The Token System – Chapter 108
"टोकन का कोना था।"
"हाँ। और हरि सिंह ने कहा था — 'ये तेरे हिस्से का है। इसे रख। जिस दिन मैं मरूँगा, तू इसके साथ मेरे पास आना।' और फिर —" बंसी रुका।
"फिर क्या?"
"फिर कुछ नहीं। हरि सिंह अगले साल मर गए। और तेरे पापा ने वो कोना किसी को नहीं दिया।"
मैं घर के पीछे लौटा। दीवार के उस कोने में तीनों टुकड़े रखे — भवानी का कोना, दीवार वाला, मुंशी वाला। तीनों अलग-अलग पड़े थे, जैसे एक-दूसरे से अनजान।
"ये तीनों जुड़ेंगे कैसे?" मैंने पूछा।
बंसी ने कंधे उठाए। "जब वक़्त आएगा। टोकन जानता है।"
तभी मेरी जेब में कुछ हुआ। टोकन। गरम हो रहा था। पहली बार इतना गरम, कि मैंने जेब से निकालकर ज़मीन पर रख दिया।
तीनों टुकड़ों पर एक साथ लकीर उभरी — और वो लकीर आपस में जुड़ती हुई एक तिकोना बन गई।
बंसी ने देखा और धीरे से बोला, "तीन टुकड़े। तीन हिस्से। और एक हिसाब।"
"किसका हिसाब?"
"तेरे पापा का, हरि सिंह का, और मुंशी का। ये तीनों ने मिलकर वो टोकन तोड़ा था। अब तू इन्हें जोड़ेगा तो हिसाब खुलेगा।"
मैंने टोकन उठाया — ठंडा हो चुका था। मैंने तीनों टुकड़े पोटली में रखे और पोटली को जेब में डाला।
"माँ," मैंने अंदर जाकर कहा, "पापा ने टोकन का कोना छिपाया था। मिल गया।"
माँ ने चूल्हे पर से पतीला उतारा, और बिना मुड़े बोली, "तो अब मुंशी की बात सुन। मुंशी ने अपनी बेटी को कुछ दिया है। वो भी कुछ जानती है।"
"कैसे जानती हैं आप?"
"क्योंकि मुंशी ने मरने से पहले तेरे पापा को फ़ोन किया था। रात दो बजे। मैंने सुना। उसने कहा था — 'कन्हैया, मैंने अपनी बेटी को बचा लिया। अब तू अपने बेटे को बचा।' और फिर फ़ोन कट गया।"
मैं कुछ देर खड़ा रहा। फिर बोला, "माँ, कल सुबह सात बजे मधु लिफ़ाफ़ा देने आएगी। और मुझे भवानी के बेटे से मिलना है।"
माँ ने पतीला रखा। "बंसी को साथ ले।"
"ले रहा हूँ।"
"और रीना को भी।"
"रीना?"
"हाँ।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "वो औरत है। भवानी की बातें सुनकर टूटेगी नहीं। और भवानी के बेटे के सामने एक औरत का खड़ा होना ज़रूरी है।"
शाम को मैंने रीना को सब बताया। वो चुपचाप सुनी। फिर बोली, "मैं चलूँगी।"
"तू डरेगी नहीं?"
"डरूँगी। पर डरकर बैठने से क्या होगा?" उसने अपनी चाय उठाई। "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"जो तीन टुकड़े तेरे पास हैं — उन्हें जोड़ने के बाद क्या होगा?"
"पता नहीं।"
"और अगर भवानी उन्हें छीन ले?"
"तो हिसाब उसका पूरा हो जाएगा। और यही मैं नहीं चाहता।"
रात में मैंने तीनों टुकड़े फिर निकाले। तीनों को एक साथ हथेली पर रखा। गरम नहीं हुए। बस एक लकीर उभरी, जो तीनों को जोड़ती हुई गई — और फिर मिट गई।
मैंने पोटली बाँधी और तकिये के नीचे रखी।
सुबह छह बजे मैं उठा। बंसी पहले से बरामदे में बैठा था, चाय बना रहा था।
"आज का दिन भारी है," उसने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि आज तुझे भवानी के बेटे से मिलना है। और भवानी को पता चलेगा तो वो कुछ भी कर सकता है।"
सात बजे सफ़ेद गाड़ी गली के मोड़ पर आई। मधु उतरी, हाथ में लिफ़ाफ़ा। उसने मुझे दिया — बंद, मुहर लगा हुआ।
"मेरे पिता की मुहर है," उसने कहा। "मैंने नहीं खोला।"
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक काग़ज़ था और एक छोटी चाबी। काग़ज़ पर मुंशी की लिखाई थी —
"मन्नू, तेरे पापा ने मुझे बचाया था, और मैं उन्हें नहीं बचा सका। ये चाबी तेरे पापा के घर के पीछे वाले कमरे की है — जहाँ वो तीन साल से बंद है। वहाँ जो है, वो सिर्फ़ तेरा है। और भवानी के बेटे से मिलने से पहले वो निकाल लेना। वरना भवानी तुझे वहाँ पहुँचने नहीं देगा।"
"कौन सा कमरा?" बंसी ने पूछा।
