The Token System – Chapter 1088
रात दस बजे मैं आँगन में बैठा था कि रीना आई और मेरे पास बैठ गई।
“मन्नू, एक बात कहूँ?”
“कह।”
“कल जो भी हो, माँ को अकेला मत छोड़ना। मुझे लगता है, आज वो जो सील देकर आई थी, उससे उन्हें कोई बात याद आई है जो उन्होंने हमें नहीं बताई।”
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े के पास खड़ी थीं, हाथ में मोमबत्ती थी, और आँगन के पत्थर पर कुछ लिख रही थीं। मैं उठकर वहाँ पहुँचा। पत्थर पर उनकी लिखाई थी — तीन नाम — सुखदेव, कौशल्या, और तीसरा नाम मिटा हुआ।
“माँ, ये कौन है?”
उन्होंने उँगली उठाई और तीसरे नाम पर फिर से लिखा — उलटा कोना-चिह्न।
“जो मुझे उस सील से याद आया,” उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा। “मन्नू, कल अदालत में जाने से पहले एक काम करना। जब तिजोरी के काग़ज़ पढ़े जाएँ, बही के आख़िरी पन्ने को मत छोड़ना। मैं जानती हूँ, वो पन्ना अभी कोरा दिखता है। पर वो कोरा नहीं है। उसे मोमबत्ती की रोशनी में देखना, तब तेरे पापा का लिखा हुआ निकलेगा।”
॥
सुबह आठ बजकर पैंतालीस मिनट पर अदालत का बरामदा खचाखच भरा था। भवानी के वकील शुक्ला जी ने दो नए सहायक वकील बुला लिए थे, तीनों एक ही मेज़ पर सफ़ेद काग़ज़ फैलाए बैठे थे। सक्सेना जी अपनी कुर्सी पर बैठीं और उन्होंने सीलबंद लिफ़ाफ़ा उठाया, जिस पर चार जगह मोम की मुहरें थीं।
"मैं हरि सिंह की वसीयत पढ़ती हूँ," सक्सेना जी ने खड़े होकर कहा, "और ये सुनने के लिए सिर्फ़ अदालत काफ़ी नहीं, बाहर की गली भी सुन ले।"
काग़ज़ खुला। पहली लाइन थी — हवेली, नंबर तीन सौ सत्ताईस, खेत्री।
"हवेली का आधा हिस्सा सुखदेव माली को, जो हमारे ख़ानदान के साथ चालीस साल रहा, और जिसने उस हवेली की हर ईंट अपने हाथ से रखी। आधा हिस्सा जमुना देवी के ससुर को, जो हमारा हिस्सेदार रहा।"
बरामदे में एक लंबी फुसफुसाहट दौड़ी। काकी ने दोनों हाथ जोड़कर शांति से कहा — "जय।"
सक्सेना जी ने आगे पढ़ा — "और ये हिस्सा किसी हालत में बिकेगा नहीं, गिरवी नहीं रखा जाएगा। जो भी अपना हिस्सा बेचेगा या हड़पेगा, उसका हिस्सा अपने आप दूसरे हिस्सेदार के नाम हो जाएगा। ये शर्त मेरे बाद भी उतनी ही रहेगी।"
शुक्ला जी खड़े हुए। "माननीय, ये वसीयत नक़ली है। इस पर मेरे मुवक्किल के बाप के दस्तख़त नहीं हैं।"
"दस्तख़त हैं," सक्सेना जी ने काग़ज़ नीचे करते हुए कहा, "और उसके नीचे तारीख़ है — चौदह मार्च, उन्नीस सौ अट्ठासी। ये वो साल है जब हरि सिंह की हवेली में आख़िरी बार ताला लगा था।"
भवानी आगे आया। वो आज काले कुर्ते में था, हाथ में कोई काग़ज़ नहीं, बस कमर पर हाथ रखे।
"मेरा बाप इस वसीयत को नहीं मानता था," भवानी ने कहा। आवाज़ साफ़ थी, धीमी नहीं। "इसलिए मैंने भी नहीं मानी। बीस साल से मैं हवेली को अपना समझकर चला। मेरा बाप मरते वक़्त भी इस काग़ज़ का नाम नहीं लेता था।"
"तेरे बाप ने मानी या नहीं," मैं बोला, "इससे अदालत को क्या? अदालत काग़ज़ मानती है।"
भवानी मेरी तरफ़ मुड़ा। इस बार उसकी आँखों में वो गुस्सा नहीं था जो कल था। कुछ और था — थकान।
"तेरी बात सही है, मनोहर," उसने कहा। "अदालत काग़ज़ मानती है। इसलिए अब मैं भी काग़ज़ से ही खेलूँगा।"
सक्सेना जी ने अगला लिफ़ाफ़ा उठाया। इसमें बही थी — सुखदेव की। ज़र्द पन्ने, कुछ जगह सीलन से काले, कुछ जगह उँगलियों से चिकने।
"ये बही सौ साल का हिसाब कहती है," सक्सेना जी ने पन्ने पलटते हुए कहा। "पहला पन्ना — जो हिसाब बाँटेगा, वही बचेगा। फिर नामों की लिस्ट — ग्यारह नाम। हर नाम के आगे रकम, हर रकम के आगे तारीख़।"
वो एक पन्ने पर रुकीं। "और यहाँ, बीच में, दो लकीरों के बीच एक लाइन लिखी है, जो सीधी आँख से दिखती नहीं। मैं इसे लैंस से देख रही हूँ — इसमें लिखा है: 'दो टोकन, एक खाता। जो एक हाथ में, वो दूसरे में नहीं।' "
बरामदा सन्न रह गया।
"मतलब?" किसी ने पीछे से पूछा।
"मतलब," सक्सेना जी ने काग़ज़ नीचे रखते हुए कहा, "भवानी सिंह के हाथ का टोकन और मनोहर के हाथ का टोकन — दोनों एक ही खाते के दो हिस्से हैं। ये खाता सौ साल पुराना है, और इसका हिसाब \( \)
वो रुकीं।
"इसका हिसाब अभी पूरा नहीं हुआ।"
सुमन ने अपना मोबाइल निकाला और बही के पन्नों की तस्वीरें खींचने लगी। शुक्ला जी ने झपटकर हाथ बढ़ाया — "माननीय, ये सबूत नहीं, किसी की निजी डायरी है!"
