The Token System – Chapter 1077
मैंने काग़ज़ को जेब में रखा। मैंने माँ की तरफ़ देखा। माँ दरवाज़े पर खड़ी थी।
“माँ,” मैंने कहा, “मैं जा रहा हूँ।”
“कहाँ?”
“भवानी के दफ़्तार।”
माँ ने कुछ नहीं कहा। वो बस खड़ी रही। फिर वो बोली, “जाते वक़्त अपने पीछे मत देखना।”
मैं हँसा नहीं। मैंने सिर हिलाया। मैं बाहर निकला। बंसी गाड़ी में बैठा था। मैंने दरवाज़ा खोला।
“चलो।” मैंने कहा।
गाड़ी चली। सड़क पर अंधेरा था। मैंने बंसी की तरफ़ देखा।
“बंसी,” मैंने कहा, “अगर हमें वो डायरी मिल गई, तो क्या होगा?”
“तो,” बंसी ने कहा, “भवानी का हिसाब ख़त्म।”
“पर बंसी,” मैंने कहा, “अगर भवानी ने वो डायरी निकाल ली, तो?”
बंसी ने गाड़ी की रफ़्तार धीमी की। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। सामने सड़क पर देखता रहा।
“मन्नू भाई,” उसने कहा, “वो डायरी अगर भवानी के हाथ लग गई, तो वो उसे अदालत में जलाकर राख कर देगा। और फिर हमारे पास कुछ नहीं बचेगा।”
“तो हम अदालत पहुँचने से पहले निकालेंगे।”
“दफ़्तार में?”
“हाँ।”
बंसी ने गाड़ी को सड़क के किनारे रोका। उसने इंजन बंद किया। वो मेरी तरफ़ मुड़ा।
“भवानी का दफ़्तार,” उसने धीरे से कहा, “पुराने बाज़ार के ऊपर है। नीचे उसकी कोठी है। दो आदमी हमेशा गेट पर बैठते हैं। और ऊपर उसके कमरे के बाहर एक और।”
“तुम्हें कैसे पता?”
बंसी हँसा। “मैं दो साल उसके गाड़ी में चालक था। मुझे हर कोना पता है।”
“तो रास्ता भी?”
“रास्ता भी।” उसने कहा। “पीछे की तरफ़ एक सीढ़ी है, सीधे उसके कमरे में जाती है। पर उस सीढ़ी पर कुत्ता बाँधा है।”
“कुत्ता?”
“काला। बड़ा। भूखा रहता है।”
मैंने सोचा। फिर मैंने कहा, “कुत्ता किसके पास रहता है?”
“रात में कोई नहीं। सुबह माली उसे खाना देता है।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। “तो कुत्ता रात में जागता है या सोता है?”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर पहली बार कुछ बदला।
“तेरी मतलब?”
“मेरी मतलब,” मैंने कहा, “कि हम कुत्ते को रास्ता देंगे, उससे लड़ेंगे नहीं।”
बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की। “तू अजीब है, मन्नू भाई।”
“क्यों?”
“ख़तरे में भी तेरे सवाल ख़त्म नहीं होते।”
गाड़ी पुराने बाज़ार की तरफ़ मुड़ी। गलियाँ सूनी थीं। कुछ दूर पर एक चाय की दुकान पर बत्ती जल रही थी, जैसे रात में कोई आँख खुली हो। बाकी सब बंद।
हम बाज़ार के पीछे वाली गली में रुके। बंसी ने गाड़ी अंधेरे में खड़ी की, एक बंद दुकान के सामने।
“यहीं से पैदल।” उसने कहा।
हम उतरे। बंसी ने अपनी जेब से एक छोटी बत्ती निकाली। उसने उसे नहीं जलाया। वो चलता रहा, मैं उसके पीछे।
गली के आख़िर में एक पुरानी कोठी थी। दीवारें ऊँची। गेट पर दो आदमी बैठे थे। एक के हाथ में लाठी थी, दूसरा हाँफ रहा था, जैसे सीढ़ियाँ चढ़कर आया हो।
बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा। हम दीवार के साथ सटकर रुके।
“सीढ़ी उस कोने पर है।” उसने फुसफुसाया।
“कुत्ता?”
“देख।”
मैंने देखा। कोने के पास, अंधेरे में, एक काला साया था। ज़मीन पर पसरा हुआ। बत्ती की रोशनी ज़रा भी नहीं पड़ रही थी वहाँ।
“सो रहा है।” बंसी ने कहा।
“कैसे पता?”
“देख। उसकी साँस।”
मैंने गौर से देखा। साया धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रहा था। साँस। गहरी साँस।
मैंने जेब से कुछ निकाला। सुबह की रोटी, जो माँ ने चुपचाप थैली में रख दी थी। मैंने उसे बंसी को दिया।
“क्या करेगा?”
