The Token System – Chapter 1087
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
माँ ने हाथ खोला। उनकी हथेली में एक पुरानी पीतल की सील थी, छोटी, गोल, जिस पर दो लकीरें और बीच में एक बिंदु था।
“ये मैंने उस रात उठाई थी,” माँ ने कहा। “जिस रात तेरे पापा घर आए थे, आख़िरी बार। वो अपनी जेब से कुछ निकाल रहे थे, और ये ज़मीन पर गिर गई। मैंने उठाई और आज तक किसी को नहीं दिखाई।”
मैंने सील अपने हाथ में ली। हल्की थी। उलटी तरफ़… उलटी तरफ़ वही उलटा कोना-चिह्न खुदा था। मेरा हाथ ठंडा हो गया।
“माँ, ये उसी की है। दीवार के लिफ़ाफ़े पर जो नई मोहरें हैं, उनमें से एक की ये सील है।”
माँ ने आँखें बंद कर लीं। फिर बोलीं, “मुझे डर है, मन्नू। वो लिफ़ाफ़ा तेरे पापा का नहीं है। जो है, वो तेरे पापा से बड़ा है।”
“कौन?”
“पहले मुझे तीन सवालों के जवाब चाहिए। एक — उस लिफ़ाफ़े पर मोहर किस कोने पर नई है? दो — बही का पहला पन्ना किसने लिखा है? तीन — और तीन बजे के बाद, जब तू जज के सामने खड़ा हो, तू मेरा नाम लेगा या नहीं?”
“माँ…”
“सोचकर जवाब देना। मैं भवानी से नहीं डरती। मैं इस बात से डरती हूँ कि मेरा नाम एक बार काग़ज़ पर आया, तो फिर कभी नहीं जाएगा।”
मैंने उनके हाथ पकड़े। “तेरा नाम आज नहीं आएगा। जब आएगा, तब तेरे सामने आएगा।”
माँ ने मेरे माथे पर हाथ रखा और उठकर चाय बनाने लगीं। रीना ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से बोली, “उन्होंने रात भर सोया नहीं। बस बही का नाम सोचती रहीं।”
“कौन सा नाम?”
“जो उन्हें डरा रहा है।”
चार बजे से पहले मैं अदालत पहुँचा। सुनवाई का कमरा भरा हुआ था। जज साहब मेज़ के पीछे बैठे थे और उनके सामने लकड़ी का बक्सा रखा था। सक्सेना काग़ज़ फैला रही थीं। बंसी और राजेंद्र गवाह की कुर्सी पर बैठे थे। भवानी पीछे की बेंच पर अकेला बैठा था — उसके आदमी इस बार उसके साथ नहीं थे।
जज साहब ने चश्मा ठीक किया और कहा, “बक्सा खोला जाए।”
सक्सेना ने पीतल का ताला खोला। बही पहले निकली। जज ने उसे अपने सामने रखा और गत्ता पलटा। पहला पन्ना खुला। उस पर बड़ी, झुकी हुई लिखाई थी — दादा की लिखाई, जो मैंने बीस साल पहले कभी नहीं देखी थी, पर एक बार देखी तो भूल नहीं सकता था।
मैंने पन्ने पर नज़र दौड़ाई।
सिर्फ़ एक लाइन थी।
“जो हिसाब बाँटेगा, वही बचेगा।”
जज साहब ने लाइन पढ़ी और ऊपर देखा। उनकी नज़रें भवानी पर टिक गईं। “ठाकुर साहब, आपने इस बही को कभी देखा है?”
“नहीं।”
“कभी नहीं?”
“कभी नहीं।”
सक्सेना ने आगे कहा, “पर आपकी उँगलियों के निशान इस बही के आख़िरी पन्ने पर हैं। कल रात हमने इसकी जाँच कराई थी।”
भवानी की आँखें एक पल बंद हुईं और खुलीं। उसने कुछ नहीं कहा।
जज साहब ने अगला पन्ना पलटा। मैंने गर्दन आगे की। पन्ने पर ग्यारह नाम थे — हर नाम के आगे रकम, तारीख़ और एक छोटा-सा लिखा हुआ शब्द। सबसे नीचे, आख़िरी नाम के आगे — ‘सुखदेव’ — और उसके आगे कोई रकम नहीं, बस एक लाइन थी — “बाक़ी: पूरा।”
“दादा ने इस बही में अपना नाम सबसे नीचे लिखा है,” मैंने धीरे से कहा। “और आगे लिखा है — पूरा। मतलब उन्होंने अपना हिसाब चुका दिया था।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा और हौले से बोला, “फिर उन्हें मारा क्यों गया?”
