The Token System – Chapter 1104
लड़के ने गला साफ़ किया। “दादी ने कहा, जो हुआ, सब बताना। छिपाना मत।”
बंसी जगदीश को हमारी गाड़ी तक ले आया था। जगदीश ने घड़ी देखी और उसके हाथ काँप गए। “ये… ये सुखिया की है। उसने ये घड़ी पंद्रह दिन की मज़दूरी से ख़रीदी थी। वो रोज़ शाम को इसे पोंछता बैठा रहता था।”
“मोहन सुखिया का पोता है,” सुमन ने कहा।
जगदीश ने लड़के को देखा। फिर उसके पैरों पर झुकने लगा। मोहन ने उसे पकड़ लिया। “अरे नहीं, बाबा, नहीं।”
“मैंने तुम्हारे परदादा को बचाया नहीं,” जगदीश ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी।
“दादी ने कहा था,” मोहन ने कहा, “कि बचाने वाला कोई नहीं था। पर जिसने सच बोला, वही अब बचा रहा है।”
उस शाम हम हवेली पहुँचे। सिपाहियों की फ़ौज थी। जज साहब भी आए थे — चार गाड़ियों में हम सब तहखाने की तरफ़ बढ़े। मशालें जल रही थीं। तहखाने का दरवाज़ा खुला, और अंदर की सील बीस सालों से टूटी नहीं थी।
जगदीश ने रास्ता दिखाया। दीवार के अंत में एक ईंट खिसकी थी। जगदीश ने अपने पुराने पत्थर वाली जगह परीक्षा की तरह हाथ रगड़ा और बोला, “यही। यहीं मैं सोता था।”
एक सिपाही ने ईंट उठाई। नीचे गड्ढा था। उसमें एक लपेटा हुआ काग़ज़ धूल में बैठा था। सुमन ने उसे सावधानी से बाहर निकाला और जज साहब की तरफ़ बढ़ाया।
जज साहब ने काग़ज़ खोला। दो पन्ने थे। पहला — वसीयत पर पुरानी तारीख़। दूसरा — एक अंगूठे के निशान वाला काग़ज़। जिस पर सुखिया के अलावा एक और नाम था। जज साहब ने उसे पढ़ा, फिर धीरे से बोले, “इस पर किशनचंद का हस्ताक्षर है। और गवाह के तौर पर… एक नाम है।”
“कौन?” सुमन ने पूछा।
जज साहब ने हम सबकी तरफ़ देखा। “ठाकुर भवानी सिंह।”
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। भवानी सिर्फ़ वारिस नहीं था — वो उस रात का गवाह था। उसने सब देखा था। और बीस साल चुप रहा।
रात को मैं हवेली के बाहर बरामदे में बैठा था। सुमन आई और पास बैठ गई।
“भवानी ने किशनचंद को मारने का हुक्म नहीं दिया था,” सुमन ने कहा। “हो सकता है उसने बस आँख बंद कर ली थी।”
“आँख बंद करना भी तो कुछ होता है,” मैंने कहा।
“कल अदालत में ये बात खुलेगी। अगर भवानी गवाह था, तो उसका पूरा बचाव ढह जाएगा।”
तभी बंसी दौड़ता हुआ आया। “वो… वो भवानी का लड़का है। अमर। गेट पर खड़ा है।”
मैं उठा। गेट पर एक लंबा-चौड़ा लड़का खड़ा था। सत्रह-अठारह साल। हूबहू भवानी जैसा, पर आँखों में डर था।
“मुझे अंदर आने दो,” उसने कहा। “बाप से मिलना है।”
“वो हिरासत में है,” मैंने कहा।
“मुझे पता है। मैं उससे सिर्फ़ एक बात पूछना चाहता हूँ।”
“क्या?”
अमर ने मेरी आँखों में देखा। “कि उसने सच छिपाया क्यों। मैंने अदालत की ख़बर सुनी है। मेरे बाप ने बीस साल अपने गुनाह ढके। और मुझे आज सब सच्चा-सच्चा चौकीदार के मुँह से पता चला।”
उसकी आवाज़ में गुस्सा था, पर कुछ और भी था। शर्म।
“कल अदालत में आ जाओ,” सुमन ने कहा। “तुम्हारे बाप का सच्चा चेहरा वहीं खुलेगा।”
“मैं आऊँगा,” अमर ने कहा, और मुड़कर चला गया।
अगली सुबह अदालत में भीड़ ज़्यादा थी। तीन कुर्सियाँ ख़ाली थीं जब हम पहुँचे — भवानी की जगह तक सिपाहियों के पहरे में खाली थी। जज साहब आए और बैठ गए।
सक्सेना ने उस काग़ज़ को पेश किया। जज साहब ने भवानी को अंदर बुलाया। भवानी आया — हथकड़ी नहीं, पर सिपाही दोनों तरफ़ थे। उसका चेहरा पिछले दिन से कहीं ज़्यादा थका था।
सक्सेना ने पूछा, “ठाकुर साहब, आपने ये काग़ज़ देखा है?”
भवानी ने नज़रें नीची रखीं। “हाँ।”
“उस रात आप वहाँ थे?”
“हाँ।”
“क्या आपने किशनचंद को रोकने की कोशिश की?”
