The Token System – Chapter 1065
बंसी ने फॉर्म पढ़ा। तारीख़ थी — साल दो हज़ार चार, महीना सात। “ये तो वही साल है जब तुम्हारे पापा की ज़मीन गई थी।”
“हाँ। और देख — नीचे ये लिखा है, ‘सहमति श्री रामलाल द्वारा’।” मैंने उसकी तरफ़ देखा। “रामलाल कभी गवाह नहीं था, बंसी। वो सौदे का गवाह था।”
तभी पीछे से आवाज़ आई, “ये काग़ज़ तुमने कहाँ से उठाए?”
पलटकर देखा। रामलाल दरवाज़े पर खड़ा था। पीछे उसका चपरासी और — एक और आदमी। सफ़ेद कुर्ता, मोटा शरीर, चेहरे पर कोई भाव नहीं। भवानी का हथियारबंद आदमी।
रामलाल ने कदम बढ़ाया। “मन्नू बाबू, मेहरबानी करके ये काग़ज़ वापस दें।”
“क्यों? ये तो जलाना बाक़ी रह गया था।”
“आप बिगड़ते हैं।” उसकी आवाज़ बदल गई। “किशनचंद जी मुझे बाप जैसे थे। मैंने कुछ बिगाड़ा नहीं। बस उस दिन मुझे भी… मुझे भी दबाव था।”
“किसका दबाव?”
रामलाल ने हाथ की तरफ़ देखा। सफ़ेद कुर्ते वाले ने सिर हिलाया।
रामलाल ने आँखें नीची कर लीं। “मुझे माफ़ कर दो। मैंने वो रजिस्टर का पन्ना नहीं बदला। सिर्फ़ अपने हस्ताक्षर लगाए।”
“किसके कहने पर?”
वो चुप रहा।
उसके पीछे खड़े आदमी ने धीरे से कहा, “रामलाल, भवानी साहब तुम्हें नहीं बचा पाएँगे। सोच लो।”
वो वाक्य रामलाल के लिए ही नहीं, मेरे लिए भी था। और रामलाल ने धीरे से पूछा, “मेरे बदले क्या मिलेगा?”
“सबूत,” मैंने कहा। “अदालत में तुम्हारा बयान। और कोई नहीं मारेगा तुम्हें।”
वो हँसा। “कौन बचाएगा, तुम?”
“कानून।” बंसी आगे आया। “जिसके पास ये काग़ज़ हैं।”
सफ़ेद कुर्ते वाले ने अपनी जेब में हाथ डाला। मैंने उसकी कलाई पकड़ ली। “यहाँ सब देख रहे हैं। पीछे गली में दो दुकानें खुली हैं।” मेरी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी, मुझे खुद हैरानी हुई। बंसी ने बीच में आकर हमें अलग किया। रामलाल की आँखों में सच बोलने की हिम्मत आ गई थी।
रामलाल ने काग़ज़ की तरफ़ देखा। फिर आहिस्ता बोला, “मैं कल… अदालत जाऊँगा। मेरे पास जो है, बताऊँगा।”
सफ़ेद कुर्ते वाले ने उसका कंधा पकड़ा। “रामलाल।”
“जाने दो!” रामलाल ने हाथ झटका। “बहुत हो गया।”
वो पीछे मुड़ा और घर के अंदर चला गया। सफ़ेद कुर्ते वाले ने मेरी तरफ़ देखा, फिर जल्दी से गली में ग़ायब हो गया।
बंसी ने साँस छोड़ी। “ये ठीक हुआ।”
“अभी नहीं,” मैंने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि जब कोई चेहरा खुल जाता है, तो उसे दबाने वाले ज़्यादा भूखे हो जाते हैं।” मैंने काग़ज़ संभाले। “अब भवानी को पता चलेगा कि रामलाल टूट गया। किसी को तो जागना पड़ेगा।”
हम बाहर निकले। गाड़ी की तरफ़ बढ़ ही रहे थे कि छोटू सामने से आ गया, साँस फूलती हुई।
“भैया! भैया!” वो मेरी कमर से लिपट गया। “मैंने सोचा आप जाने वाले हो।”
“छोटू, तू यहाँ? कोई भी देखे तो…”
“भैया, मुझे एक बात पता चली।” छोटू ने मुझे पीछे खींचकर एक तरफ़ लिया, धीरे से, जैसे कोई बड़ी बात कहने जा रहा हो। “रामलाल की बीवी — राधा दीदी — मेरे मोहल्ले में झाड़ू लगाती हैं। आज सुबह मैंने उनसे पूछा तो वो डर गईं।”
“क्या पूछा?”
“रामलाल के बारे में। तो वो कहने लगीं —” छोटू की आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई। “कहने लगीं कि रामलाल को कोई पन्द्रह साल परेशान कर रहा है। एक बात उन्होंने कही — ‘जब भी भवानी का आदमी आता है, मेरे पति चुप हो जाते हैं। पर एक दिन आएगा, जब उनका सारा सच खुलेगा। और वो सच जो है —’”
छोटू रुका। मैंने पकड़कर पूछा, “क्या? क्या बोलीं?”
छोटू की आँखें चमक रही थीं। “राधा दीदी कह रही थीं — भवानी के पास भी एक बड़ा सच छुपा है।”
मैं ठिठक गया। “क्या सच?”
