The Token System – Chapter 1092
मैंने मोमबत्ती ली। वो भारी थी, जैसे अंदर कुछ हो। मैंने उसे दीये की लौ के पास की, और मोम पिघलने लगा।
"माँ, ये तो…"
"जल्दी कर," माँ ने कहा। "वो आ रहा है।"
मोम पिघला, और उसके अंदर से एक छोटी पर्ची निकली — पीली, जर्जर, मुड़ी हुई। मैंने उसे खोला।
उस पर एक नाम लिखा था।
मेरे हाथ काँप गए।
वो नाम था — "रामदीन।"
मैंने पढ़ा, फिर गेंदा की तरफ़ देखा, फिर माँ की तरफ़।
"रामदीन?" मैंने कहा। "मुझे बताया गया था कि रामदीन हवेली का मिस्त्री था, और वो…"
"वो कुछ और भी था," माँ ने कहा। "वो तेरे पापा का भाई था।"
"भाई?"
"सौतेला भाई," माँ ने कहा। "तेरे दादा ने दूसरी शादी की थी। रामदीन मिस्त्री नहीं था, मन्नू। वो हवेली का हिस्सेदार था — और वो उस रात गाड़ी में बैठा तीसरा आदमी था।"
मैं गेंदा की तरफ़ देखा। "तो पापा को मारने वाला…"
"हाँ," गेंदा ने कहा, और उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। "रामदीन ने ही मारा था।"
बाहर गली में किसी गाड़ी का हॉर्न बजा — एक लंबा, दो छोटे। माँ ने सिर उठाया।
"वो आ गया," उन्होंने कहा।
बंसी ने दरवाज़े की तरफ़ देखा। "कौन?"
"रामदीन," माँ ने कहा। "या उसका कोई आदमी।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, अब हमें बही को अदालत तक पहुँचाना है — और साथ में गेंदा को।"
"अगर वो हमें रोकने आए?"
सक्सेना ने आगे कदम बढ़ाया। "अगर वो रोकने आए," उन्होंने कहा, "तो वो ख़ुद साबित कर देगा कि वो डरा हुआ है। और डरा हुआ आदमी अदालत में हारता है।"
मैंने मोमबत्ती की पर्ची जेब में रखी, और गेंदा की तरफ़ देखा। "गेंदा, तू अदालत में गवाही देगी?"
गेंदा उठी। उसका शरीर काँप रहा था, पर आँखों में अब भी वही तेज़ी थी।
"मैं पच्चीस साल से मरी हुई थी," उसने कहा। "आज ज़िंदा होने का मन है। हाँ, मैं गवाही दूँगी। और सब कुछ बोलूँगी — पूरा सच, बिना डरे।"
बाहर फिर हॉर्न बजा। इस बार एक लंबा, और उसके बाद किसी के हँसने की आवाज़।
बंसी ने टॉर्च बंद कर दी। "अब क्या?"
मैंने टोकन जेब में महसूस किया। वो ठंडा था, पर उसका कोना अब भी उँगली से चिपक रहा था — और उस वक़्त मुझे लगा, जैसे वो मुझसे कह रहा हो — "अभी नहीं। बही पहले।"
"अब हम वो करेंगे जो भवानी ने नहीं सोचा," मैंने कहा। "हम गेंदा को लेकर सीधे थाने जाएँगे — राजेंद्र के पास। और वहाँ से सुबह अदालत।"
"और अगर रास्ते में रोका?"
मैंने मुड़कर माँ की तरफ़ देखा। "माँ, तेरे पास वो मोमबत्ती थी। तेरे पास और कुछ है?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से एक और चीज़ निकाली — एक छोटी चाँदी की अँगूठी, जिस पर कोई निशान खुदा था।
"ये तेरे पापा की थी," उन्होंने कहा। "उन्होंने कहा था — जब मन्नू ख़ुद अदालत जाए, तब उसे देना।"
मैंने अँगूठी ली। उस पर वही उल्टा कोना-चिह्न खुदा था जो काली गाड़ी पर था।
"इसका क्या करूँ?"
"पहन ले," माँ ने कहा। "तेरे पापा कहते थे — ये अँगूठी उस दिन काम आएगी जिस दिन हिसाब बराबर होगा।"
मैंने अँगूठी उँगली में पहनी। वो ठंडी थी।
बाहर फिर हॉर्न बजा — इस बार लंबा और लगातार।
"चलो," मैंने कहा। "अब रुकना नहीं।"
हम बाहर निकले। गली के मोड़ पर सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी, और उसके सामने एक आदमी — सफ़ेद कुर्ता, लाठी, सफ़ेद दाढ़ी।
लाठी वाला बूढ़ा।
उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर गेंदा की तरफ़। फिर माँ की तरफ़।
"तूने बता दिया," उसने गेंदा से कहा।
"बता दिया," गेंदा ने कहा। "अब तू बता — तू कौन है?"
बूढ़े ने लाठी ज़मीन पर टेक दी। "मैं वो हूँ," उसने कहा, "जिसे सब मरा समझते हैं। और मैं आज ये बताने आया हूँ — मन्नू, तेरे पापा को मारने वाला रामदीन नहीं था।"
मैं रुक गया। "क्या?"
