The Token System114 / 1154

The Token System – Chapter 114

7 min read November 6, 2026

"जिस काग़ज़ पर मैंने तीन नाम भेजे थे," वो बोली, "उसमें तेरे लिए एक नाम और था।"

"कौन?"

"मैंने उसे साथ नहीं भेजा," शालिनी ने कहा। "उसे छिपा दिया। उसका नाम सरोज है।"

मेरा हाथ कुर्सी के पीछे टिक गया। "सरोज? कैसे?"

"वो लिस्ट में आ गई थी," शालिनी ने कहा। "किसी ने नाम देखकर नीचे का खाना भर दिया — 'आज रात।' मुझे लगा था… मुझे लगा था कि वो कोई और है। पर जब तू उसे गाड़ी में बैठाकर लाया, तो मुझे देखकर लगा — नहीं, यही है। मैंने अपनी बही में उसका नाम काट दिया था, पर जिस काग़ज़ पर भेजने वाला नाम लिखा जाता है, उस पर चला गया।"

"किसने भेजा?"

"मैंने भेजा," शालिनी ने कहा, और उसकी आवाज़ सूख गई। "डर के मारे। पिता की दवा… मुझे मत पूछ तू। मैंने भेजा।"

मैं एक पल चुप रहा। उसकी आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रही थी। जो रोता नहीं, उससे दो सवाल पूछे जाते हैं, सौ नहीं।

"किस नंबर पर भेजा?"

"उसी पर जो भेजने का हुक्म था," शालिनी ने कहा। "पर मैंने एक काम और किया। नाम भेजते वक़्त मैंने उसके सामने एक शब्द नहीं लिखा। सिर्फ़ नाम लिखा। न वार्ड, न बिस्तर।"

"तो?"

"तो वो उसे ढूँढ़ने आएगा," शालिनी ने कहा। "और जब आएगा, तो पहले मुझसे पूछेगा।"

मैंने सोचा। मन में एक बात आई और फिर साफ़ हो गई।

"तू ठीक कह रही है," मैंने कहा। "वो आएगा। पर आएगा तुझसे पूछने, और तू उसे ऐसी जगह भेजेगी जहाँ सरोज नहीं होगी।"

शालिनी ने सिर उठाया। "कैसे?"

"रात भर हम सरोज को इस अस्पताल के उस कमरे में नहीं रखेंगे जहाँ कोई उसे जानता है," मैंने कहा। "मैं अभी सुमन से बात करता हूँ।"

वो उठी। फिर रुकी। "मन्नू भैया," उसने कहा। ये पहली बार था जब उसने इस लहजे में मुझे पुकारा। "उसने कहा था — कल तक सोच लेना। क्या वो मेरे पिता के घर भेजेगा?"

"हाँ, भेजेगा," मैंने कहा। "और उसी वक़्त मैं उसके सामने होऊँगा।"

वो गई। मैं कमरे में अकेला खड़ा रहा। टोकन ने जेब में कोई आवाज़ नहीं दी, बस ठंडा था, जैसे खुद सोच रहा हो कि अब क्या होगा।

एक बजकर चालीस मिनट पर मैं सुमन के केबिन में गया। वो दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ में चाय का कप, और सामने पुरानी फ़ाइलों का ढेर था — उन्हीं में से एक वो काग़ज़ भी था जो उन्होंने जेब में रखा था।

"बैठ," सुमन ने कहा।

मैं बैठ गया। वो भी बैठीं। उन्होंने काग़ज़ निकाला और उसके तीन नामों पर उँगली रखी।

"ये पहला नाम," सुमन ने कहा। "शकुंतला देवी। पैंसठ साल। रात ग्यारह बजे भर्ती हुई। सीने में दर्द। इमरजेंसी में दो घंटे रही। फिर भवानी का होम। चार बजे सुबह उठाई गई।"

"किसने उठाई?"

"यही सवाल है," सुमन ने कहा। "तीन नाम, तीनों रात में। और तीनों के पीछे मेरी लिखाई में एक शब्द है — 'स्टेबल।'"

"स्टेबल मतलब?"

"मतलब मरीज़ ख़तरे से बाहर," सुमन ने कहा। "मैंने छह बार लिखा है — स्टेबल। पर देख, इन तीनों के नाम के आगे भी स्टेबल लिखा है। और भवानी का आदमी इन्हें ऐसा काग़ज़ दे रहा है जिससे लगे कि ये गंभीर हैं। समझा? जो मरीज़ मेरे लिखे हिसाब से ठीक हैं, वो भवानी के होम में हैं।"

"और दूसरा नाम?"

"दूसरा नाम — गेंदा देवी। ये तीसरा — किशन लाल।" सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "किशन लाल मेरा पहला मरीज़ था जब मैं इस अस्पताल में आई थी। पाँच साल पहले। उसने एक बार मेरे लिए बुख़ार में पानी का गिलास रखा था और कहा था — 'डॉक्टर लेट मत आना, मैं नौ बजे सो जाता हूँ।'"

वो रुक गईं। कप मेज़ पर रख दिया।

"तीन में से दो नाम तो मुझे मालूम हैं," मैंने कहा।

"तीसरा भी तुझे मालूम है," सुमन ने कहा। "क्योंकि तीसरा मैंने काग़ज़ पर देखा और मुझे लगा कि मैं अपने ही अस्पताल में अजनबी हो गई हूँ।"

फिर उन्होंने वो बात कही जो मैं सुनना नहीं चाहता था।

"मन्नू, तीन महीने पहले मैंने एक नाम काटा था — सुनीता देवी। तुझे याद है? जिस औरत को तू गंगा समझ रहा था।" सुमन ने अपनी उँगलियाँ मेज़ पर रखीं। "मैंने उसका नाम काग़ज़ से काट दिया था, पर उसका नाम उसी काग़ज़ की नक़ल में चला गया। मैंने उस वक़्त सोचा था कि काटने से रुक जाएगा। नहीं रुका।"

"इसका मतलब?"

