंडा था। और कान में एक आवाज़ आई — बिलकुल साफ़, जैसे कोई पास में बैठा हो।

"अस्पताल। रात की ड्यूटी। एक नर्स।"

मैंने सुमन का मोबाइल निकाला। समय देखा — एक बज चुका था। अस्पताल अब भी खुला था।

हम अस्पताल पहुँचे। सरोज को एक कमरे में लिटाया गया। सुमन ने देखा और बोलीं, "कुछ नहीं हुआ। बस कमज़ोरी है। एक घंटे में ठीक हो जाएगी।"

मैं बाहर गलियारे में खड़ा था। रात की ड्यूटी में एक नई नर्स दिखी — शालिनी। उसने आज सुबह से छुट्टी माँगी थी, ये सुमन ने पहले बताया था। वो वार्ड में आँखें नीची किए घूम रही थी, हाथ में बही, पर पकड़ ढीली।

मैंने चाय का बहाना बनाया। "शालिनी, कर्मचारी कमरे में चल, चाय पी ले। रात लंबी है।"

वो अंदर आई। चाय का कप उसके हाथ में काँप रहा था।

"मुझे माफ़ कर दे," वो बोली। "मैं नहीं कर सकती।"

"क्या नहीं कर सकती?"

"उसने मेरे घर आदमी भेजे," शालिनी ने कहा। आवाज़ फटी हुई थी। "बोले — हर मरीज़ की जानकारी मेरे नंबर पर भेजो। कौन दाख़िल हुआ, किसकी हालत ख़राब है, किसे छुट्टी मिल रही है। सब। वरना नौकरी जाएगी। और उसके बाद मेरे पिता की दवा भी बंद। मैं क्या करूँ?"

मैंने उसके हाथ से कप लिया और मेज़ पर रखा। "कुछ मत भेजो।"

"वो जान लेगा।"

"जान लेगा," मैंने कहा। "तो जानने दे। पर तेरी जानकारी से वो किसी की जान नहीं लेगा। तू नर्स है। यहाँ भगवान का काम होता है, भवानी का नहीं।"

शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा। फिर वो झुकी और रो पड़ी। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। "टोकन जेब में ठंडा होता है," मैंने सोचा, "पर औरत के आँसू गरम होते हैं। ये ठंडा भी कर देगा।"

शाम को अस्पताल का माहौल बदल गया। बाहर से एक आदमी आया — सफ़ेद कोट में, हाथ में फ़ाइल। बात करने का अंदाज़ ऐसा जैसे यहाँ का मालिक हो। वो सीधे शालिनी के पास गया और काग़ज़ थमा दिया।

"मरीज़ों की लिस्ट," उसने कहा। "आज रात की। जल्दी भेज।"

शालिनी का हाथ काँप गया। उसने काग़ज़ पकड़ा, पर पकड़ नहीं बनी। मैं पीछे से आया और काग़ज़ खींच लिया।

"ये क्या है?" मैंने कहा।

आदमी मुड़ा। उसकी नज़र मुझ पर पड़ी। एक पल वो रुका। फिर होंठ हिले —

"तू वही है न जो हवेली में घूम रहा था? ठाकुर ने तेरे लिए अलग बात कही थी।"

॥

मैंने काग़ज़ अपनी जेब में डाल दिया और उसकी तरफ़ देखा। सफ़ेद कोट वाला आदमी एक कदम आगे बढ़ा, फिर रुक गया, जैसे सोच रहा हो कि हाथ बढ़ाए या मुँह।

"काग़ज़ वापस कर," उसने कहा।

"क्यों?"

"क्योंकि वो अस्पताल का काग़ज़ है, तेरा नहीं।"

"अस्पताल का है, तो अस्पताल के डॉक्टर को दिखाऊँगा," मैंने कहा। "तेरे जैसे आदमी को नहीं, जो सफ़ेद कोट पहनकर फ़ाइल घुमाता है।"

आदमी का चेहरा तमतमा गया। उसने मेरी कमीज़ पकड़नी चाही, पर मैं पीछे हट गया। गलियारे में दो मरीज़ों के परिवार बैठे थे, दोनों सिर उठाकर देखने लगे। एक स्ट्रेचर पास से गुज़रा, उस पर बूढ़ी औरत कराह रही थी, और हम दोनों उसके रास्ते में खड़े थे।

"हटो," स्ट्रेचर ढोने वाले ने कहा।

आदमी पीछे हटा, पर आँखें मुझ पर ही रखीं।

"मैं तुझे आख़िरी बार समझा रहा हूँ," उसने कहा। "जो चीज़ तेरे हाथ में है, उसका इस्तेमाल तू नहीं कर सकता। तेरा दर्जा नहीं है।"

"दर्जा?" मैंने कहा। "मैं यहाँ एक्स-रे टेक्नीशियन हूँ। मरीज़ का फ़िल्म उतारता हूँ। उसी में मेरा दर्जा है। तेरा क्या है?"

