The Token System1091 / 1154

The Token System – Chapter 1091

7 min read November 6, 2026

रात ग्यारह बजे हम अस्पताल पहुँचे। वो वही अस्पताल था जहाँ मेरी माँ बीस साल पहले मुझे लेकर आई थी — सरकारी अस्पताल। सामने का फाटक खुला था, पर अंदर पहरा नहीं था।

"ये अजीब है," बंसी ने कहा। "इतनी रात को सरकारी अस्पताल का फाटक खुला?"

"क्योंकि किसी ने खुलवाया है," माँ ने कहा। "चलो।"

अंदर की गलियारे में बत्तियाँ आधी जल रही थीं। रिसेप्शन पर कोई नहीं था। काग़ज़ों की गंध हवा में तैर रही थी।

मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। "कहाँ है गेंदा?"

"ये अस्पताल का पुराना हिस्सा है," शेखर ने कहा। "जो बंद पड़ा है। उसकी तरफ़।"

हम पुराने हिस्से की तरफ़ बढ़े। वहाँ का दरवाज़ा बंद था, ज़ंग लगी ज़ंजीर के साथ। पर ज़ंजीर खुली थी।

"जैसे किसी ने खोल दी हो," बंसी ने फुसफुसाया।

"या कोई हमसे पहले आ चुका है," मैंने कहा।

अंदर घुसे तो एक लंबा गलियारा था, जिसके दोनों तरफ़ बंद कमरे थे। हर कमरे पर नंबर लगा था, सब उखड़े हुए। आख़िरी कमरे का दरवाज़ा खुला था, और उसके अंदर से पीली रोशनी आ रही थी।

"गेंदा?" मैंने धीरे से कहा।

अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई। मैंने दरवाज़ा धकेला।

कमरे के बीच में एक पुरानी लोहे की चारपाई थी, जिस पर सिर्फ़ एक चादर तह की हुई रखी थी। बगल में एक छोटी मेज़ थी, उस पर एक गिलास पानी, एक पुराना दीया जल रहा था, और एक लिफ़ाफ़ा।

"गेंदा?" माँ ने कहा।

कोई नहीं आया।

बंसी ने चारों तरफ़ देखा। "कहीं और होगी।"

मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। उस पर लिखा था — "मन्नू के लिए। मैं जानती थी तू आएगा। पर वो मुझे ले गए।"

"कौन?" मैंने कहा, जैसे लिफ़ाफ़ा ख़ुद जवाब देगा।

लिफ़ाफ़े के अंदर एक छोटी पर्ची थी, जिस पर एक लाइन थी — "तेरे पापा जिस कमरे में आख़िरी बार बैठे थे, वहाँ जा। अदालत के पीछे वाला पुराना कमरा। वहाँ तेरा इंतज़ार कर रही हूँ। और मन्नू — जल्दी कर। वो आदमी मेरे पास आ रहा है।"

"कौन आदमी?"

पर पर्ची का आख़िरी हिस्सा मिटा हुआ था, जैसे किसी ने पानी की बूँद गिरा दी हो।

"अदालत के पीछे वाला कमरा," सक्सेना ने कहा। "वो मुझे पता है।"

"कहाँ?"

"पुरानी अदालत के पीछे, जो कमरा बंद पड़ा है। उसमें बीस साल से कोई नहीं गया।"

"क्यों?"

सक्सेना ने मेरी तरफ़ देखा। "क्योंकि उस कमरे में उस रात के बाद किसी ने क़दम नहीं रखा जिस रात भवानी के बाप की लाश मिली थी।"

माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। "मन्नू, ये जाल है।"

"जानता हूँ, माँ।"

"फिर?"

"गेंदा वहाँ है।" मैंने पर्ची जेब में रखी। "और अगर वो वहाँ है, तो हमारे पास एक गवाह है जिसे भवानी ख़ुद नहीं झुठला सकेगा।"

"अगर वहाँ भवानी का आदमी पहले पहुँच गया तो?"

मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था, पर उसका कोना मेरी उँगली पर चिपक रहा था।

"तो हमें उससे पहले पहुँचना होगा।"

रात बारह बजे हम अदालत के पीछे पहुँचे। रास्ता संकरा था, दोनों तरफ़ ऊँची दीवारें। बंसी ने टॉर्च जलाई, तो सामने लोहे का छोटा दरवाज़ा दिखा, जो अधखुला था।

"खुला है," राजेंद्र ने कहा। "अंदर कोई है।"

मैंने दरवाज़ा खोला। अंदर अंधेरा था, पर कमरे के आख़िरी कोने में एक दीया जल रहा था। उसकी लौ के नीचे एक बूढ़ी औरत बैठी थी — सफ़ेद बाल, झुर्रियाँ, कमज़ोर शरीर, पर आँखें तेज़।

"तू गेंदा है?" मैंने पूछा।

उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर माँ की तरफ़। और उसकी आँखों में पानी आ गया।

"कौशल्या," उसने कहा। "तू आ गई।"

माँ आगे बढ़ीं और गेंदा के पास बैठ गईं। दोनों ने एक-दूसरे को देखा, जैसे पच्चीस साल की ख़ामोशी एक पल में बह गई हो।

"मुझे माफ़ कर दे," माँ ने कहा। "मैं तुझे भवानी के होम से नहीं निकाल सकी।"

"तूने मुझे बचाया था," गेंदा ने कहा। "उसी दिन। तेरे पापा ने नहीं बचाया था।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू मन्नू है?"