“वो नहीं बोलीं। पर एक बात ज़रूर कही — ‘भवानी को भी कोई डराता है।’”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “भवानी को कोई डराता है? मतलब भवानी के ऊपर भी कोई है।”
मैंने छोटू का सिर थपथपाया। “कहाँ है राधा दीदी अभी?”
“अपने घर में। आज उनकी छुट्टी है।”
मैं गाड़ी की तरफ़ बढ़ा। फिर रुककर बंसी से बोला, “पहले राधा दीदी से मिलना है।”
“फिर अदालत?”
“अदालत कल है।” मैंने जेब से पन्ना निकाला। “और ये पन्ना मुझे किसी की तरफ़ इशारा कर रहा है, जिसे भवानी भी डरता है।”
गाड़ी में बैठे ही मैंने पन्ने को फिर खोला। सूरज की रोशनी उस पर पड़ी। मैंने उसे ध्यान से देखा — बीच के हिस्से में, जहाँ स्याही थोड़ी बची थी, कुछ लिखा दिख रहा था। मैंने पन्ना करीब लाया।
“क्या है?” बंसी ने पूछा।
“नाम नहीं है। बस एक वाक्य का टुकड़ा है।”
“क्या लिखा है?”
मैंने धीरे-धीरे पढ़ा — ‘… भाई को बचाने के लिए मैंने …’
“भाई?
॥
राधा दीदी का घर गली के उस मोड़ पर था जहाँ से मोहल्ले की आवाज़ें भी नहीं आती थीं। दरवाज़ा खुला था, आँगन में गीली झाड़ू रखी थी, और वो चबूतरे पर बैठी मेरी तरफ़ देख रही थी जैसे मुझे आते ही जान गई हो।
“दीदी, मुझे रामलाल जी से…"
“वो नहीं हैं।” उसने झाड़ू उठाई। “और तू जो सोचकर आया है, वो पहले मुझे बता।”
मैं रुका। बंसी पीछे खड़ा रह गया। मैंने जले पन्ने की तरफ़ इशारा किया।
“ये रामलाल जी के घर से मिला है। इसे किसी ने आग में झोंका था। अंगूठा उनका है, हस्ताक्षर मेरे पापा का।”
राधा ने झाड़ू को दीवार से टिकाया। फिर दरवाज़ा अंदर से बंद किया और मेरे सामने चबूतरे पर बैठ गई।
“तू वही है न, जिसने मेरे पति को अदालत में बोलने को राज़ी किया?”
“हाँ।”
“फिर एक बात सुन।” उसने धीरे से कहा, “मेरे पति सालों से उसी काग़ज़ के डर से ज़िंदा हैं। रोज़ रात सोते वक़्त उनकी आँख खुली रहती है। मैं पूछती हूँ तो कहते हैं — राधा, तेरे और बच्चों के लिए।”
“अब डरने की ज़रूरत नहीं।”
“अपनी बात पर तू ख़ुद यक़ीन करता है?”
“ना।” मैंने सच कहा। “पर कोशिश करता हूँ।”
वो हँसी। पहली बार। एक छोटी, सूखी हँसी।
“झूठ मत बोल।” उसने कहा। “जब तक भवानी का हाथ ऊपर है, कोई नहीं जानता कि कल किसके दरवाज़े पर किसका आदमी खड़ा होगा।”
“दीदी, एक बात पूछूँ?”
“पूछ।”
“कल आपने छोटू से कहा था कि भवानी को भी कोई डराता है।”
उसका चेहरा एक पल के लिए पत्थर हो गया। फिर वो उठी और घर के अंदर गई। मैंने सोचा बात खत्म। पर वो लौटी — हाथ में एक टिन का डिब्बा था, जिस पर उलटा कोना-चिह्न खुरचा हुआ था।
“ये मेरे पति ने कभी किसी को नहीं दिखाया।” उसने डिब्बा मेरी तरफ़ बढ़ाया। “कल रात जब वो घर लौटे, तो कह रहे थे — अब जो होगा, देखा जाएगा। तब मैंने पूछा कि भवानी का आदमी आया था क्या? तो वो बोले — राधा, भवानी का आदमी नहीं, भवानी का ख़ौफ़ आया था।”
“ख़ौफ़?”
“भवानी को भी कोई डराता है।” उसने डिब्बा खोला। “इसलिए ही वो बूढ़ा होकर भी कुर्सी पर ढंग से नहीं बैठ पाता।”
डिब्बे में एक पुरानी तस्वीर थी — तीन आदमी, किसी दुकान के सामने। बीच वाले का चेहरा खुरच दिया गया था। नीचे पेंसिल से लिखा था — ‘जो मुझे डराता है, वो मेरे ही घर में रहता है।’
“ये तस्वीर मेरे ससुर की है।” राधा ने कहा। “वो कहते थे, भवानी को कोई ऊपर से चला रहा है — भवानी सिर्फ़ हाथ है।”
“कौन?”
“उन्होंने नाम कभी नहीं लिया। बस ये डिब्बा रख दिया और कहा — जब कोई सच में लड़ने आए, तो दे देना।”
मैंने तस्वीर उठाई। तीन आदमी। बाएँ वाला युवा लग रहा था — मेरे पापा जैसा। दाएँ वाला — भवानी। और बीच वाला वही, जिसका चेहरा मिटा दिया गया था।
“ये डिब्बा मैं ले जाऊँ?”
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