The Token System – Chapter 109
विक्रम रुका। फिर बोला, "मैं आज सच बोलूँगा। पर एक शर्त है।"
"क्या?"
"मेरी माँ को बचाओ। भवानी ने उसे होम में बंद कर रखा है।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने गिलास उठाया और कहा, "ये काम टोकन का है, या तेरा?"
मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन गरम था। बहुत गरम।
॥
मैंने जेब से हाथ निकाला और टोकन को वापस उसी जगह रखा जहाँ से निकाला था। पर वो गरम था, और मेरी जेब अंदर से तवे जैसी लगने लगी थी।
विक्रम गाड़ी से उतर चुका था, और उसका फेंका हुआ टुकड़ा ज़मीन पर पड़ा था — खोखला, बिल्कुल खाली। मैंने उसे उठाया, हथेली पर रखा।
"इसका अंदर देखो," मैंने विक्रम को दिया।
उसने उँगली डालकर टटोला। अंदर सिर्फ़ ठंडी धातु थी।
"मुझे लगता था यही असली है," विक्रम ने कहा। "पापा ने कहा था — ये तेरा हिस्सा है, तेरे पास रहेगा।"
"तेरे पास रहा भी," मैंने कहा। "बस खोखला रहा।"
बंसी ने विक्रम के कंधे पर हाथ रखा। "अंदर चलो। गली में खड़े-खड़े बातें नहीं।"
हम घर के अंदर आए। माँ चूल्हे के पास बैठी थीं, और रीना चाय के पत्ते छान रही थी। दरवाज़े पर विक्रम को देखकर रीना का हाथ रुक गया।
"ये…" रीना ने कहा।
"ये अब वो नहीं है," मैंने कहा। "बैठ जाओ सब।"
मधु सबसे पीछे आई। उसकी आँखें लाल थीं। माँ ने उसे देखा और चाय का गिलास बढ़ा दिया।
"पहले ये बताओ," मैंने मधु की तरफ़ देखा, "तेरे पिता के पास क्या था? और तूने ये बात मुझे अब तक क्यों नहीं बताई?"
मधु ने गिलास दोनों हाथों में पकड़ा। "मेरे पिता भवानी के होम के पहले मुंशी थे। तुम्हारे पिता से भी पहले। जब भवानी का टोकन टूटा था, तब जो कोना अलग हुआ, वो पापा ने उठा लिया था। भवानी को पता नहीं चला।"
"क्यों नहीं चला?" बंसी ने पूछा।
"क्योंकि पापा ने उसी रात उसे चादर में लपेटकर अपने घर की दीवार में छिपा दिया था। भवानी को लगा कि कोना खो गया। उसने बहुत तलाशी करवाई, पर…"
"पर तेरे पिता को कभी शक नहीं हुआ?" मैंने कहा।
मधु ने गिलास मेज़ पर रखा। "शक हुआ तो। पर पापा ने कभी नहीं माना। और भवानी को ऐसा आदमी चाहिए था जो हर हाल में झूठ बोले। पापा ने झूठ बोला — सिर्फ़ एक बार।"
"कि कोना मिल नहीं रहा," विक्रम ने कहा। वो पहली बार बोला, और उसकी आवाज़ में कुछ टूटा था।
"हाँ," मधु ने उसकी तरफ़ देखा। "और इसकी कीमत पापा ने धीरे-धीरे दी। भवानी ने उन्हें हर साल कम कर दिया। पहले होम का हिसाब, फिर ज़मीन के काग़ज़, फिर… फिर सिर्फ़ एक चौकीदार की नौकरी बची थी। पापा मरने से पहले बिस्तर पर थे, और मुझे बुलाकर बोले — 'ये कोना तेरे हाथ में है। मैं इसे भवानी को नहीं दूँगा। पर तू भी नहीं देगी। ये सिर्फ़ हवेली की दीवार में जाकर बराबर होगा।'"
माँ ने चूल्हे की आग को कुरेदा। "तो तेरे पिता ने ये बात किसी को बताई नहीं?"
"किसी को नहीं," मधु ने कहा। "माँ को भी नहीं। माँ को लगता रहा कि पापा ने पैसा छिपाया है। वो मरते दम तक पूछती रहीं।"
रीना ने चाय का गिलास विक्रम के सामने रखा। "और तू ये सब जानकर भी भवानी के साथ थी?"
मधु का चेहरा कड़ा हुआ। "मैं डॉक्टर हूँ। मुझे नौकरी चाहिए थी। भवानी ने मुझे होम में रखा, और मैंने चुप रहना चुना।" वो रुकी। "अब नहीं चुप रहूँगी।"
"तो टुकड़ा कहाँ है?" मैंने सीधा पूछा।
"अस्पताल के लॉकर में। मेरे नाम के लॉकर में। चाबी मेरे पास है।"
"तो आज ही ले आ," बंसी ने कहा।
"आज रात," मधु ने कहा। "दिन में भवानी के आदमी मुझे देखते हैं। मैंने छुट्टी के बाद लॉकर खोला तो सबको पता चल जाएगा। रात को ड्यूटी बदलने के वक़्त निकाल लाऊँगी।"
विक्रम ने आगे झुककर कहा, "और मेरी माँ?"
माँ ने पहली बार सीधा विक्रम की तरफ़ देखा। "तेरी माँ कहाँ है?"
"होम में। पापा ने उसे तीसरी मंज़िल के कमरे में बंद कर रखा है। दो महीने से।"
माँ ने चाय का गिलास मेज़ पर रखा और उठ खड़ी हुईं। "तू भवानी का बेटा है और तेरी माँ वहीं बंद है?"
विक्रम ने सिर नीचा कर लिया। "मैं डर गया था। पापा ने कहा था — अगर मैंने कुछ कहा तो माँ को कुछ हो जाएगा।"
माँ ने रीना की तरफ़ देखा। "रीना, बोरी में रोटी रख। दो-चार।"
"अभी?" रीना ने पूछा।
"अभी नहीं," माँ ने कहा। "रात को।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो आज पहली बार कुछ तय कर रही थीं, और मुझे अच्छा लगा।
"पर पहले एक काम है," मैंने कहा। "टुकड़ा लाना है। और उससे पहले मुझे ये समझना है कि दीवार में क्या मिलेगा।"
मैंने पोटली खोली। तीन टुकड़े मेज़ पर रखे। बंसी ने दीया और करीब किया।
"तीन टुकड़े," बंसी ने कहा। "एक दीवार से, एक मुंशी से, एक भवानी का।"
"और अब चौथा आएगा," मैंने कहा। "मधु के लॉकर से।"
माँ ने टुकड़ों की तरफ़ देखा। उनका हाथ काँप रहा था।
"तेरे दादा ने कहा था," माँ ने धीरे से कहा, "कि दीवार के अंदर एक बात छिपी है जो पूरी होने पर ख़ुद बोलेगी। मैंने उस वक़्त हँसी उड़ाई थी।"
"अब हँसी नहीं आ रही?" रीना ने कहा।
माँ ने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुरा दी। "नहीं आ रही।"
शाम को मैं और बंसी अस्पताल गए। मेरी शिफ़्ट थी, और मुझे डॉक्टर सुमन से भी मिलना था। सुमन इमरजेंसी के बाहर खड़ी थीं, हाथ में फ़ाइल।
"मन्नू," उन्होंने कहा, "तेरे घर पर वो लड़का है न — विक्रम?"
"हाँ।"
"उसका बयान थाने में दर्ज है। राजेंद्र ने फ़ोन किया था।" वो फ़ाइल बंद करके मेरी तरफ़ देखने लगीं। "भवानी आज सुबह मेरे घर आया था।"
मैं रुक गया। "क्या?"
"मेरे पति से मिला। कहा — सुमन का तबादला रोक सकता हूँ, बस एक काग़ज़ पर दस्तख़त करवा दे।" उन्होंने फ़ाइल मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "मैंने मना कर दिया।"
"क्या काग़ज़?"
"मेरे मरीज़ों का हिसाब। छह बच्चे जो होम से लौटे थे, उनके नाम वाला काग़ज़।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "मैंने काग़ज़ भवानी को नहीं दिया। पर उसने कहा कि मेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं है।"
"इसका मतलब उसे पता है कि तुम मेरी तरफ़ हो।"
"मेरी तरफ़?" सुमन ने कहा। "मैं अपने मरीज़ों की तरफ़ हूँ। तेरी तरफ़ नहीं।"
फिर भी हम दोनों जानते थे कि बात एक ही थी।
रात नौ बजे मैं बंसी की दुकान पर पहुँचा। वहाँ रीना, माँ और विक्रम पहले से थे। मधु दस बजे आने वाली थी।
"भवानी के आदमी गली के मोड़ पर हैं," बंसी ने कहा। "दो। सफ़ेद गाड़ी में।"
"जाने दो," मैंने कहा। "आज उन्हें देखने का वक़्त नहीं है।"
दस बजकर दस मिनट पर मधु आई। उसके हाथ में एक छोटी पोटली थी। उसने दुकान के अंधेरे कोने में पोटली खोली। अंदर मैली चादर में लिपटा हुआ पीतल का कोना था — असली। बिल्कुल मेरे टुकड़ों जैसा रंग, वैसी ही बनावट।
मैंने उसे उठाया। वो भारी था, और तीनों टुकड़ों के पास ले जाते ही मेरे हाथ में गरम हुआ जैसे तवा।
"अब चार," मैंने कहा।
"चलो," बंसी ने कहा। "हवेली।"
हम साइकिलों पर निकले — मैं, बंसी, रीना और मधु। विक्रम पीछे माँ के साथ ऑटो में। माँ को साथ लाना रीना की शर्त थी — "अगर ये सब तेरे दादा का है, तो माँ वहीं होगी।"
हवेली का पिछला दरवाज़ा खुला था। पहली मंज़िल की सीढ़ी चढ़ते वक़्त मेरी साँस तेज़ थी।
पीली दीवार सामने थी। उस पर दो खाँचे — एक जो मैंने पहले देखा था, और उसके नीचे वो छिपा हुआ छोटा खाँचा जिसमें आधी जली पर्ची मिली थी।
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