The Token System – Chapter 111
हवेली की सीढ़ी से उतरते वक़्त मेरे हाथ में पोटली काँप रही थी, और माँ मेरे ठीक पीछे थीं। बंसी ने बाहर जाकर देखा कि गाड़ियाँ गईं या खड़ी हैं। वो लौटा और बोला, "दोनों गईं। पर एक आदमी पीपल के नीचे खड़ा था, वो भी चला गया।"
हम सब घर पहुँचे तो रात के दो बज चुके थे। रीना ने चूल्हा जलाया, माँ ने बही मेज़ पर रखी। वो बही इतनी मोटी थी कि मेज़ का पाया दब गया। जिल्द भूरी, किनारे से टूटी हुई, और उस पर धूल की एक मोटी परत।
"खोल," बंसी ने कहा।
मैंने खोली। पन्ने पीले, स्याही फीकी। पहले पन्ने पर सिर्फ़ एक लाइन थी — "सेठ गोवर्धनदास। हिसाब का खाता।" फिर पन्ने पलटते गए। नाम, गाँव, ज़मीन के टुकड़े, अँगूठे के निशान, और हर पन्ने के किनारे एक छोटा सा जोड़।
विक्रम पास बैठा था। उसने उँगली रखी, "ये नाम… ये तो हमारे गाँव का है।"
"पढ़ता जा," बंसी ने कहा।
पचास पन्ने, सौ पन्ने। कुछ पन्नों पर भवानी के दादा की लिखाई थी, कुछ पर हरि सिंह का दस्तख़त। मेरी आँखें जलने लगीं। रीना ने चाय रख दी और मेरे कंधे पर हाथ रखा।
आख़िरी पन्ना आया। मैंने उसे खोला।
वो पन्ना स्याही से भरा था। ऊपर से नीचे तक काला। बीच में कहीं कुछ पढ़ा नहीं जा रहा था।
"ये क्या है?" मैंने कहा।
बंसी ने लैंप पास किया। "कोई जानबूझकर पोत गया है।"
माँ ने झुककर देखा। उन्होंने उँगली से स्याही को हल्का रगड़ा। नीचे से कुछ उभरा। मैंने लैंप और पास किया। स्याही के नीचे से दो लाइनें दिखीं। पहली — "हिसाब बाकी।" दूसरी — "कन्हैया।"
मेरे पापा का नाम।
"बस इतना?" विक्रम ने कहा।
"बस इतना," माँ ने कहा। "और नीचे जो है, वो पढ़ा नहीं जाता।"
मैंने स्याही पर उँगली फेरी। कुछ और था नीचे — मुश्किल से दिखने वाले अक्षर, जैसे कोई जल्दी में लिखकर ऊपर से पोत गया हो। मैंने लैंप की लौ टेढ़ी की। एक शब्द उभरा — "तीन।"
"तीन क्या?" रीना ने पूछा।
"तीन हिस्से," बंसी ने कहा। "या तीन दिन। या तीन आदमी। भगवान जाने।"
मैंने बही बंद कर दी। बाहर आँगन में ठंडी हवा चल रही थी। मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था — पत्थर जैसा ठंडा। सुबह तक वो ऐसा ही रहा।
सुबह छह बजे मैं चारपाई पर पड़ा था कि कान में आवाज़ आई। बहुत धीमी, पर साफ़। "अस्पताल। रात की ड्यूटी। एक नर्स।"
मैं उठ बैठा। टोकन जेब में हिल रहा था, जैसे कोई उसे अंदर से धक्का दे रहा हो।
मैंने मुँह धोया और साइकल उठाई। रास्ते में बंसी की दुकान बंद थी — शटर पर ताला। मैंने साइकल रोकी, ताले को छुआ। ठंडा था। मैं आगे बढ़ गया।
अस्पताल के गेट पर चौकीदार ने सिर उठाया। "इतनी सुबह?"
"ड्यूटी," मैंने कहा।
इमरजेंसी के बाहर डॉक्टर सुमन खड़ी थीं। हाथ में रजिस्टर, आँखों में नींद नहीं।
"तू ठीक है?" उन्होंने पूछा। "कल रात तेरे मोहल्ले में गाड़ियाँ दिखीं थीं, बंसी ने फ़ोन किया था।"
"ठीक हूँ," मैंने कहा। "नई नर्स आई है?"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "शालिनी। आज सुबह से छुट्टी माँग रही है। वार्ड में घूम रही है, आँखें नीची किए। तू उसे जानता है?"
"नहीं," मैंने कहा। "पर मिलना है।"
मैं कर्मचारी कमरे में गया और चाय बनाई। दो गिलास लेकर वार्ड की तरफ़ बढ़ा। शालिनी बेड के पास खड़ी थी, हाथ में पर्ची। उम्र पच्चीस के आसपास, आँखों में डर।
"चाय?" मैंने कहा।
उसने पीछे देखा, फिर गिलास लिया। हाथ काँप रहा था।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"कुछ नहीं," उसने कहा, और गिलास मुँह तक ले गई।
"शालिनी," मैंने धीरे कहा। "मैं मन्नू हूँ। एक्स-रे वाला। मेरे पास भी कुछ लोग आए थे। तू बता, क्या बात है।"
उसने गिलास नीचे रखा। आँखें भर आईं।
"कल शाम दो आदमी घर आए," उसने कहा। "कहा — तू वार्ड में है, हर मरीज़ की जानकारी हमारे नंबर पर भेज। नाम, उम्र, बीमारी, कौन सा डॉक्टर।"
"और न भेजा तो?"