सक्सेना ने लिफ़ाफ़ा उठाया। “पहले ये।”
उन्होंने मोम की चारों मोहरें तोड़ीं। लिफ़ाफ़े के अंदर से एक मुड़ा हुआ पीला काग़ज़ निकला, जिस पर नीली स्याही से कुछ लिखा था। सक्सेना ने उसे खोला, और मैंने देखा — उनका हाथ काँप रहा था।
वो एक पल चुप रहीं। फिर उन्होंने जज साहब की तरफ़ देखा और धीमी आवाज़ में कहा —
“ये वसीयत है। और इसमें हवेली का आधा हिस्सा सुखदेव के नाम लिखा है।”
कमरे में कोई हिला नहीं। जज साहब ने लंबी साँस ली और कहा, “पूरी पढ़िए।”
सक्सेना ने काग़ज़ आँखों के सामने किया। उनकी आवाज़ पहले धीमी थी, फिर साफ़ होती गई।
“मैं, हरि सिंह, अपनी पूरी इच्छा से लिखता हूँ — हवेली का आधा हिस्सा सुखदेव के नाम, जो मेरे बाप का हिसाब रखता था और जिसने मेरी बहन को मेरे ग़ुस्से से बचाया। बाक़ी आधा मेरा, और वो भी उस दिन सुखदेव के नाम हो जाएगा, जिस दिन मैं अपने किए पर माफ़ी माँग लूँगा।”
सक्सेना ने रुककर काग़ज़ के नीचे लगी तारीख़ देखी। “तारीख़ — बीस साल पहले की। दस्तख़त — हरि सिंह के। और गवाह…”
वो रुक गईं।
“गवाह कौन है?” जज ने पूछा।
“गवाह का नाम मिटा हुआ है। सिर्फ़ एक अक्षर बचा है — ‘ब’।”
राजेंद्र ने झट से कहा, “बद्री! बद्री!”
मैं उठ खड़ा हुआ। “बद्री वही है जो दीवार के नीचे दबा है। मेरे दादा ने चिट्ठी में लिखा था — हड्डियाँ दीवार के नीचे हैं।”
जज साहब ने हथौड़ी उठाई और एक बार मेज़ पर मारी। “बैठ जाइए।”
मैं बैठ गया। मेरी छाती में धक-धक हो रही थी।
सक्सेना ने काग़ज़ को मोड़कर रख दिया और फिर कहा, “अदालत का हुक्म है — ये वसीयत, ये बही, और ये डायरी — तीनों अदालत के कब्ज़े में रहेंगे। कल सुबह नौ बजे इन तीनों की जाँच होगी। और उस जाँच में सबसे पहले यह तय होगा कि दीवार के नीचे जो दबा है, वो किसका है।”
कमरा खाली होने लगा। मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा कि पीछे से आवाज़ आई —
“मनोहर।”
भवानी खड़ा था। उसके चेहरे पर वो डर अब भी था, पर उसकी आवाज़ सख़्त थी।
“तेरे दादा ने मेरे बाप से आधी हवेली लिखवाई थी, ये वसीयत बताती है। पर उस वसीयत के गवाह का नाम मिटाया गया है। और मिटाने वाला कोई और नहीं, तेरा दादा ख़ुद था।”
“झूठ।”
“चेक कर लेना। जिस काग़ज़ पर ये वसीयत लिखी है, उसके पीछे तेरे दादा के हाथ की एक लाइन है। वो लिखते हैं — ‘गवाह का नाम अब नहीं, ताकि जो मरे, उसका नाम ज़िंदा न रहे।’”
मैंने काग़ज़ पलटकर देखा। पीछे, हल्की पेंसिल में, वही लाइन थी। मेरे हाथ रुक गए।
“तो मेरे दादा ने गवाह का नाम मिटाया?”
“हाँ। और उसी वजह से मेरा बाप हवेली आधी रख सका, आधी नहीं। तेरे दादा ने अपने ही हाथों से वो काग़ज़ अधूरा कर दिया।”
मैंने लंबी साँस ली। “और तूने बीस साल ये काग़ज़ दबाया। तूने एक बार भी नहीं कहा कि हवेली मेरे दादा की है। क्यों?”
भवानी ने मेरी आँखों में देखा। “क्योंकि उस दिन से मैं हार मान चुका था, मनोहर। और हारा हुआ आदमी अपना हिसाब नहीं जोड़ता, सिर्फ़ बचाता है।”
वो पलटा और बाहर चला गया। इस बार उसने कोई धमकी नहीं दी।
बाहर आँगन में काकी खड़ी थीं, छोटू का हाथ थामे। उन्होंने मुझे देखा और बोलीं, “कल सुबह तेरे दादा की हड्डियाँ निकलेंगी। मैं उस वक़्त वहाँ रहूँगी। मुझे अपने ससुर का चेहरा देखना है — एक आख़िरी बार।”
मैंने सिर हिलाया।
घर लौटते वक़्त बंसी ने कहा, “तेरे दादा ने गवाह का नाम मिटाया। ये बात तेरे दिल को खा रही है।”
“खा रही है।”
“पर उन्होंने वो चाबी हमारे पापा के पास रखवाई थी। ये भी तो कुछ कहता है।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। “क्या?”
“कि उन्हें पता था, गवाह का नाम मिटाने के बाद भी हिसाब बाक़ी रहेगा। और वो हिसाब ख़ुद उनके ख़ून के हाथों से बराबर होगा।”
मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था। उस पर सत्रहवीं लकीर के नीचे नाम 'गेंदा' अब भी वैसा ही था। मैंने उसे उँगली से दबाया और धीरे से कहा —
“कल हम वो काग़ज़ लेकर जाएँगे जो तूने छिपाया। पर एक बात पहले बता — गेंदा कहाँ है?”
टोकन ने कोई शब्द नहीं उभारा। बस उसका कोना हल्का गरम हुआ, एक पल के लिए, और फिर ठंडा हो गया।
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