भवानी कुछ नहीं बोला। अदालत ख़ामोश हो गई।
“जवाब दीजिए, ठाकुर साहब,” जज साहब ने कहा।
भवानी ने हौले से कहा, “मैं बीस साल का था। बाप के सामने खड़ा था। मुझे किसी ने नहीं पूछा था कि मेरी मर्ज़ी क्या है।”
“पर आपने अंगूठा लगवाते वक़्त देखा। आपने सुखिया को भी देखा?” सक्सेना ने पूछा।
भवानी ने सिर उठाया। “जो हुआ, वो मेरी आँखों के सामने हुआ। और मैं चुप रहा। ये मेरी वो गलती है जिसकी सज़ा मुझे चाहिए।”
अदालत में मौजूद भीड़ हिली। किसी ने कहा — “बीस साल बाद…”
“ठाकुर साहब,” जज साहब ने कहा, “आपके बेटे अमर की तरफ़ से एक दरख़्वास्त आई है।”
भवानी का चेहरा बदल गया। “माई लॉर्ड, मैंने कहा था वो इस कमरे में नहीं आएगा।”
“वो इस कमरे में नहीं है। पर उसकी बात सुननी होगी। कलादंड से पहले मैं उसे एक मौक़ा दूँगा।”
“नहीं,” भवानी की आवाज़ भारी थी। “वो बच्चा है। मैं गुनाहगार हूँ, वो नहीं।”
सुमन ने क़लम उठाया। “ठाकुर साहब, आपका बेटा यही कह रहा है — वो गवाही देगा। वो मुझे मिला।”
भवानी ने सुमन को देखा, और उसकी आँखों में पहली बार कुछ ऐसा चमका जो मैंने कभी नहीं देखा था। गुस्सा नहीं, डर नहीं — बस एक टूटी हुई हार।
“फ़ैसला कल सुनाया जाएगा,” जज साहब ने कहा। “और ठाकुर भवानी सिंह… आपको कल तक हिरासत में रहना होगा।”
भवानी उठा। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर सुमन की तरफ़। और फिर पहली बार, उसकी आवाज़ काँपी।
“मुझे हिरासत में रखो,” उसने धीरे से कहा। “पर मेरे बेटे अमर को इस कमरे में मत बुलाना। वो मेरे गुनाहों का हिस्सेदार नहीं है।”
जज साहब ने उसकी तरफ़ देखा और बोले, “अगर वो हिस्सेदार नहीं है, ठाकुर साहब, तो वो कल ख़ुद गवाही देने क्यों आ रहा है?”
॥
शुक्ला जी अपनी सफ़ेद शेरवानी समेटते हुए सीढ़ियों से उतरे, और हम सब अदालत के बरामदे में खड़े रह गए। राजेंद्र के सिपाही भवानी को लेकर पीछे के रास्ते से जा रहे थे। रीना ने मेरी कलाई पकड़ी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"कल सुबह," बंसी ने कहा, और मुँह में तिनका दबा लिया। "दो घंटे की नींद, फिर दोबारा उसी मंच पर।"
सुमन सीढ़ियों से उतरी, हाथ में फाइलें दबाए। आकर सीधे मेरे सामने खड़ी हो गई।
"अमर ने अर्ज़ी डाल दी है," उसने कहा। "सुनवाई में ख़ुद बोलेगा। जज साहब ने मंज़ूर कर दिया है।"
बंसी का तिनका गिर गया। "अमर? भवानी का बेटा? अपने बाप के ख़िलाफ़?"
"उसने ख़ुद लिखवाया है," सुमन ने कहा। "अपनी मर्ज़ी से। इसीलिए भवानी साहब ने आज वो बात कही — बेटे को इस कमरे से बाहर रखो।"
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। दोपहर की धूप छत से टपक रही थी।
"मैं उससे मिलने जाता हूँ," मैंने कहा।
"मैं भी चलूँ?" रीना ने पूछा।
"तू माँ के पास रुक।"
अस्पताल के उस कमरे में अमर व्हीलचेयर पर बैठा था। नर्स ने उसकी पट्टी बदली थी, गर्दन पर सफ़ेद कपड़ा लपेटा हुआ था। वह खिड़की से बाहर देख रहा था, और जब मैंने दरवाज़ा खोला, तो मुड़ा।
उसके चेहरे पर वो डर नहीं था जो कल गेट पर था। कुछ और था। किसी चीज़ का इंतज़ार।
"तुम आ गए," उसने कहा।
"तूने अर्ज़ी क्यों दी?"
अमर ने हाथ आगे बढ़ाया। मैंने कुर्सी खींचकर बैठते हुए उसका हाथ थाम लिया। उसकी हथेली में पसीना था।
"बीस साल," उसने कहा। "मेरे बाप ने बीस साल मुझे अपने काग़ज़ों से बाहर रखा। मुझे लगता था वो मुझे बचा रहा है।" उसने हल्की साँस ली। "पर बचाना और छिपाना एक चीज़ नहीं होती, मन्नू भाई।"
"उसने अदालत में कहा कि तू हिस्सेदार नहीं है।"
"वो सच कहता है। मैं उसके गुनाहों का हिस्सेदार नहीं हूँ।" अमर ने मेरी तरफ़ देखा। "पर मैं उसका बेटा हूँ। और मैंने जो देखा, जो सुना, जो चुपचाप बर्दाश्त किया — वो मेरा हिसाब है। जिस दिन मैं गवाही दूँगा, उस दिन वो मेरे बाप से नहीं, मुझसे जुड़ा होगा।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno