The Token System – Chapter 112
सुमन ने मेरा कंधा पकड़ा। "तो उसे निकलवाना पड़ेगा।"
"कैसे?"
"लैब," उन्होंने कहा। "अस्पताल की लैब में पुराने काग़ज़ों को साफ़ करने का एक तरीका है। स्याही के नीचे की लिखाई पकड़ सकते हैं। पर मैं अभी ड्यूटी पर हूँ — कल सुबह।"
"कल सुबह बहुत देर है," मैंने कहा।
"तो आज रात," सुमन ने कहा। "मेरी ड्यूटी दस बजे ख़त्म होगी। तू बही लेकर आ जा।"
शालिनी ने जेब से काग़ज़ निकाला। "ये?"
"तू रख," मैंने कहा। "किसी को मत दिखाना। और हाँ — आज रात अगर वो आदमी फिर आए, तो कहना मन्नू भैया से बात कर ले।"
शालिनी हँसी। पहली बार। "भैया?"
"हाँ," मैंने कहा। "अभी से तेरा भाई हूँ। अब चल, मरीज़ देख।"
मैं घर लौटा तो शाम हो चुकी थी। माँ बैठी थीं, हाथ में पापा की घड़ी। रीना खाना बना रही थी। बंसी दुकान से लौटा था, हाथ में एक लिफ़ाफ़ा।
"दुकान के शटर के नीचे मिला," उसने कहा।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक फ़ोटो थी — दुकान की, बंसी के हाथ में चाय का गिलास। और नीचे एक लाइन — "चाय बंद कर दे, तो भी हिसाब पूरा नहीं होगा।"
बंसी ने फ़ोटो देखी और हँसा। "ये भवानी की नई चाल है। डराने की।"
"बंसी," मैंने कहा, "आज रात तू दुकान बंद रख। मेरे साथ चल।"
"कहाँ?"
"अस्पताल," मैंने कहा। "लैब।"
रात दस बजे हम अस्पताल पहुँचे। सुमन बाहर खड़ी थीं, हाथ में लैब की चाबी। लैब छोटी थी, एक मेज़, एक लैंप, और अलमारी में शीशियाँ।
मैंने बही खोली और आख़िरी पन्ना सामने रखा। सुमन ने लैंप जलाया और एक शीशी से कुछ बूँदें पन्ने पर डालीं।
"देख," उन्होंने कहा।
स्याही धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी। नीचे से अक्षर उभरे। मैंने पढ़ा।
"हिसाब बाकी। कन्हैया। तीन हिस्से — माँ, बेटा, बेटी।"
"ये क्या है?" बंसी ने कहा।
"ये पापा की लिखाई है," मैंने कहा। "पापा ने लिखा है कि हिसाब तीन हिस्सों में बाँटा जाएगा।"
"किसको?"
"पता नहीं," मैंने कहा। "पर नीचे कुछ और है।"
मैंने लैंप और करीब किया। एक छोटी सी लाइन थी, बहुत हल्की — "जो बही रखे, वो हिसाब नहीं लिखेगा। जो हिसाब लिखे, वो बही नहीं रखेगा।"
सुमन ने लैंप बंद किया। "इसका मतलब?"
"मतलब," बंसी ने कहा, "कि जिसके पास बही है, वो हिसाब का मालिक नहीं। और जो हिसाब लिख रहा है, उसके पास बही नहीं होनी चाहिए। ये तो भवानी के ख़िलाफ़ का सबूत है — वो बही रखता है और हिसाब भी चलाता है।"
मैंने बही बंद कर दी। बाहर आँगन में चाँद निकल आया था। मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था।
"कल सुबह," मैंने कहा, "पहले सरोज को बचाना है।"
विक्रम गेट पर खड़ा था। उसने मेरी तरफ़ देखा। "माँ?"
"हाँ," मैंने कहा। "कल।"
रात गहरी हो चली थी। मैं लैब से बाहर निकला। गलियारे में एक औरत खड़ी थी — पचास के आसपास, सिर पर दुपट्टा, हाथ में थैला। वो मेरी तरफ़ बढ़ी।
"तू मन्नू है?" उसने पूछा।
"हाँ," मैंने कहा। "तू कौन है?"
उसने थैला आगे किया। "ये तेरे लिए है। मैं सरोज के यहाँ काम करती हूँ। भवानी के होम में।"
मैंने थैला खोला। अंदर एक काग़ज़ था और एक छोटी चाबी।
"सरोज ने भेजा है," उसने कहा। "कह रही है — कल सुबह मत आना। आज रात आना। भवानी कल तड़के कुछ करने वाला है।"
मैंने थैला वापस उसकी तरफ़ धकेल दिया। "रुक। पहले बता — सरोज कहाँ है?"
"होम में। पीछे वाले कमरे में। बाहर से ताला लगा है।"
"ताला?"
"हाँ। भवानी ने कहा — बीमार है, किसी से मिलने नहीं देना। पर वो बीमार नहीं है। वो बस…"
औरत रुकी। उसका हाथ काँप रहा था।
"बस क्या?"
