The Token System – Chapter 1105
मैंने उसका हाथ कसकर पकड़ा।
"कल सुबह," मैंने कहा। "तेरी गवाही से सब तय होगा। डर मत।"
अमर मुस्कुराया। "मुझे डर नहीं है। बस एक बात पूछनी है — मेरे बाप के बाद, उस हवेली का क्या होगा?"
"जो सही होगा," मैंने कहा। "वो होगा।"
घर लौटते वक़्त रास्ते में बंसी ख़ामोश था। उसकी चाय की दुकान पर आज शटर बंद था, और शटर के नीचे एक पर्ची फँसी थी। बंसी ने उसे खोला, पढ़ा, और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी — "कल के बाद, दुकान फिर से खुलेगी।"
मैंने पर्ची जेब में रखी। "किसकी लिखाई है?"
"कोई नहीं जानता।" बंसी ने कंधे उचकाए। "पर दुकान खुलेगी। यही काफ़ी है।"
घर पहुँचा तो माँ चूल्हे के पास बैठी थी। रीना ने दरवाज़ा खोला, चाय की केतली मेज़ पर रखी थी। मैंने कुर्सी खींचकर बैठते हुए जेब से पोटली निकाली। उसे खोला, और तीनों टोकन मेज़ पर रख दिए।
बंसी ने झुककर देखा।
"तीन?" उसने कहा।
"तीन," मैंने कहा। "एक मेरा, जो दादा ने दीवार में रखा था। एक राघव का, जो पेटी में मिला। और एक —"
"जो भवानी का बेटा लाया था," माँ ने कहा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो चाय की तरफ़ देख रही थी।
"तीनों एक ही दीवार से निकले थे," मैंने कहा। "पर एक साथ नहीं चल सकते। एक खाता, एक हाथ।"
मैंने अपना टोकन उठाया। हथेली पर रखा। पहले तो वो गरम था — हमेशा की तरह। फिर, धीरे-धीरे, उसकी गरमी उतरने लगी। जैसे किसी ने अंदर का दीया बुझा दिया हो। और उस पर जो अंक चमकते थे, वो फीके पड़ गए। सोलह लकीरें रह गईं। सत्रहवीं की जगह ख़ाली थी।
बंसी ने उसकी तरफ़ झाँका।
"सत्रहवाँ नहीं उभरा," उसने धीरे से कहा।
"नहीं उभरेगा," माँ ने चाय का कप मेरी तरफ़ सरकाया। "टोकन का काम ख़त्म। अब तेरा काम शुरू।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"कल अदालत में जो कहेगा, वो तेरे दादा की आवाज़ होगी," माँ ने कहा। "टोकन नहीं बोलेगा। तू बोलेगा।"
रीना ने चार कप मेज़ पर रखे और हमारे बीच बैठ गई।
"एक बात पूछूँ?" उसने कहा।
"पूछ।"
"अगर भवानी सज़ा पा गया, हवेली का हिसाब पूरा हो गया, फिर हम क्या करेंगे?"
मैंने चाय की तरफ़ देखा। फिर टोकन की तरफ़, जो अब ठंडा था — बस पीतल का एक टुकड़ा।
"तू शादी करेगी," मैंने कहा। "माँ गाय का दूध पीएगी, बंसी दुकान खोलेगा, और मैं —" मैं रुका।
"तू क्या करेगा?" रीना ने सिर झुकाकर पूछा।
"मैं अस्पताल वापस जाऊँगा। एक्स-रे कमरे में। मरीज़ आएँगे, मैं उन्हें भेजूँगा — पर इस बार किसी के होम में नहीं, सीधे डॉक्टर के पास।"
माँ हँसी। पहली बार कई हफ़्तों में। छोटी-सी हँसी, जो हवा में कहीं खो गई।
"चल," उसने कहा। "चाय ठंडी हो रही है।"
रात आठ बजे थी जब बाहर गाड़ी की आवाज़ आई। इंजन बंद हुआ — एक बार, ठंडे ढंग से, जैसे किसी ने जान-बूझकर शोर न किया हो। फिर दरवाज़े पर दस्तक हुई। तीन बार। धीमी।
बंसी उठा, पर मैंने उसका कंधा दबाया।
"मैं देखता हूँ।"
मैंने दरवाज़ा खोला।
शुक्ला जी खड़े थे। सफ़ेद शेरवानी नहीं — आज सादा कुर्ता-पाजामा। हाथ में कोई ब्रीफ़केस नहीं। और उनके पीछे —
भवानी सिंह खड़ा था।
हाथ जोड़े हुए। सिर झुकाए हुए। कोई गाड़ी नहीं, कोई सिपाही नहीं, कोई आदमी नहीं। बस वो अकेला — अपनी सत्तर साल की उमर के सारे बोझ के साथ, चौखट पर खड़ा।
मैं कुछ नहीं बोला।
शुक्ला जी ने आवाज़ नीची रखी।
"एक आख़िरी बार मिलना चाहते हैं। बिना शर्त, बिना वकील। मैंने उन्हें रोका, पर वो नहीं माने। मैं सिर्फ़ रास्ता दिखाने आया हूँ।"
भवानी ने सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं, पर सूखी। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरे पीछे खड़ी माँ की तरफ़। फिर ज़मीन की तरफ़।