"घर के पीछे छिपी सीढ़ी के नीचे।"
"तो चल।"
हम तीनों — मैं, बंसी, और मधु — घर के पीछे गए। छिपी सीढ़ी के नीचे रास्ता था, जो रोशनी में साफ़ दिख रहा था। मैंने चाबी लगाई और दरवाज़ा खुला।
अंदर एक छोटा कमरा था। दीवार पर पुरानी तस्वीरें, एक चारपाई, और चारपाई के नीचे एक टिन का डिब्बा। मैंने डिब्बा खोला — अंदर काग़ज़ों का बंडल और एक पुरानी घड़ी।
काग़ज़ों के बंडल की पहली पर्ची पर लिखा था, पापा की लिखाई में — "मन्नू, अगर तू ये पढ़ रहा है तो मैं नहीं हूँ। और अब तुझे सब पता है। भवानी का टोकन पूरा नहीं है — उसका कोना मैंने रखा था, क्योंकि हरि सिंह ने मरने से पहले मुझसे कहा था — 'कन्हैया, मेरा बेटा मेरे रास्ते पर चलेगा। तू इस कोने को रख। जिस दिन मेरा बेटा अपने बेटे के सामने सच बोलेगा, उस दिन ये कोना उसके हाथ में जाना चाहिए।'"
मैं रुक गया। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
"तो भवानी का बेटा…" मैंने कहा।
"हाँ," बंसी ने कहा। "वही तेरे हाथ का हिस्सा है। भवानी का बेटा ही वो कोना है।"
तभी बाहर से छोटू की आवाज़ आई — "मन्नू भैया! गली में फिर सफ़ेद गाड़ी आई है!"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। मधु ने।
"अब कौन?" मैंने कहा।
"जाकर देखते हैं," बंसी ने कहा। "पर पहले ये काग़ज़ और घड़ी ले ले।"
मैंने सब कुछ पोटली में रखा। और बाहर आया।
गली में सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी, पर इस बार उसमें से कोई उतरा नहीं। सिर्फ़ शीशा नीचे हुआ, और अंदर से एक आवाज़ आई — "मन्नू?"
मैंने पास जाकर देखा। गाड़ी में भवानी का बेटा बैठा था — विक्रम। पर आज वो अकेला नहीं था। उसके हाथ में वो टूटा पीतल का टुकड़ा था, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो पहली बार दिख रही थी — सवाल।
"मुझे तुमसे कुछ पूछना है," विक्रम ने कहा। "और सच बताओ — मेरे पिता का टोकन टूटा क्यों है?"
मैंने उसके हाथ में देखा। टुकड़ा पीतल का था, पर उस पर कोई लकीर नहीं, कोई निशान नहीं। बिल्कुल सपाट।
मैंने अपनी जेब से मुंशी वाला टुकड़ा निकाला और उसके टुकड़े के पास रखा।
वो टुकड़ा जोड़ा नहीं गया। अलग रह गया। जैसे वो इस जोड़ का हिस्सा ही नहीं था।
मधु ने देखा और धीरे से बोली, "ये तो असली नहीं है।"
विक्रम ने उसकी तरफ़ देखा। "क्या?"
मधु ने मेरी तरफ़ देखा, फिर विक्रम की तरफ़, और फिर बोली, "ये टुकड़ा असली नहीं है। असली टुकड़ा मेरे पिता के पास था — जो मैंने अभी मन्नू को दिया। तुम्हारे पिता ने तुम्हें नकली दिया है। वो जानते थे कि असली तुम्हें नहीं देना है।"
विक्रम का चेहरा बदल गया। उसने गाड़ी का दरवाज़ा खोला और बाहर आ गया।
"तो जो मेरे पिता ने मुझे तीन साल दिया था —" उसने टुकड़ा देखा, "— वो झूठ था?"
"तुम्हारे पिता ने तुम्हें बस एक चीज़ दी थी," मैंने कहा। "डर। ताकि तुम उनके रास्ते पर चलो।"
विक्रम ने टुकड़ा ज़मीन पर फेंक दिया। वो टुकड़ा टूट गया — और अंदर से खोखला निकला, बिल्कुल खोखला।
"मुझे सब बताओ," विक्रम ने कहा। "शुरू से।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब डर नहीं था।
"अंदर चलो," मैंने कहा। "बैठकर बताता हूँ।"
हम तीनों — मैं, विक्रम, बंसी, और पीछे मधु — घर की तरफ़ चले।
और पीछे, गली के मोड़ पर, एक सफ़ेद जीप रुकी — जिसमें भवानी के दो आदमी बैठे थे, और उन्होंने सब देखा।
पर मैंने उनकी तरफ़ नहीं देखा। मैंने सिर्फ़ विक्रम से कहा, "तेरे पिता ने जो कोना तुझे दिया, वो नकली था। असली कोना तेरे पिता के पास भी नहीं है। असली कोना अभी मेरे जेब में है — और जिस दिन तू सच बोलेगा, उस दिन वो तेरे हाथ में जाएगा।"
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