"रामदीन उस रात गाड़ी में था," बूढ़े ने कहा। "पर उसने तेरे पापा को नहीं मारा। उसने बचाने की कोशिश की थी — और उसी को मार दिया गया।"
"फिर किसने मारा?"
बूढ़े ने मेरी आँखों में देखा। "जो आज भी ज़िंदा है। जो तेरे पीछे खड़ा है।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। गली के आख़िर में, अंधेरे में, एक आदमी खड़ा था — सफ़ेद कुर्ता, लंबा, हाथ में कुछ चमक रहा था।
और उस वक़्त मेरी जेब में टोकन गरम हो गया — इतना गरम कि जलने लगा।
और उस पर एक नया शब्द उभरा — "अब।"
॥
सफ़ेद कुर्ते वाला बूढ़ा और गली के अंधेरे में खड़ा आदमी — दोनों सामने थे, और मेरी जेब में टोकन इतना गरम था कि लगा कपड़ा जल जाएगा।
मैंने पीछे मुड़कर देखा तो अंधेरे वाला आदमी एक कदम आगे आया। हाथ में चमकती चीज़ थी — पीतल की कोई चीज़ नहीं, बस एक खुला हुआ पर्चा, जो हवा में हिल रहा था।
"मन्नू!" बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा। "भाग।"
"नहीं।" मैंने उसका हाथ हटाया। "आज भागने का दिन नहीं है।"
गेंदा मेरे पीछे से आगे आई और उसने अंधेरे वाले आदमी की तरफ़ देखकर कहा, "तू वही है। मैं तुझे पच्चीस साल से जानती हूँ।"
अंधेरे वाला आदमी रुका। उसने पर्चा जेब में डाला और एक कदम और आगे आया — अब उसका चेहरा रोशनी में थोड़ा दिखने लगा था। साठ के आसपास, पतला, आँखों पर मोटा चश्मा, होंठ सिले हुए जैसे।
"मैं तुझे नहीं मारने आया," उसने कहा। "मैं उस काग़ज़ को लेने आया हूँ, जो आज दीवार से निकला।"
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्योंकि वो मेरा है।" उसकी आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था, बस थकान। "मैं उसे तीस साल से ढूँढ रहा हूँ।"
लाठी वाले बूढ़े ने तब कहा, "मन्नू, ये वही है जिसका नाम तूने अभी पर्ची में पढ़ा — रामदीन।"
मैं एक पल के लिए जम गया।
रामदीन। वो नाम जो माँ ने मोमबत्ती के अंदर छिपाकर दिया था। वो नाम जो गवाही में आने वाला था। वो नाम जो मरा हुआ माना गया था।
"तू ज़िंदा है?" मैंने कहा।
"ज़िंदा था तो तीस साल इसीलिए रहा," रामदीन ने कहा, "कि एक दिन ये काग़ज़ निकले। और आज निकला।"
माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"तूने उसे बचाया था?" माँ ने पूछा।
"बचा नहीं पाया," रामदीन ने कहा। "पर मारा भी मैंने नहीं। जब गाड़ी पलटी, मैंने उसे अपनी छाती पर रखा था। फिर जो आया, उसने मेरे सिर पर वार किया। मुझे मरा समझकर छोड़ गया।"
"और फिर भवानी का बाप तुझे ज़िंदा देखकर डर गया," लाठी वाले बूढ़े ने कहा, "इसलिए उसने तेरा नाम मरने वालों की सूची में डाल दिया — ताकि तू ज़िंदा रहे, और उसका डर ज़िंदा रहे।"
रामदीन ने गर्दन झुका ली।
मैंने सफ़ेद गाड़ी की तरफ़ देखा। उसका दरवाज़ा खुला था, अंदर कोई नहीं था।
"तो गाड़ी तेरी है?"
"मैंने चलाई," रामदीन ने कहा। "बस मुझे ये कहना है — "
"मन्नू!" दूर से आवाज़ आई। माँ की पुरानी सहेली की? नहीं। मैं उस आवाज़ को पहचानता था। मैं भागा।
गली के मोड़ से घूमकर आ रही थी रीना, हाथ में मेरा मोबाइल — नहीं, उसका अपना मोबाइल, जो दूसरे हाथ में चमक रहा था।
"रीना, तू यहाँ?"
"मैं घर से निकली ही थी," वो हाँफते हुए बोली, "कि दो आदमी सामने से आए। कह रहे थे — हवेली का काग़ज़ हमारा है।"
"तूने देखा कैसा दिखता था?"
"मैंने देखा," रीना ने कहा और मेरे हाथ में मोबाइल थमाया। "मैंने उनकी फोटो खींच ली।"
मैंने स्क्रीन देखी। दो आदमी — एक बड़ा, चौड़े कंधों वाला; दूसरा उससे थोड़ा छोटा, सिर पर टोपी। और उनके पीछे, गली के मोड़ पर, सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी।
वही सफ़ेद गाड़ी, जो अभी हमारे सामने खड़ी थी।
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