The Token System – Chapter 1103
वही हुआ जो मुझे डर था। भवानी खड़ा हुआ और उसने धीमी आवाज़ में कहा, "मैं नहीं जानता था। मेरे बाप के मुंशी ने ये काग़ज़ बनाए। मैं तो बस हवेली का नाम अपने नाम पर चढ़वा रहा था।"
"झूठ!" बंसी की आवाज़ बरामदे से आई। जज साहब ने घूरा। बंसी चुप हो गया।
तभी अदालत का दरवाज़ा फिर खुला। और ये बार किसी वकील के लिए नहीं खुला।
एक बूढ़ा आदमी अंदर आया, लाठी के सहारे, धीरे-धीरे। उसकी कमर झुकी थी, बाल सफ़ेद, और आँखों के नीचे काले गड्ढे। उसने लाठी की टक-टक से पूरे बरामदे को चुप करा दिया।
"माई लॉर्ड," बूढ़े ने कहा, और उसकी आवाज़ सूखी थी, जैसे बीस साल से इस्तेमाल न हुई हो। "मेरा नाम जगदीश है। मैं बीस साल हवेली के तहखाने में बंद रहा।"
भवानी की कुर्सी खिसकी। सच में खिसकी — पैर फ़र्श पर घसीटे और कुर्सी दो इंच पीछे गई। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"ये कौन है?" शुक्ला चिल्लाया। "माई लॉर्ड, ये कोई गवाह नहीं है, ये कोई पुराना आदमी है जिसे कोई लाया है—"
"मैं ख़ुद आया हूँ," जगदीश ने कहा। "कल रात मुझे कोई हवेली के तहखाने से निकालकर गया। मैं नहीं जानता वो कौन था। पर मैं जानता हूँ कि मुझे वहाँ क्यों रखा गया था।"
जज साहब ने उसे आगे आने का इशारा किया। जगदीश लाठी टेकता हुआ आगे आया और गवाह के बक्स में खड़ा हो गया।
"बीस साल पहले," उसने कहा, "मैं अस्पताल के रिकॉर्ड कमरे का चौकीदार था। शेखर बाबू मेरे साथी थे। उस रात मैंने देखा कि भवानी के बाप के आदमी रिकॉर्ड कमरे से रजिस्टर निकाल रहे थे। मैंने शेखर को बताया। पर उससे पहले कि हम कुछ कर पाते, मुझे उठा लिया गया।"
"किसने उठाया?" जज ने पूछा।
"तीन आदमी थे। एक सफ़ेद कुर्ते में, एक काले कुर्ते में, और एक — जिसका चेहरा मैंने कभी नहीं देखा, क्योंकि वो पीछे बैठा था। मुझे हवेली लाया गया और तहखाने में धकेल दिया गया। वहाँ पहले से एक और आदमी था।"
"कौन?"
जगदीश ने रुककर साँस ली। "मनोहर का पापा। किशनचंद। उन्हें भी उसी रात वहाँ लाया गया था। वो मुझसे बोले — जगदीश, अगर तू यहाँ से निकले, तो ये बात किसी को नहीं बताना। नहीं तो तेरा भी वही हाल होगा जो मेरा हो रहा है।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। सुमन ने मेरा कंधा पकड़ा।
"और फिर?" सक्सेना ने पूछा, आगे झुककर।
"फिर किशनचंद किसी तरह वहाँ से निकल गए। उन्होंने तहखाने का दरवाज़ा खोला और मुझे बाहर जाने का इशारा किया। पर मैं नहीं निकला। मैं डर गया था। और उसके बाद वो दरवाज़ा बंद हो गया। मैं बीस साल वहीं रहा। मुझे खाना ऊपर से मिलता था, एक खिड़की से। भवानी के आदमी आते, खाना रख देते और चले जाते।"
"आपने भवानी को बताया नहीं?" जज ने पूछा।
"माई लॉर्ड, मैंने भवानी को कभी नहीं देखा। मैंने सिर्फ़ उसके आदमियों को देखा। और उनके आदमी मुझसे हमेशा एक बात कहते थे — अगर तू बाहर निकला, तो तेरी बेटी का वही हाल होगा जो तूने सुखिया के साथ देखा।"
भवानी खड़ा हो गया। "माई लॉर्ड, ये सब झूठ है। ये आदमी पागल है—"
"बैठिए," जज साहब ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी। भवानी बैठ गया।
"सुखिया के साथ क्या हुआ?" सक्सेना ने पूछा।
जगदीश ने आँखें बंद कर लीं। "सुखिया हवेली का तीसरा हिस्सेदार था। भवानी के बाप ने उससे काग़ज़ पर अँगूठा लगवाया। वो नहीं लगाना चाहता था। पर उसकी बीवी और बच्चे को धमकाया गया। और जिस रात उसने अँगूठा लगाया, उसी रात उसे कुएँ में धकेल दिया गया। मैं तहखाने की खिड़की से सब सुन रहा था।"
अदालत में पूरी तरह सन्नाटा छा गया। मैंने भवानी की तरफ़ देखा। उसके हाथ मेज़ पर रखे थे और उँगलियाँ काँप रही थीं।
"मेरे पास एक और बात कहनी है," जगदीश ने कहा। "उस रात किशनचंद ने जाने से पहले मुझे एक काग़ज़ दिया था। मैंने उसे तहखाने की ईंट के नीचे छिपा दिया। वो काग़ज़ आज भी वहाँ है।"
जज साहब ने सक्सेना की तरफ़ देखा। "क्या ये काग़ज़ अदालत में पेश किया जा सकता है?"