"नौकरी जाएगी," उसने कहा। "और मेरे पापा बीमार हैं। मेरी नौकरी ही सहारा है।"
मैंने उसका गिलास पकड़ा। "कुछ मत भेज।"
"पर—"
"कुछ मत भेज," मैंने दोहराया। "जो करना है, मैं करूँगा। तू बस मरीज़ों को देख।"
वो चुप खड़ी रही। फिर बोली, "तू क्यों करेगा?"
"क्योंकि मेरे पापा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था," मैंने कहा।
दोपहर तक मैंने दो एक्स-रे किए — एक बच्चे का पैर, एक बूढ़ी औरत का सीना। दोनों ठीक थे। तीन बजे मैं कर्मचारी कमरे में बैठा था कि बाहर गाड़ी रुकी।
मैंने खिड़की से देखा। सफ़ेद कोट वाला एक आदमी उतरा। लंबा, पतला, हाथ में ब्रीफ़केस। वो सीधे वार्ड की तरफ़ बढ़ा।
मैं उठा और पीछे-पीछे चला।
वार्ड के दरवाज़े पर आदमी रुका। शालिनी उसके सामने खड़ी थी। आदमी ने ब्रीफ़केस से एक काग़ज़ निकाला और उसकी तरफ़ बढ़ाया।
"ये लिस्ट है," उसने कहा। "आज रात तक भर दे।"
शालिनी ने काग़ज़ पकड़ा। हाथ काँप रहे थे।
मैं पीछे से आया और काग़ज़ खींच लिया।
आदमी मुड़ा। उसकी आँखें छोटी थीं, चेहरा सपाट।
"ये क्या है?" मैंने कहा।
"तू कौन है?"
"मैं?" मैंने काग़ज़ खोला। ऊपर लिखा था — "वार्ड तीन। आज के मरीज़।" नीचे खाली खाने — नाम, उम्र, बीमारी, डॉक्टर, और सबसे नीचे एक खाना — "भेजना है: हाँ/नहीं।"
"मैं मन्नू हूँ," मैंने कहा। "एक्स-रे टेक्नीशियन।"
आदमी का चेहरा ज़रा बदला। उसने काग़ज़ मेरे हाथ से लेने की कोशिश की। मैंने पीछे कर लिया।
"तू वही है न?" उसने धीरे कहा। "जो हवेली में घूम रहा था?"
वार्ड में सन्नाटा छा गया। शालिनी ने बेड का किनारा पकड़ लिया।
"ठाकुर ने तेरे लिए अलग बात कही थी," आदमी ने कहा। "कहा था — ये लड़का ज़िद्दी है, पर इसकी एक आदत है। इसे बातों में ले लो।"
"तो बात कर," मैंने कहा। "क्या बात है?"
आदमी ने ब्रीफ़केस बंद किया। "ठाकुर कहते हैं — तेरे पापा का हिसाब बाक़ी है। तू उसे पूरा करने की सोच भी नहीं सकता। जो काग़ज़ तेरे पास हैं, वो उनके हैं। जो बही है, वो भी उनकी है।"
"बही उनकी है?" मैंने कहा। "बही पर तो मेरे पापा का नाम लिखा है।"
आदमी रुक गया। उसकी आँखों में कुछ बदला।
"तेरे पापा का नाम?" उसने कहा। "पापा का नाम तो हिसाब में है ही नहीं।"
मेरे हाथ से काग़ज़ फिसल गया। शालिनी ने उसे उठाया और अपनी जेब में रख लिया। आदमी ने उसे देखा, फिर मुझे।
"तू ठाकुर के पास चल," उसने कहा। "वो ख़ुद बता देंगे।"
"मैं नहीं चलूँगा," मैंने कहा।
आदमी मुस्कुराया। "तो फिर ये नर्स भेजेगी।" उसने शालिनी की तरफ़ इशारा किया।
"वो कुछ नहीं भेजेगी," मैंने कहा। "और तू अब यहाँ से चल।"
आदमी ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर वो मुड़ा और चला गया। दरवाज़े पर उसने रुककर कहा, "ठाकुर ने कहा था तू ज़िद्दी है। पर एक बात याद रख — ज़िद करने वाले के पास भी कुछ होना चाहिए। तेरे पास क्या है?"
वो चला गया। शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा। "वो कौन था?"
"पता नहीं," मैंने कहा। "पर जो भी था, वो ठाकुर का आदमी था।"
सुमन दौड़ती आईं। "क्या हुआ? मैंने गाड़ी देखी।"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस एक आदमी आया था।"
सुमन ने शालिनी को देखा, फिर मुझे। "तू ठीक है?"
"सुमन," मैंने कहा। "तेरे पास वो काग़ज़ है न — छह बच्चों के नाम वाला?"
"है," उन्होंने कहा।
"आज रात उसे कहीं छिपा दे," मैंने कहा। "अब वो काग़ज़ किसी को दिखाने का वक़्त नहीं है। अभी हमें बचना है।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "कुछ और हुआ है?"
मैंने बही की बात नहीं बताई। बस इतना कहा, "बही खोली। आख़िरी पन्ना स्याही से भरा है। ऊपर 'हिसाब बाकी' लिखा है, नीचे पापा का नाम। और उसके नीचे कोई तीसरी बात छिपी है — जो अभी पढ़ी नहीं जा रही।"
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