The Token System – Chapter 1064
अदालत के बाहर भीड़ जुटी थी। बंसी ने गाड़ी रोकते ही कहा, “सीधे अंदर चल। किसी से आँख न मिलाना।”
हम सीढ़ियाँ चढ़ने लगे, तभी पीछे से आवाज़ आई — “मन्नू!”
मैंने पलटकर देखा। माँ थी। सफ़ेद साड़ी, हाथ में छोटा बैग, आँखें भरी हुई। पीछे चाची खड़ी थीं।
“माँ, आप यहाँ?”
“तू अकेला लड़ता रहा, अब लड़ने दो मुझे भी।” उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। हाथ काँप रहा था, पर पकड़ मज़बूत थी।
“माँ, अंदर भवानी के आदमी होंगे।”
“होंगे। मैं भी देखूँगी उन्हें।” वो सीढ़ी चढ़ने लगीं। मैंने उन्हें रोका नहीं। शायद अब रोकना सही भी नहीं था।
अंदर बरामदे में वकील खड़े थे। भवानी के वकील — शुक्ला जी — सफ़ेद शेरवानी में, हाथ में मोटी फाइल। हमें देखकर मुस्कुराए। “अरे, मन्नू बाबू! हम तो सोच रहे थे, आप आज नहीं आएँगे।”
“क्यों, आपने सोचा था कि मैं डर जाऊँगा?”
“डर? नहीं नहीं।” वो हँसे। “बस कल की सुनवाई के बाद थोड़ी सोच… आपका गवाह तो कल रात ग़ायब हो गया ना।”
मेरे पैर रुक गए। “कौन गवाह?”
“अरे, आपको नहीं पता?” उन्होंने फाइल खोली। “जिस बूढ़े के बयान पर आप इतना भरोसा कर रहे थे — जगदीश? वो कल रात से नहीं मिल रहा। उनके घर पर ताला है। गाँव वाले कह रहे हैं, किसी से कुछ कहकर चले गए।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
शुक्ला जी ने फाइल बंद की। “खैर, अंदर चलिए। जज साहब आज जल्दी निपटाना चाहते हैं।”
अंदर जाकर मैंने जगदीश चाचा की कुर्सी देखी। खाली थी। उनकी जगह किसी और ने लिया था — कोई नया गवाह बैठा था, गोरा, मोटा, सफ़ेद शर्ट।
बंसी मेरे कान के पास झुका। “ये कौन है?”
“नहीं जानता।”
जज साहब आए। सुनवाई शुरू हुई। भवानी का वकील उठा और बोला, “माई लॉर्ड, हम अपना नया गवाह पेश करना चाहते हैं। ये श्री रामलाल हैं, अस्पताल के पुराने हिसाब-किताब रखने वाले।”
रामलाल।
मेरी जेब में पन्ना था। उस पर तीन अक्षर — “रा म…”। अधूरा नाम। मेरे दिमाग़ में बिजली सी दौड़ी।
बंसी ने मेरी कलाई दबाई। “मन्नू। वो जलाया हुआ पन्ना।”
“हाँ।” मेरी आवाज़ फूटी। “रामलाल।”
रामलाल गवाह के कठघरे में गया। हाथ में क़ुरान रखी। शपथ ली। फिर मुस्कुराकर बोला, “माई लॉर्ड, मैं पच्चीस साल अस्पताल में रहा हूँ। मैंने वो रजिस्टर अपनी आँखों से भरा है। और मैं साफ़ कहता हूँ — ये किशनचंद ने अपनी मर्ज़ी से ज़मीन बेची थी। कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं हुई थी।”
कोर्ट में खुसफुसाहट फैल गई। माँ ने मेरा हाथ कसकर पकड़ा।
शुक्ला जी ने मुस्कुराकर मेरी तरफ़ देखा। “माई लॉर्ड, चूँकि उनके गवाह जगदीश जी आज मौजूद नहीं हैं, हम निवेदन करते हैं कि उनका कल का बयान रिकॉर्ड से हटाया जाए।”
“एक मिनट, जज साहब!” मैं खड़ा हो गया। मेरे हाथ काँप रहे थे, पर आवाज़ नहीं।
जज साहब ने चश्मे के ऊपर से देखा। “तुम हो?”