"तुम्हारी माँ से माफ़ी माँगने नहीं आया," उसने कहा। आवाज़ बैठी हुई थी, धीमी। "माफ़ी माँगने का हक़ मेरे पास नहीं। मैं सिर्फ़ बीस साल का हिसाब बराबर करने आया हूँ।"
माँ दरवाज़े तक आई। वो भवानी के सामने खड़ी हुई — मेरी कंधे के पीछे से। और वो कुछ नहीं बोली। भवानी को देखती रही।
"अंदर आइए," माँ ने कहा।
बंसी ने कुर्सी खींची। भवानी बैठा। कमरे में कोई हलचल नहीं थी। चाय की केतली की भाप अब भी निकल रही थी।
"कल मैं गवाही देने वाला हूँ," भवानी ने कहा। "पर एक बात अभी कहनी है, क्योंकि कल अदालत में अमर बैठेगा।" वो रुका। "जब वो बोलेगा, मैं उसका बाप रहूँगा या नहीं — ये अदालत तय करेगी। पर उसके सामने झूठ नहीं बोलूँगा। मैं उससे एक चीज़ छिपाकर आया था, और वो चीज़ मैं आज तुम्हें देने आया हूँ।"
उसने अपनी जेब से एक मोटा लिफ़ाफ़ा निकाला। पीला, मुड़ा हुआ, मुहर लगा हुआ।
"ये मेरे बेटे अमर के लिए है," उसने कहा। "जिस दिन मैं सज़ा पा जाऊँ, उस दिन अदालत इसे खोलेगी। इसमें मेरे बाप श्रीपत सिंह की कही एक बात है, जो मैंने बीस साल छिपाई।"
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। उस पर कोई नाम नहीं था — सिर्फ़ उलटा कोना-चिह्न।
"अंदर क्या है?" मैंने पूछा।
"एक नाम," भवानी ने कहा। "उस औरत का, जिसने मेरे बाप को हवेली की नींव में कुछ गाड़ने को कहा था। और जिसकी वजह से सुखिया आज ज़िंदा नहीं है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तुम उसे अभी मत खोलना। कल, अदालत में। ताकि अमर सुन सके कि उसका बाप आख़िर किसके डर से चुप रहा।"
माँ ने चाय का कप उसकी तरफ़ बढ़ाया। भवानी ने हाथ बढ़ाया, पर कप को हाथ नहीं लगाया। उसने कप की तरफ़ देखा, फिर माँ की तरफ़।
"मैंने तुम्हारे ससुर को बचाया नहीं," उसने कहा। "मैंने सिर्फ़ ये सोचा कि चुप रहूँगा तो सब बच जाएगा। पर सब नहीं बचा। सिर्फ़ मैं बच गया — और वो भी आधा।"
माँ ने कप मेज़ पर रख दिया।
"अब जाओ," माँ ने कहा। "कल तुम्हारा बेटा सुन रहा होगा। उसके सामने सच बोलना। हमें तुम्हारी माफ़ी से कोई मतलब नहीं। हमें बस हिसाब चाहिए।"
भवानी उठा। दरवाज़े तक पहुँचा। चौखट पर रुका।
"मन्नू," उसने बिना मुड़े कहा। "तुम्हारे पापा ने मुझे एक बार बचाया था — उस रात कुएँ के पास। मैंने उसका एहसान नहीं माना। कल अदालत में, मैं उनका नाम लूँगा। तुम्हारे दादा का नहीं — तुम्हारे पापा का। ताकि सब सुनें कि किशनचंद ने क्या किया।"
वो चला गया। शुक्ला जी भी पीछे-पीछे निकल गए। गाड़ी का इंजन फिर बजा, और रात में घुल गया।
मैं मेज़ पर रखा पीला लिफ़ाफ़ा देखता रहा। उलटा कोना-चिह्न। वही निशान जो टोकन पर है। वही निशान जो पापा की घड़ी पर है। वही निशान जो सबको एक दूसरे से जोड़ता है।
"सोलह लकीरें," बंसी ने धीरे से कहा। "सत्रहवीं तेरे पास है। अदालत में उभरेगी या नहीं?"
मैंने टोकन उठाया। ठंडा था। सपाट। बस पीतल का एक पुराना टुकड़ा।
"नहीं उभरेगी," मैंने कहा। "अब टोकन कुछ नहीं बोलेगा। अब हम बोलेंगे।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"कल सुबह नौ बजे तक सो जाना," उसने कहा। "लंबा दिन है।"
आधी रात को मैंने दरवाज़ा खोला। बाहर कोई नहीं था। सिर्फ़ चौखट पर एक पीली पर्ची पड़ी थी, जो दरवाज़े के नीचे से सरककर आई थी। मैंने उसे उठाया।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी — "हिसाब सुबह खुलेगा। तब तक जो तुमने छिपाया है, वो सामने रखो।"
मैंने पर्ची पलटकर देखी। पीछे कोई सीधा कोना-चिह्न नहीं था।
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