The Token System – Chapter 1090
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काली गाड़ी की खिड़की से निकला वो हाथ मेरी तरफ़ इशारा कर रहा था, और उँगली पर चमकती पीली अँगूठी देखकर मेरे पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए।
"माँ, तू पीछे रह," मैंने कहा और आगे बढ़ा।
गाड़ी के पास पहुँचा तो हाथ अंदर खिंच चुका था। दरवाज़ा खुला था, सीट ख़ाली। डैशबोर्ड पर एक पुरानी घड़ी रखी थी, बंद। और घड़ी के नीचे दबा था एक पीला लिफ़ाफ़ा, जिस पर सिर्फ़ चार शब्द लिखे थे — "पहले पन्ना, फिर गाड़ी।"
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। उसके अंदर एक और काग़ज़ था, जिस पर उसी उल्टे कोना-चिह्न की मोहर लगी थी, और नीचे लिखा था — "जो बही तूने कल रात देखी, उसका आख़िरी कोरा पन्ना आज रात आठ बजे बोलेगा। उसके पहले अदालत के काग़ज़ सील हो चुके होंगे। जल्दी कर।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। लाठी वाला बूढ़ा अंधेरे में खड़ा था, पर जैसे ही मैंने उसकी तरफ़ कदम बढ़ाया, वो लाठी टेकते हुए गली के अंधेरे में घुल गया।
"जाने दे," माँ ने कहा। "वो ख़ुद आएगा। जब वक़्त होगा।"
"कौन है वो, माँ?"
"जिसका नाम मैंने बीस साल से नहीं लिया।" उन्होंने मोमबत्ती मेरी तरफ़ बढ़ाई। "चल, अदालत। काग़ज़ सील होने से पहले मुझे एक बात देखनी है।"
रात नौ बजे अदालत का आँगन सुनसान था, पर अंदर की बत्तियाँ जल रही थीं। अफ़सर के कमरे के बाहर दो सिपाही खड़े थे। सक्सेना बाहर बरामदे में मिलीं, हाथ में चाय का गिलास, चेहरे पर वो थकान जो बीस साल की फ़ाइलें उठाने से आती है।
"काग़ज़ सील हो गए?" मैंने पूछा।
"हो गए।" उन्होंने गिलास रखा। "अफ़सर तहसील ले गया — तीनों काग़ज़, बही की कॉपी, वो वसीयत। सुबह नौ बजे सुनवाई से पहले कोई उन्हें नहीं छू सकता।"
"तो अब?"
"तो अब वो जो तूने कहा था — बही का कोरा पन्ना।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उन्होंने सिर हिलाया।
हम हवेली पहुँचे तो रात के दस बज चुके थे। गली में पुलिस का एक सिपाही छोड़ा हुआ था, जो हमें देखकर सलाम करके हट गया। अंदर राजेंद्र बैठा था, टॉर्च जला रखी थी।
"बही?" मैंने पूछा।
"जहाँ रखी थी, वहीं।" उसने कमरे की तरफ़ इशारा किया।
बही मेज़ पर खुली पड़ी थी। मैंने पिछला कोरा पन्ना उठाया, और माँ ने मोमबत्ती जलाकर उसके नीचे रखी।
पहले कुछ नहीं दिखा। फिर मोमबत्ती की लौ जैसे हिली, और काग़ज़ पर हल्की भूरी लकीरें उभरने लगीं — जैसे कोई अदृश्य स्याही गरमी से जाग रही हो।
"पढ़," माँ ने कहा।
मैंने पढ़ा। लिखाई छोटी थी, काँपती हुई, पर पहचानी हुई।
"ये पापा की लिखाई है।"
"हाँ।"
पन्ने पर लिखा था — "मैंने आज अपना हिसाब लिखा है, क्योंकि कल मैं शायद न लिख सकूँ। जो मेरे बाद इसे पढ़े — जान ले कि हवेली का असली हिसाब किसी काग़ज़ में नहीं, इस बही में है। हर पन्ने पर एक नाम है, और उस नाम के आगे उसका नुक़सान। जो इस बही को अदालत तक पहुँचा देगा, वो मेरा बेटा है। और अगर मेरा बेटा इसे पढ़े — मन्नू, माफ़ करना। मैं तुझे बचाने के लिए चुप रहा, और चुप रहना मेरी सबसे बड़ी ग़लती थी।"
मेरे हाथ काँप रहे थे। माँ ने मेरा कंधा पकड़ा।
"इसके आगे और है," उन्होंने कहा।
पन्ना पलटा। अगले पन्ने पर एक लिस्ट थी — सत्तर से ज़्यादा नाम, हर नाम के आगे एक तारीख़, एक रकम, और एक शब्द — "ज़मीन", "दुकान", "मरीज़", "गाड़ी", "शादी"।
"ये…" सक्सेना ने पास आकर देखा। "ये तो भवानी की पूरी लूट का हिसाब है। बीस साल का। एक-एक नाम।"
"इसे अदालत में पेश करना होगा," मैंने कहा।
सक्सेना ने मेरी तरफ़ देखा, फिर बही की तरफ़। "मन्नू, अदालत काग़ज़ मानती है — पर काग़ज़ को पहचानने वाला गवाह भी चाहिए। कोई ऐसा जो कहे — मैंने ये बही अपनी आँखों से भवानी के दफ़्तर में देखी थी, और ये उसकी लिखाई है।"
"तो मैं कहूँगा।"
"तू बेटा है। तेरी बात पर सवाल उठेगा। एक बाहरी गवाह चाहिए — ऐसा जो बही की लिखाई और भवानी के दफ़्तर, दोनों को जानता हो।"
तभी दरवाज़े पर हल्की आहट हुई। हम सब पलटे।
शेखर बाबू खड़े थे। बिना चश्मे के, आँखों में पानी भरा, हाथ में एक पुरानी फ़ाइल दबाए। वो ऐसे खड़े थे जैसे कोई बूढ़ा आदमी सालों बाद अपने ही घर का दरवाज़ा खोल रहा हो।
"मैं पहचानता हूँ," उन्होंने कहा। आवाज़ भर्राई हुई थी। "ये बही मैंने बीस साल पहले भवानी के दफ़्तर में देखी थी। उस वक़्त मैं चुप रहा। आज नहीं रहूँगा।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। "अब क्यों बोल रहे हो, शेखर बाबू?"