"हाँ।"

"तेरे पापा मेरे पास आते थे।" उसकी आवाज़ भर्राई। "वो रोज़ आते थे, मुझे दवा देते थे, और कहते थे — गेंदा, तू मेरी बहन है, मैं तुझे यहाँ नहीं रहने दूँगा।" वो रुकी। "पर एक दिन वो नहीं आए। फिर मैंने सुना — गाड़ी हादसे में मर गए।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "हादसा नहीं था, मन्नू। मैं उस रात वहाँ थी।"

मैं सन्न रह गया। "कहाँ?"

"उसी कमरे में," गेंदा ने कहा। "जहाँ तेरे पापा आख़िरी बार बैठे थे। मैं पड़ोस के कमरे में थी। मैंने दरवाज़े से देखा — तीन आदमी थे। एक तेरा पापा, एक भवानी, और तीसरा…" वो रुकी। "तीसरा वो था जो आज भी ज़िंदा है। और वो अब मुझे ढूँढ रहा है।"

"कौन?" मैंने पूछा।

"वो जिसने उस रात कहा था — 'हिसाब ख़त्म।' " गेंदा ने कहा। "काश मैं उसका नाम जानती। पर मैंने सिर्फ़ उसकी आवाज़ सुनी है। और उसकी आवाज़ आज भी मेरे कानों में है।"

"मेरे यहाँ आने की बात किसने बताई?" मैंने पूछा।

गेंदा ने मेरी तरफ़ देखा। "एक लाठी वाला बूढ़ा। उसने मुझे तेरे लिए पर्ची दी। कहा — गेंदा, तू अपना नाम किसी को बता, मैं तेरे पास ले आऊँगा। "

"वो कौन है?"

"नाम नहीं बताया।" गेंदा ने मेरी तरफ़ देखा। "पर एक बात कही — 'मैं उसका भाई हूँ जिसे सब मरा समझते हैं।' "

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "सुखिया।"

गेंदा ने सिर हिलाया। "उसने कहा — 'मेरा नाम सुखिया नहीं, मैं वो हूँ जो बच गया।' "

मैंने गेंदा की तरफ़ देखा। "उसने कहा कि वो आज रात क्या करेगा?"

"नहीं।" गेंदा ने मेरी तरफ़ देखा। "पर उसने कहा — 'जब तक मन्नू आए, तू यहीं रुक। और उससे कहना — अब वो बात कहने का वक़्त आ गया है।' "

"कौन सी बात?"

गेंदा ने गहरी साँस ली। "वो बात जो तेरे पापा ने बीस साल पहले कहनी चाही थी — पर कहने से पहले उनकी गाड़ी हादसे में मर गई।" उसने मेरी आँखों में देखा। "मन्नू, तेरे पापा को मारने वाला कोई बाहरी आदमी नहीं था। वो कोई ऐसा था जिसे वो भाई कहते थे।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

बंसी ने पहले कुछ कहा। "भाई?"

"हाँ," गेंदा ने कहा। "उन्होंने उस रात कहा था — 'भाई, तू कर क्या रहा है?' और फिर मैंने एक आवाज़ सुनी, और फिर सब ख़त्म।"

मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने टोकन जेब में महसूस किया। वो गरम था।

"कौन है वो भाई?" मैंने पूछा।

"नाम नहीं जानती," गेंदा ने कहा। "पर एक बात जानती हूँ। वो उस रात के बाद कभी शहर में नहीं दिखा। उसकी कोई ख़बर नहीं। कोई काग़ज़ नहीं। जैसे वो आदमी कभी था ही नहीं।"

"या जैसे किसी ने उसका नाम मिटा दिया," माँ ने कहा।

गेंदा ने माँ की तरफ़ देखा। "तेरे पापा ने उसका नाम मिटाया था, कौशल्या।"

माँ ने आँखें झुकाईं।

"मैंने कभी किसी को नहीं बताया," माँ ने धीमी आवाज़ में कहा। "पर अब बताती हूँ।" वो मेरी तरफ़ मुड़ीं। "मन्नू, जिस रात तेरे पापा की गाड़ी हादसे में गई, उस रात मैंने तेरे पापा का एक काग़ज़ छिपाया था। काग़ज़ पर एक नाम था — उस तीसरे आदमी का। पर मैंने उसे जलाया नहीं। तेरे पापा ने कहा था — 'कौशल्या, ये नाम किसी को नहीं बताना, वरना मन्नू को भी वही होगा जो मुझे हुआ।' "

"तो उस काग़ज़ का क्या हुआ?" मैंने पूछा।

"मैंने उसे मोमबत्ती में छिपा दिया था।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "मैंने सोचा — मैं मोमबत्ती उसी दिन जलाऊँगी, जिस दिन तेरे पापा का हिसाब पूरा होगा।"

"वो मोमबत्ती कहाँ है?"

माँ ने अपनी साड़ी के पल्लू से एक छोटी मोमबत्ती निकाली, जो अब तक तह में दबी थी।

"ये," उन्होंने कहा।

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