The Token System – Chapter 1078
मैंने जेब से डायरी निकाली। कम्मो ने उसे हाथ में लिया। उसने पन्ने उलटे। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। वो एक पन्ने पर रुकी।
“ये।” उसने कहा। “ये पन्ना। पढ़।”
मैंने पढ़ा। सुखदेव माली की लिखाई। “आज भवानी ने हवेली के तीसरे गड्ढे से एक लोहे का डिब्बा निकाला। मैंने पूछा क्या है। उसने कुछ नहीं कहा। मैंने चुपचाप देखा। उसने डिब्बा अपनी जेब में रख लिया। उसके चेहरे पर डर था। ये पहली बार था जब मैंने उसके चेहरे पर डर देखा।”
मैंने कम्मो की तरफ़ देखा। डर? भवानी के चेहरे पर?
“कम्मो,” मैंने कहा, “भवानी ने तीसरे गड्ढे से क्या निकाला था?”
कम्मो ने डायरी बंद की। उसने मेरी आँखों में देखा। उसकी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी।
“भवानी ने तीसरे गड्ढे से तेरे दादा की डायरी निकाल ली है,” कम्मो ने कहा, “जिसमें सुखदेव माली ने सब सच लिखा था। और अब वो उसे अदालत में जलाने की धमकी दे रहा है।”
कमरे में हवा रुक गई। बंसी की साँस सुनाई दी। मेरा हाथ डायरी पर जम गया।
“ये डायरी?” मैंने कहा। “ये?”
कम्मो ने धीरे से सिर हिलाया।
“नहीं।” उसने कहा। “जो तूने निकाली, ये असली है। भवानी के पास नक़ल है। पर वो अदालत को बता रहा है कि उसके पास असली है, और वो जलाएगा।”
“तो अदालत किसे मानेगी?”
कम्मो ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ और था — डर नहीं, हिम्मत।
“अदालत,” उसने कहा, “उसे मानेगी जो पहले पहुँचे।”
॥
“पहले पहुँचे,” मैंने दोहराया। “मतलब अदालत में डायरी पहुँचानी है — अपने हाथ से। भवानी के हाथ से नहीं।”
कम्मो ने सिर हिलाया। “और वो तुझे पहले पहुँचने ही नहीं देगा। उसके पास नक़ल है, पर नक़ल पर उसका दाँव है — वो कहेगा असली उसके पास है, तेरे पास जो है वो नक़ल है। अदालत दोनों को तोलेगी। और जब तक तोलेगी, भवानी वक़्त निकाल लेगा।”
“तो वक़्त निकलने नहीं देना।” मैंने डायरी जेब में रखी। “अभी हवेली चलते हैं।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “इस वक़्त? रात के दो बज रहे हैं।”
“डायरी अभी मिली है, और भवानी को पता चल जाएगा कि डायरी गई — उसके आदमी दफ़्तार पर पहुँच चुके होंगे। फिर वो जगह बदल देगा। हमें देखना है कि तीसरे गड्ढे में अब क्या है।”
कम्मो ने मेरा हाथ पकड़ा। “मन्नू। सुन।”
मैं रुका।
“तीसरा गड्ढा ख़ाली मिलेगा। पर उसके किनारे जो मिलेगा, उसे सँभालकर रखना। सुखदेव माली पूरी चीज़ एक जगह नहीं रखता था। वो बाँटकर रखता था।”
“मतलब?”
“मतलब — अगर एक काग़ज़ जल गया, तो दूसरा बचा होगा। और वो दूसरा तुझे ऐसी जगह मिलेगा जहाँ भवानी नहीं ढूँढेगा।”
“कहाँ?”
कम्मो ने कमरे की खिड़की की तरफ़ देखा। बाहर अंधेरा था।
“जहाँ दीवार बोलती है,” उसने कहा। “अब जाओ। और याद रखना — जो तुझे अदालत में पहुँचाए, वो तेरा गवाह नहीं, तेरा हाथ होगा।”
हम बाहर निकले। ठंडी हवा चेहरे पर लगी। बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की।
हवेली की गली में पुलिस की जीप खड़ी थी। दो सिपाही गेट पर थे, एक पीछे। राजेंद्र बरामदे में बैठा था, हाथ में रजिस्टर। हमें देखकर उठा।
“इस वक़्त?” उसने कहा।
“डायरी मिल गई, राजेंद्र।” मैंने कहा। “असली। भवानी के दफ़्तार से।”
राजेंद्र ने रजिस्टर बंद किया। उसने चारों तरफ़ देखा।
“रात में यहाँ भवानी के दो आदमी घूमते देखे गए,”उसने धीरे से कहा। “हमने खदेड़ दिया। पर वो कुछ ढूँढ रहे थे। मुझे लगा हवेली में, पर अब सोच रहा हूँ — शायद उन्हें कुछ और चाहिए था।”
“तीसरा गड्ढा,” मैंने कहा। “पीछे वाली दीवार में। चलो।”
हम पीछे गए। राजेंद्र ने टॉर्च जलाई। दीवार के पास पहुँचकर मैंने झुककर देखा। तीसरा गड्ढा ख़ाली था। उसके किनारे की मिट्टी ताज़ी खुरची हुई थी — खुरचन अभी गीली थी। और गड्ढे के नीचे, ज़मीन पर, काग़ज़ की जली हुई परत पड़ी थी।
मैंने उसे उठाया। जला किनारा, बीच से पीला। उस पर सुखदेव माली की लिखाई का हिस्सा दिख रहा था — “…और भवानी ने…” बाकी जल चुका था।
“इसे जलाने की कोशिश हुई,” मैंने कहा। “पूरी नहीं जली।”
“मतलब भवानी के आदमी यहाँ आए,” बंसी ने कहा, “कुछ जलाया, और गड्ढे से कुछ निकाल ले गए।”
“या गड्ढे में कुछ और रख गए,” राजेंद्र ने कहा। “ताकि हमें लगे यहाँ कुछ था।”
मैंने जली परत को रूमाल में लपेटकर जेब में रखा। फिर मैंने दीवार के उस कोने को देखा जहाँ कम्मो ने कहा था — जहाँ दीवार बोलती है।
“राजेंड्र,” मैंने कहा, “हवेली की उत्तर वाली दीवार कहाँ है?”