"इसका मतलब," सुमन ने कहा, "कि मैं उस लिस्ट का हिस्सा हूँ। पाँच साल से।"

मैं कुछ कहने ही वाला था कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। एक वार्ड बॉय ने सिर डाला। "डॉक्टर साहब, तीस नंबर वार्ड में बच्चा रो रहा है, बुख़ार है।"

सुमन उठीं। "तेरा काम हो गया," उन्होंने कहा। "अभी मुझे जाना है। पर सुन — सरोज को इस अस्पताल में मत रख। मेरे पास एक जगह है।"

"कहाँ?"

"मेरे घर के पीछे वाला कमरा," सुमन ने कहा। "मेरी बुआ का ससुराल था। अब खाली है। बंसी को बोल, वो रात में सरोज को वहाँ ले जाए।"

"तू मदद कर रही है," मैंने कहा।

"मैं हिसाब कर रही हूँ," सुमन ने कहा। "जो नाम मैंने अपनी लिखाई से भवानी के होम तक पहुँचाए हैं, उनका हिसाब।"

वो चली गई। मैं केबिन से बाहर आया और इमरजेंसी के गलियारे में खड़ा हो गया। दो बजने वाले थे। एक स्ट्रेचर सामने से गुज़रा, फिर एक ऑक्सीजन सिलेंडर। पीछे से किसी के चप्पल की आवाज़ आई।

मैंने शालिनी को ढूँढ़ा। वार्ड में नहीं थी। कर्मचारी कमरे में नहीं। फिर मैंने तीस नंबर वार्ड की तरफ़ देखा — अंदर बत्ती जल रही थी, पर दरवाज़ा खुला था। मैं गया।

शालिनी वहाँ अकेली बैठी थी। वार्ड खाली था — बस एक बच्चा सो रहा था जिसका बुख़ार उतर चुका था। उसके हाथ में मोबाइल था, स्क्रीन बंद। वो उसे देख रही थी, और आँसू उसकी नाक से गिरकर मोबाइल पर पड़ रहे थे।

मैं पास गया और उसके बगल वाली कुर्सी पर बैठ गया।

"क्या हुआ?"

"मैंने भेज दिया," शालिनी ने कहा। आवाज़ टूटी हुई थी।

"क्या भेज दिया?"

"आज शाम। जब वो सफ़ेद कोट वाला काग़ज़ लेकर आया था, उससे पहले मैंने…" उसने मोबाइल हिलाया। "मैंने एक नाम भेज दिया था। वो जो लिस्ट मेरे हाथ में थी, उसमें से मैंने एक नाम काट दिया था। पर साथ में मुझे उसका कमरा भी बताना पड़ा। क्योंकि उन्होंने कहा था — 'सिर्फ़ नाम नहीं, जगह भी।'"

"कौन सा नाम?"

शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, होंठ सूखे। उसने एक लंबी साँस ली, जैसे जवाब में उसकी सारी हिम्मत चली जाएगी।

"उस औरत का नाम," वो बोली। "सरोज। मैंने सरोज का नाम, कमरा, वार्ड — सब भेज दिया।"

मैं एक पल के लिए रुका। मेरी उँगलियाँ जेब की तरफ़ गईं। टोकन अब भी ठंडा था, पर जैसे उसमें एक कोना हल्का गरम हो गया हो।

"कब भेजा?" मैंने पूछा।

"शाम को। छह बजे के आसपास।"

"और अब रात के दो बजे हैं," मैंने कहा। "आठ घंटे हो गए।"

शालिनी ने सिर झुका लिया।

मैंने उसका मोबाइल उसके हाथ से लिया। स्क्रीन जलाई। मैसेज का बक्सा खोला। नंबर सामने था — वही नंबर जिस पर सब भेजा जाता था। दो टिक के निशान थे। पढ़ा गया था।

"इस नंबर पर और क्या भेजा?"

"सिर्फ़ यही," शालिनी ने कहा। "मैंने एक नाम भेजा और फिर फ़ोन बंद कर दिया। डर गई थी। सोचा — बस यही आख़िरी बार।"

"अब सुन," मैंने कहा। "तू रो मत।"

"मैं रो नहीं रही," वो बोली, और आँसू फिर गिरे।

"तू रो रही है," मैंने कहा। "और रोने से काम नहीं होगा। एक काम कर — अभी तू उस नंबर पर एक मैसेज और भेज।"

शालिनी ने सिर उठाया। "क्या?"

"लिख — 'सरोज का कमरा बदल दिया गया है। नया कमरा तीस नंबर वार्ड के पीछे वाला है।'"

"पर वहाँ तो कोई नहीं…"

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