"माई लॉर्ड, मैं अभी दो सिपाहियों को भेजती हूँ," सक्सेना ने कहा।
"नहीं," जज ने कहा। "मैं ख़ुद चलूँगा। सुनवाई कल सुबह दस बजे तक के लिए स्थगित। और तब तक—"
उन्होंने भवानी की तरफ़ देखा। "ठाकुर साहब, आपको कल तक हिरासत में रहना होगा।"
भवानी खड़ा हुआ। उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा था जो मैंने कभी नहीं सुना — काँपन। "माई लॉर्ड, मुझे हिरासत में रखो। पर मेरे बेटे अमर को इस कमरे में मत बुलाना। वो इस हवेली के झगड़े का हिस्सा नहीं है। उसे बाहर रखो।"
जज साहब ने उसकी तरफ़ देखा, और फिर धीरे से कहा, "अगर वो इस झगड़े का हिस्सा नहीं है, तो उसका नाम इन काग़ज़ों में क्यों है, ठाकुर साहब?"
भवानी कुछ नहीं बोला। उसने सिर झुका लिया। पहली बार, मैंने उसे ऐसा देखा — एक आदमी जो थक गया था। जिसकी लड़ाई ख़त्म हो गई थी। और मुझे नहीं पता कि मुझे उस पर तरस आया या नफ़रत, पर मैंने अपनी नज़रें हटा लीं।
अदालत ख़त्म हुई तो जगदीश मेरे पास आया। उसने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "तू किशन का बेटा है?"
मैंने सिर हिलाया।
"तेरा बाप मुझे बचाने आया था," जगदीश ने कहा, और उसकी आँखों में पानी था। "उस रात वो मेरे लिए दरवाज़ा खोलने वाला था। पर वो ख़ुद फँस गया। मुझे माफ़ कर दे बेटा, मैं उसे बचा नहीं पाया।"
"आपने कुछ नहीं किया," मैंने कहा। "आप भी उसी तरह फँसे थे जैसे वो।"
बंसी ने जगदीश का हाथ पकड़ा और उसे बाहर ले गया। सुमन मेरे पास आई और धीरे से बोली, "जगदीश ने सुखिया का नाम लिया। अगर सुखिया के बच्चे ज़िंदा हैं, तो उनका हिसाब भी इस केस में आएगा।"
"आएगा," मैंने कहा। "पर पहले वो काग़ज़ निकालना है जो किशनचंद ने तहखाने की ईंट के नीचे छिपाया था।"
बाहर निकलते वक़्त मैंने पीछे मुड़कर देखा। भवानी को दो सिपाही ले जा रहे थे। और ठीक उसी वक़्त मेरी जेब में टोकन हल्का गरम हुआ, और उस पर एक शब्द उभरा — "कल।"
टोकन को जेब में रखकर मैं सीढ़ियों से नीचे उतरा। बाहर धूप तेज़ थी, और अदालत के गेट पर भीड़ जमा थी। किसी ने भवानी को सिपाहियों के साथ जाते देख लिया था। अब चारों तरफ़ यही बात फैल रही थी — ठाकुर साहब को हिरासत में लिया गया है।
सुमन मेरे पीछे आई। “लोगों को कुछ नहीं पता, पर मुँह सबके खुले हैं।”
“कल तक सब पता चल जाएगा।” मैंने गाड़ी की चाबी निकाली।
तभी एक लड़का हमारे सामने आकर खड़ा हो गया। पंद्रह-सोलह साल का, फटी कमीज़, हाथ में एक फटा बस्ता। उसने मुझे घूरा, फिर सुमन को।
“तुम वो वकील हो?” उसने सुमन से पूछा। “जो भवानी के ख़िलाफ़ लड़ रही है?”
सुमन ने कहा, “कौन हो तुम?”
“मेरा नाम मोहन है। मैं सुखिया का पोता हूँ।”
मेरे पैर वहीं रुक गए। सुमन की आँखें बड़ी हो गईं।
“तुम्हें कैसे पता?” सुमन ने पूछा।
“दादी बताती थीं। वो छोटी थीं जब उनके पिता को कुएँ में फेंका गया था। उनकी माँ उन्हें लेकर भाग गई थीं। दादी अब तक ज़िंदा हैं। वो चल नहीं सकतीं, पर पूरी बात याद है उन्हें।” लड़के ने बस्ते से एक टूटी हुई घड़ी निकाली। “ये मेरे परदादा की थी। चाचा जी ने बताया कि तुम लोग आज अदालत में हो। दादी ने कहा — जाओ, वो जगदीश को दे दो, वो पहचान जाएगा।”
सुमन ने घड़ी ली और मेरी तरफ़ देखा।
“मोहन,” मैंने कहा, “जगदीश से मिलना है तुम्हें?”
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