"तेरे पापा का भी यही हाल था," आदमी ने धीरे से कहा। "बोलने में अच्छे। टोकन में ईमानदार।" उसने मुस्कुराने की चेष्टा की। "और फिर भी कुछ बाक़ी बचा था। जानता है क्या?"

मेरा हाथ जेब की तरफ़ गया। टोकन ठंडा था। ठंडा ही रहा।

"मुझे मालूम है," मैंने कहा। "तू अभी ये बता — तेरे ठाकुर ने मेरे पापा के नाम पर क्या बोला था? सामने बता, इन लोगों के बीच।"

आदमी एक पल बगल में देखने लगा। भीड़ ने कोई आवाज़ नहीं की। तभी पीछे से पैरों की आवाज़ आई और डॉक्टर सुमन आ गईं। उनके हाथ में स्टेथोस्कोप था, आँखों में नींद का कोई निशान नहीं।

"ये क्या तमाशा है?" सुमन ने कहा। "एक्स-रे कमरे के बाहर भीड़?"

"डॉक्टर साहब," सफ़ेद कोट वाले ने कहा, "ये आदमी…",

"तू रुक," सुमन ने उसकी तरफ़ उँगली की। "तू कौन है?"

"मैं ठाकुर भवानी सिंह के नर्सिंग होम से…"

"मुझे पता है तू कहाँ से है," सुमन ने कहा। "मैंने तुझे वार्ड में किसी और का काग़ज़ पकड़े देखा है, तो ये मेरी नज़र का मामला है। अब सुन — तेरा अस्पताल में कोई काम नहीं। बाहर।"

"डॉक्टर साहब, आपको ठाकुर का नाम मालूम है…"

"मुझे किसी का नाम नहीं चाहिए," सुमन ने कहा। "मुझे भरती मरीज़ का नाम चाहिए। इस गलियारे में मरीज़ हैं, तेरे जैसे फ़ाइल घुमाने वाले नहीं।"

आदमी ने एक पल सुमन को देखा, फिर मुझे। फिर उसकी नज़र शालिनी पर पड़ी, जो पीछे खड़ी काँप रही थी। उसने उसे घूरा, और मुँह हिलाकर ऐसा कुछ कहा जो सिर्फ़ होंठों से बना — शब्द नहीं, धमकी।

"कल तक सोच लेना," वो शालिनी से बोला, इतना धीरे कि बस हम दो ही सुन सके।

फिर वो मुड़ा और बाहर चला गया। सफ़ेद कोट पीछे से किसी ऐसे आदमी की तरह लहरा रहा था जो हारकर भी जीता समझता हो।

सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "काग़ज़ दे।"

मैंने जेब से काग़ज़ निकाला। सुमन ने उसे फैलाकर मेज़ पर रखा। अस्पताल की मरीज़ लिस्ट थी — नाम, उम्र, वार्ड, तारीख़। तीन नामों पर निशान लगा था। तीन नाम, और सबके आगे एक छोटी लाइन, जो मुझे पहले नहीं दिखी थी — "भवानी होम। सुबह।"

सुमन का चेहरा उतर गया। उसने काग़ज़ उठाया, फिर मेज़ पर रख दिया।

"ये तीन नाम…" उसने धीरे से कहा।

"क्या?"

"ये तीन नाम मेरे लिए नहीं," सुमन ने कहा। "मेरे ज़मीर के लिए जाने-पहचाने हैं।"

"मतलब?"

"मतलब ये कि तू अभी कुछ मत पूछ," सुमन ने कहा। उसने काग़ज़ मोड़कर अपनी जेब में डाला। "मुझे ड्यूटी पर जाना है। चार मरीज़ और देखने हैं।"

"सुमन…"

"मन्नू," उसने मेरी बात काटी, "तू अभी जा और उस लड़की को संभाल। वो मरीज़ नहीं, नर्स है — और नर्स का हौसला टूटेगा, तो पूरा वार्ड टूटेगा।"

वो मुड़ी और चली गई। पास के वार्ड का दरवाज़ा खुला और अंदर जाते हुए उसका कंधा एक पल झुका लगा — इससे ज़्यादा मैंने उसके चेहरे पर कभी नहीं देखा था।

शालिनी अब भी वहीं खड़ी थी। मैं पास गया और उसे पकड़कर इमरजेंसी के पीछे वाले कमरे में ले आया, जहाँ कर्मचारी चाय बनाते हैं। वहाँ एक पुरानी कुर्सी थी, टूटी मेज़, और दीवार पर कोई ने चार अक्षर पेंसिल से लिख रखे थे — शायद कोई पुरानी गिनती।

"बैठ," मैंने कहा।

वो बैठी। उसने अपनी उँगलियाँ मेज़ पर रखीं और उन्हें देखती रही।

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