“पीछे, उस तरफ़।” उसने टॉर्च घुमाई। “पर वहाँ तो कोई गड्ढा नहीं। सपाट दीवार है।”
“दिखाओ।”
हम उत्तर वाली दीवार के पास पहुँचे। राजेंद्र की टॉर्च उस पर पड़ी। मैंने हाथ फेरा। ईंटें पुरानी थीं, जोड़ों में चूना। फिर मेरी उँगली एक जगह रुकी — तीसरी ईंट, नीचे से। उसका रंग बाक़ी से थोड़ा अलग था। और उसके नीचे का चूना नया लग रहा था।
“ये ईंट,” मैंने कहा। “इसे किसी ने हटाया है।”
राजेंद्र ने टॉर्च नीचे की। ईंट के नीचे, गड्ढे में, पीली स्याही से लिखा एक शब्द था — “पढ़।”
“कौन लिखेगा यहाँ?” राजेंद्र ने कहा।
“जिसे पता था कि कोई आएगा।” मैंने ईंट हटाने की कोशिश की। वो हिली। बंसी ने साथ दिया। ईंट बाहर आई। उसके पीछे छोटा गड्ढा था। उसमें कुछ नहीं था — सिर्फ़ एक तह काग़ज़, मोड़ा हुआ।
मैंने खोला। उस पर सुखदेव माली की लिखाई थी:
“जो इसे पढ़े — भवानी ने डायरी की नक़ल बनाई है। असली कभी उसके हाथ नहीं लगी, क्योंकि असली वो नहीं है जो उसने उठाई। असली दादा जी ने मेरे हाथ में दी थी, आख़िरी रात। और मैंने उसे उस जगह रखा जहाँ सिर्फ़ एक ही आदमी ढूँढ सकता है — जो अपने नाम से नहीं, हिसाब से चले। वो जगह — कुएँ की सातवीं सीढ़ी।”
मेरा हाथ काँपा। मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा।
“रात में कुआँ? वहाँ जाना बहुत बड़ा जोखिम है। भवानी के आदमी वहीं घूम रहे हैं।”
“तो सुबह,” बंसी ने कहा। “अदालत दस बजे है। सुबह छह बजे हम कुएँ पर होंगे।”
“नहीं।” मैंने कहा। “भवानी के आदमी कल सुबह कुएँ पर पहले होंगे। रात में अंधेरे का फ़ायदा उठाना होगा।”
“तू पागल है,” बंसी ने कहा। “अभी कुआँ, और फिर भवानी के होम?”
“मैंने कहा नहीं — मैं अकेला जाऊँगा। तुम दोनों यहाँ रहो, राजेंद्र के पास। अगर मैं चार बजे तक न आऊँ, तो तुम सीधे अदालत जाना और सक्सेना को ये जली परत देना।”
बंसी ने मेरा कंधा पकड़ा। “मैं तुझे अकेले नहीं भेजूँगा।”
“बंसी — भवानी के होम में अगर दो आदमी घुसें, तो शोर होगा। एक घुसेगा, तो सिर्फ़ एक।”
“और तेरे साथ क्या होगा?”
“मेरे पास ये है।” मैंने टोकन जेब से निकाला। ठंडा था। “और मेरे पास वक़्त है — दस बजे तक।”
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपनी जेब से एक छोटी पीतल की चाबी निकाली। “ये हवेली के पिछले दरवाज़े की है। सुबह मुझे लौटा देना।”
मैंने चाबी ली। बंसी ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गया। उसने मेरी तरफ़ देखा। “अगर तू चार बजे तक न आया, तो मैं अदालत जाऊँगा — पर मैं वहाँ तेरा नाम नहीं लूँगा, तेरी जगह खड़ा होऊँगा।”
मैं हँसा। “तू मोटा है, बंसी। मेरी जगह नहीं बैठेगा।”
“तो बैठने की जगह बढ़ा देंगे।” उसने कहा।
मैं हवेली के पिछले दरवाज़े से निकला। गली ख़ाली थी। बंसी ने गाड़ी का इंजन बंद रखा था। मैं पैदल ही अस्पताल के पीछे वाली गली की तरफ़ बढ़ा।
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