"हाथ पीछे," राजेंद्र ने कहा। वो अपनी कुर्सी से उठा और मेज़ के सामने खड़ा हो गया। "अदालत के कब्ज़े की चीज़ को छूने की कोशिश मत करना, वकील साहब।"
शुक्ला जी का हाथ हवा में रुका रह गया। भवानी ने उसे इशारे से पीछे किया।
सक्सेना जी ने आख़िरी काग़ज़ — भूरी जिल्द की डायरी — उठाया।
"ये डायरी भवानी सिंह के पास बीस साल रही। इसमें दर्ज है, किस दिन किसका नाम मिटाया गया, किस दिन किसका अँगूठा लिया गया, किस दिन कौन-सा काग़ज़ जलाया गया।" उन्होंने एक पन्ना खोला। "यहाँ एक लाइन है, भवानी सिंह की अपनी लिखाई में — 'आज बही का गवाह मिटाया। मन नहीं मान रहा। पर बाप का हुक्म था।' "
भवानी ने अपनी छाती पर हाथ रखा, जैसे कुछ अंदर से टूट रहा हो। "वो लाइन मेरी है," उसने कहा। "और आज मैं उसे नहीं मिटाऊँगा।"
मैं उठा। "भवानी सिंह, एक सवाल। तेरे हाथ में टोकन है। मेरे हाथ में भी है। तेरा हिसाब कितना बाक़ी है?"
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। वो हँसा नहीं। "मेरा हिसाब इतना बाक़ी है, मनोहर," उसने कहा, "कि अगर आज मैं इसे अदालत में रख दूँ, तो मेरे बाप की तीन पीढ़ियाँ इसे उठा नहीं पाएँगी।"
"तो रख दे।"
"नहीं।" भवानी ने सिर हिलाया। "क्योंकि मेरे पास टोकन नहीं है।"
मैं ठिठक गया। "क्या?"
"मेरा टोकन रात में चोरी हो गया," भवानी ने कहा। उसकी आवाज़ में कोई नाटक नहीं था। "मेरे ही दफ़्तार की तिजोरी से। और चोर वो है जो मेरी ही शक्ल में घूमता है — मेरा बेटा।"
शुक्ला जी ने कुर्सी खींची और भवानी के कान में कुछ कहा। भवानी ने उसे झिड़क दिया। "मैंने कहा था, अब मैं काग़ज़ से खेलूँगा। शुक्ला जी, आप बाहर जाकर मेरी बात सुन लीजिए।"
वो मुड़ा और बरामदे से बाहर चला गया। मैंने उसे जाते देखा — सीधा चलता हुआ, किसी को देखे बिना। ये वही आदमी था जो बीस साल से इस शहर में कोई काग़ज़ नहीं हारा था। और आज उसने ख़ुद कह दिया — मेरा टोकन चोरी हो गया।
सक्सेना जी ने दोनों हाथ मेज़ पर रखे। "अदालत ये दर्ज करती है — तीनों काग़ज़ अदालत के कब्ज़े में रहेंगे। दीवार के नीचे जो मिलेगा, उसकी जाँच आज दोपहर तीन बजे। सुनवाई कल सुबह नौ बजे।"
काग़ज़ सील होने लगे। मैं बरामदे में बाहर आया। सुमन ने मेरा हाथ खींचा और बगल के खंभे की आड़ में ले गई।
"मन्नू, बही की जो मैंने तस्वीरें खींचीं — उनमें एक पन्ना है जो सक्सेना जी ने नहीं खोला। वो दो पन्नों के बीच चिपका था। उस पर आधी लिखाई ख़त्म है — और आख़िरी लाइन है, 'मन्नू के हिसाब का हिस्सा — उसकी बहन के नाम'। "
मेरा पेट कड़ा हो गया।
"रीना के नाम?"
"रीना के नाम।" सुमन ने मोबाइल की स्क्रीन दिखाई। "और नीचे छोटी लिखाई में — 'जो इस हिसाब को बेचेगा, उसका हिस्सा उसके हाथ से निकलकर उसी के नाम हो जाएगा जो सबसे ज़्यादा चुप रहा।' "
"मतलब?"
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