“तू बत्ती जला। पर ज़मीन की तरफ़।” मैंने कहा।
बंसी ने बत्ती जलाई। रोशनी ज़मीन पर पड़ी। कुत्ते ने हल्की सी गर्दन उठाई। उसकी आँखें चमकीं।
मैं रोटी लेकर धीरे से आगे बढ़ा। मैंने रोटी उसके सामने ज़मीन पर रखी। फिर पीछे हट गया।
कुत्ता उठा। वो मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर वो रोटी की तरफ़ झुका। उसने सूँघा। खाने लगा।
मैं सीढ़ी की तरफ़ बढ़ा। बंसी मेरे पीछे। सीढ़ी पुरानी थी, लकड़ी की, हिलती हुई। मैंने धीरे-धीरे पैर रखे। हर सीढ़ी चरमराती थी, जैसे कोई नींद में करवट ले रहा हो।
ऊपर पहुँचे। एक छोटा दरवाज़ा। खुला। मैंने अंदर झाँका। अंधेरा। मैंने बंसी से बत्ती ली। अंदर की तरफ़ रोशनी डाली।
कमरा बड़ा था। एक मेज़। उस पर काग़ज़ों के ढेर। कुर्सी। एक अलमारी। अलमारी पर ताला।
“काग़ज़ों में देख।” बंसी ने कहा। “मैं अलमारी देखता हूँ।”
मैं मेज़ के पास गया। काग़ज़ उलटने लगा। मामूली काग़ज़ — हिसाब-किताब, किसानों के नाम, लेन-देन के आँकड़े। कुछ और नहीं।
“यहाँ कुछ नहीं।” मैंने कहा।
“ताला खुलेगा?” बंसी ने पूछा।
“तोड़ना पड़ेगा। आवाज़ होगी।”
“तो?”
मैं अलमारी के पास गया। मैंने बंसी की बत्ती ली। अलमारी के पीछे झाँका। दीवार और अलमारी के बीच थोड़ी जगह थी। वहाँ कुछ पड़ा था। एक छोटा काला डिब्बा।
मैंने हाथ बढ़ाया। डिब्बा निकाला। वो भारी था। मैंने उसे खोला।
अंदर एक डायरी थी। भूरी जिल्द। पुरानी। मैंने पन्ने उलटे। लिखाई साफ़ थी। नीली स्याही। ऊपर पहले ही पन्ने पर लिखा था — “सुखदेव माली। हवेली का हिसाब।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें चमक रही थीं।
“मिल गई।” उसने धीरे से कहा।
मैंने डायरी जेब में रखी। फिर मैंने छोड़ी हुई कम्मो की चिट्ठी भी साथ रखी। “चलो।”
हम सीढ़ी की तरफ़ बढ़े। नीचे उतरे। कुत्ता अब ज़मीन पर पसरा था, रोटी खाकर। उसने हमारी तरफ़ देखा भी नहीं।
हम गली में निकले। बंसी ने बत्ती बंद की। हम तेज़ क़दमों से गाड़ी की तरफ़ बढ़े।
गाड़ी के पास पहुँचकर बंसी ने दरवाज़ा खोला। मैं बैठा। उसने गाड़ी स्टार्ट की।
“अब?” उसने पूछा।
“अब,” मैंने कहा, “कम्मो के पास।”
“कम्मो के पास?” बंसी ने हैरानी से देखा। “इतनी रात में फिर?”
“हाँ।” मैंने कहा। “उसको बताना है कि डायरी हमारे पास है। और उससे पूछना है कि भवानी का पहला हिस्सा क्या था। कम्मो ने कहा था वो सब जानती है।”
बंसी ने गाड़ी मोड़ी। सड़क ख़ाली थी। रात अब भी भारी थी।
“बंसी,” मैंने कहा, “तुमने भवानी के साथ दो साल काम किया। कभी उसने तुमसे कुछ कहा — उस हवेली के बारे में? कुछ ऐसा जो तुमने अब तक नहीं बताया?”
बंसी चुप रहा। गाड़ी की रोशनी सामने सड़क पर पड़ रही थी।
“एक बार,” उसने धीरे से कहा, “वो नशे में था। बैठकर बोला — ‘मैंने उस हवेली से सब निकाल लिया। अब उसका कोई नाम नहीं।’ मैंने पूछा — ‘सब क्या?’ तो वो हँसा और बोला — ‘जो उस हवेली में दबा था, वो मेरे पास है।’”
मेरा हाथ जेब पर गया। डायरी वहीं थी, ठोस, भारी।
“और कुछ?” मैंने पूछा।
“बस नहीं। वो सो गया। सुबह उसने वो बात भूल दी थी। पर मैं नहीं भूला।”
गाड़ी कम्मो की गली में मुड़ी। बंसी ने गाड़ी रोकी। हम उतरे। मैंने दरवाज़ा खटखटाया।
कम्मो ने खिड़की से झाँका। फिर दरवाज़ा खोला।
“तुम फिर आ गए?” उसने कहा। “क्या हुआ?”
“डायरी मिल गई।” मैंने कहा।
कम्मो ने मेरी तरफ़ देखा। वो एक कदम पीछे हटी। उसने हाथ से मुँह ढका।
“मिल गई?” उसकी आवाज़ काँपी।
“हाँ। भवानी के दफ़्तार से।”
कम्मो ने दरवाज़ा पूरा खोला। हम अंदर गए। कम्मो ने पीछे से साँस छोड़ी, जैसे बीस साल का बोझ उतरा हो।
“कम्मो,” मैंने कहा, “एक बात पूछनी है। तुमने कहा था कि भवानी का ‘पहला हिस्सा’ कुछ और था। मुझे बताओ।”
कम्मो ने मेरी तरफ़ देखा। वो कुर्सी पर बैठ गई। उसने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। “डायरी दिखाओ।”
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