वो अंदर आए, कुर्सी पकड़कर बैठे। "क्योंकि मेरे बेटे ने आज सुबह फ़ोन किया।" उनकी आवाज़ टूटी। "कहा — पापा, अब मत चुप रहो। बीस साल हो गए।"
बंसी ने उनके कंधे पर हाथ रखा। "बैठो, बाबू। पानी लाता हूँ।"
"पानी नहीं।" शेखर ने हाथ उठाया। "पहले ये देखो।" उन्होंने फ़ाइल मेज़ पर रखी। "मैंने आज शाम भवानी के दफ़्तार जाकर अपनी ड्रॉअर ख़ाली की। रोज़ की तरह दरवाज़ा खुला था। पर मेरी मेज़ पर कोई और बैठा था।"
"कौन?"
"नया क्लर्क। भवानी ने आज सुबह ही मेरा इस्तीफ़ा लिखवा लिया।" शेखर ने अपनी उँगली उठाई, जो काँप रही थी। "मैंने सोचा, ये लड़का यहाँ बैठा है, ये ख़ुद भवानी नहीं — तो भवानी अब किसी बड़े काम में लगा है। और मैं वहाँ से निकला तो दरवाज़े के बाहर बंसी का लड़का मिला। उसने कहा — शेखर बाबू, भवानी के आदमी आज रात बारह बजे कुछ बड़ा करने वाले हैं।"
"क्या?"
"पता नहीं। पर बंसी के लड़के ने सुना — 'अब बही नहीं बोलेगी।'"
सक्सेना ने बही की तरफ़ देखा। "ये बही कहाँ है अभी?"
"अदालत के कब्ज़े में," राजेंद्र ने कहा। "तहसील की तिजोरी में।"
"तो भवानी के आदमी तहसील तक जाएँगे?"
"नहीं।" मैंने कहा। मेरी आवाज़ मेरी ही कानों में अलग लगी। "भवानी बही को जलाने नहीं जाएगा। वो उसे छू भी नहीं सकता — अदालत का मुहर लगा है। वो कुछ और करेगा।"
"क्या?"
मैंने सोचा। पन्ने पर पापा की आख़िरी लाइन याद आई — "जो इस बही को अदालत तक पहुँचा देगा, वो मेरा बेटा है।" और फिर भवानी की बात — "हिसाब तेरे हाथ से करवाऊँगा।"
"वो मुझे रोकेगा।" मैंने कहा। "सुबह नौ बजे की सुनवाई से पहले — मुझे अदालत तक नहीं पहुँचने देगा।"
शेखर ने मेरी तरफ़ देखा। "फिर क्या करेगा?"
"कुछ ऐसा करेगा कि मैं ख़ुद अदालत न आ सकूँ।" मैंने माँ की तरफ़ देखा। "या कोई ऐसा झूठा काग़ज़ पेश कर देगा जो मुझे फँसा दे।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, तूने कुछ ग़लत नहीं किया।"
"ग़लती की बात नहीं, माँ।" मैंने कहा। "भवानी शुक्ला जी को नया गवाह लाने के लिए बोल चुका है। वो झूठे गवाह से मुझे फँसाएगा।"
सक्सेना ने बही की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। "तो अब तुझे वो गवाह चाहिए जो झूठे गवाह के सामने खड़ा हो सके। ऐसा गवाह जिसे भवानी ख़ुद नहीं झुठला सके।"
"कौन?"
सक्सेना ने धीरे से कहा। "गेंदा।"
शेखर उठ खड़े हुए। "गेंदा? वो ज़िंदा है?"
"हाँ," माँ ने कहा। "और वो वहीं है जहाँ मैं बीस साल पहले मन्नू को लेकर गई थी।"
शेखर ने अपनी फ़ाइल खोली। "तो फिर मेरे पास भी एक काग़ज़ है।" उन्होंने एक पुरानी रसीद निकाली। "ये गेंदा के इलाज का काग़ज़ है — अस्पताल का। ये मैंने बीस साल पहले भवानी के दफ़्तर से उठाया था, जब उसने इसे जलाने को कहा था। मैंने जलाया नहीं। मैं डर गया था।"
"अब?"
"अब डर ख़त्म," शेखर ने कहा। "अब सिर्फ़ बेटा बाक़ी है।"
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