"बस डर गई है। बहुत डर गई है। दिन भर कुछ नहीं खाया। पानी भी नहीं। जब मैं खाना ले गई, तो बोली — मन्नू को बता दे। बस मन्नू को।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, ये जाल भी हो सकता है।"
"जाल हो या सच," मैंने कहा, "माँ वहाँ है। मैं जाऊँगा।"
औरत ने काग़ज़ खोला। उस पर एक नक्शा था — होम के पिछले हिस्से का। एक दरवाज़े पर गोला बना था।
"ये पिछला दरवाज़ा," उसने कहा। "रसोई से जुड़ता है। रात को बारह बजे के बाद चौकीदार सो जाता है। चाबी उसी दरवाज़े की है।"
"तू क्यों कर रही है ये?" मैंने पूछा। "अगर भवानी को पता चला तो?"
औरत ने मेरी आँखों में देखा। "मेरी बेटी भी एक होम में काम करती थी। वो भी बीमार पड़ी और किसी ने नहीं पूछा। मर गई।" उसने थैला फिर आगे किया। "अब ले।"
इस बार मैंने ले लिया।
सुमन बाहर आ गई थीं। "मैं साथ चलूँगी।"
"नहीं," मैंने कहा। "तू अस्पताल में रह। अगर हम फँसे, तो कोई तो हो जो पुलिस को बता सके।"
"मन्नू—"
"सुमन," मैंने कहा, "तू डॉक्टर है। तेरे हाथ में जान है। मेरे हाथ में सिर्फ़ ज़िद। ज़िद वाले आगे चलते हैं। जान वाले पीछे रहते हैं।"
उसने मेरी बात मान ली। पर जाते वक़्त उसने अपना मोबाइल मेरी जेब में डाल दिया। "इसमें मेरा नंबर पहले से लगा है। बस हरा बटन दबा दे।"
बंसी और मैं निकल पड़े। रास्ते में बंसी ने कहा, "एक बात बता। तुझे डर नहीं लगता?"
"लगता है," मैंने कहा। "पर डर और भूख एक जैसे होते हैं। जब काम पड़े, तो दोनों पीछे छूट जाते हैं।"
बंसी हँसा। "तू पापा की तरह बोलता है।"
"मैं क्या बोलता हूँ?"
"पापा भी ऐसे ही बोलते थे। बड़ी-बड़ी बातें। जब मैं छोटा था, तब मुझे लगता था वो झूठ बोलते हैं। बाद में समझ आया — झूठ नहीं था। वो बस बोलते थे, इसलिए कि उनसे कोई पूछता नहीं था।"
मैं चुप हो गया। गाड़ी सड़क पर दौड़ रही थी। एक ही बात सोच रहा था — पापा ने बही में तीन हिस्सों की बात क्यों लिखी? माँ, बेटा, बेटी। माँ को मालूम है? या वो भी नहीं जानती?
होम के पीछे गली सूनी थी। एक बंद दुकान, एक कुत्ता, और रसोई की खिड़की से आती हुई पीली रोशनी। बारह बज चुके थे। मैंने चाबी दरवाज़े में डाली। एक ही घुमाव में खुल गया।
अंदर अंधेरा था, बस चूल्हे की आँच बुझ रही थी। बंसी दरवाज़े पर रुका। मैं अंदर बढ़ा। पीछे वाले कमरे की तरफ़ एक छोटा-सा गलियारा जाता था, जिसके आख़िर में एक दरवाज़ा — बाहर से सिटकनी लगी।
मैंने सिटकनी खोली।
"मन्नू?"
आवाज़ इतनी धीमी थी कि पहले लगा किसी और ने कहा। सरोज दीवार के सहारे बैठी थी। एक झाड़ू, एक बाल्टी, और एक टूटी कुर्सी — बस इतना ही था उस कमरे में। उसका चेहरा सूजा हुआ था।
"माँ—"
"मत आ," उसने कहा। "पीछे देख। छत।"
मैंने ऊपर देखा। छत के कोने में एक छोटा सा काला डिब्बा लगा था। कैमरा।
"वो सब देख रहा है," सरोज ने कहा। "यही कहता है — हर वक़्त।"
बंसी ने मेरी कमर पकड़ी। "निकल।"
"नहीं।" मैंने कैमरे की तरफ़ देखा और हाथ उठाकर हिलाया। फिर आवाज़ से बोला, "भवानी जी, मन्नू आया है। अपनी माँ लेने। तेरे कैमरे में मेरी शक्ल अच्छी नहीं आ रही होगी, पर कोई बात नहीं। अगली बार मैं तेरे सामने आऊँगा।"
सरोज ने मेरा हाथ पकड़ा। "पागल हो गया है तू? भाग!"
"माँ," मैंने कहा, "वो भागने से ही तो ये हिम्मत कर रहा है। अब नहीं।"
मैंने सरोज को उठाया। वो बहुत हल्की हो गई थी — जैसे किसी ने उसका बोझ ही उतार दिया हो। बंसी ने दूसरी तरफ़ से सहारा दिया। हम गलियारे से बाहर निकले, रसोई से, पिछले दरवाज़े से। गली में कुत्ता भौंका। पीछे से कोई आवाज़ नहीं आई। न कोई दौड़ा, न कोई चिल्लाया।
यही तो डर की सबसे बड़ी बात थी — भवानी को सब पता था, और वो कुछ कर नहीं रहा था। क्यों?
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