“मन्नू, जी। किशनचंद का बेटा।”
“अपना बयान पहले लिखवा चुके हो। कोर्ट में टोकना तुम्हारा काम नहीं।”
“जज साहब, एक बात। कल रात अस्पताल के कबाड़े में कुछ काग़ज़ जलाए गए। मैंने आधा जला पन्ना बचाया है। उस पर पापा का हस्ताक्षर है। और उस पर एक अंगूठे का निशान है।”
शुक्ला जी तुरंत खड़े हुए। “माई लॉर्ड, ये सब नाटक है। आधा जला काग़ज़ कोई सबूत नहीं होता।”
“सही कह रहे हैं वकील साहब,” मैंने कहा। “आधा जला काग़ज़ सबूत नहीं होता। पर एक बात पूछ लूँ — जब वो काग़ज़ जलाया जा रहा था, तो रामलाल जी वहाँ क्यों थे?”
रामलाल के चेहरे का रंग उड़ गया। वो कुछ बोलने ही वाला था कि जज साहब ने कहा, “कोर्ट में आरोप साबित करो, सवाल नहीं। अगली सुनवाई सोमवार। तब तक दोनों पक्ष सबूत लाएँ।”
हथौड़ी पड़ी। भीड़ उठने लगी।
बाहर आते ही बंसी ने कहा, “क्या किया तूने? रामलाल की नसें खींच दीं।”
“उसे डरना ज़रूरी था।” मैंने पीछे देखा। रामलाल अपनी कुर्सी से उठते वक़्त किसी का हाथ पकड़ रहा था। जिसका हाथ पकड़ा, वो सफ़ेद कुर्ते में था। वही, जो कबाड़े में टंकी के पीछे छिपा था।
मैं सीधे उसकी तरफ़ बढ़ा। वो पलटा, भागने लगा।
“रुक!” मैंने दौड़कर उसका कंधा पकड़ा। वो चिहुँकरा। साँवला, दुबला, पचास के आसपास का आदमी। आँखों में डर।
“तुम कौन हो?”
“मैं… मैं रामलाल का चपरासी हूँ।”
“कबाड़े में काग़ज़ जलाने क्यों गए थे?”
“मैंने नहीं जलाए।” उसकी आवाज़ फटी। “रामलाल ने भेजा था। कहा था — सारे पुराने काग़ज़ जला दो, बदले में पाँच हज़ार मिलेंगे।”
मेरी जेब में पन्ना था। मैंने उसे निकाला। “ये देख। ये अंगूठे का निशान किसका है?”
उसने पन्ना पकड़ा, हाथ काँप रहा था। देखते ही उसकी आँखें फैल गईं। “ये… ये रामलाल बाबू का अंगूठा है।”
मेरा दिल एक पल के लिए रुक गया। “रामलाल का? भवानी का नहीं?”
“भवानी बाबू का अंगूठा बड़ा है, चौड़ा। मैं रामलाल बाबू के अंगूठे के निशान रोज़ देखता हूँ — हिसाब के काग़ज़ों पर लगाते हैं। ये उन्हीं का है।”
वो भाग गया। मैं वहीं खड़ा रहा।
बंसी पास आया। “मन्नू?”
“रामलाल। उसने अपने हाथ से पापा के काग़ज़ पर मुहर लगाई थी। वो गवाही दे रहा है कि सब ठीक था, और खुद ही सबूत जला रहा है।”
“मतलब भवानी का आदमी नहीं — रामलाल खुद भवानी को बचा रहा है।”
“नहीं बंसी।” मैंने पन्ना करीब से देखा। “ये पापा के हस्ताक्षर के नीचे है। मतलब रामलाल वो काग़ज़ तैयार करने वालों में था। जब ज़मीन छीनी गई, तब वो वहाँ था। और अब वो भवानी के साथ है।”
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। “तो अब क्या?”
“अब हमें रामलाल के घर जाना है। अंदर जो कुछ है, वो उसने नहीं जलाया। जो नहीं जला, वो बाहर भी होगा।”
बंसी ने गाड़ी की चाबी निकाली। “कहाँ है उसका घर?”
मैंने उस आदमी के भागने की दिशा देखी। “चपरासी उसी गली की तरफ़ भागा था। अस्पताल के पीछे पुरानी बस्ती है।”
गाड़ी दौड़ी। रास्ते में बंसी ने कहा, “मन्नू, एक बात सोच। अगर रामलाल इतने साल से भवानी के साथ था, तो उसने आज तक क्यों नहीं बताया? आज क्यों जलाने आया?”
“क्योंकि कल जगदीश चाचा ग़ायब हो गए। अब गवाही का डर बढ़ गया। उसने सोचा — काग़ज़ जला दूँ, फिर मुकर जाऊँगा।”
“पर जगदीश भी तो भवानी के आदमियों ने…”
“हो सकता है।” मैंने बाहर देखा। “या फिर जगदीश खुद डरकर भागा हो। हर आदमी भवानी का आदमी नहीं होता, बंसी। कुछ आदमी सिर्फ़ अपनी जान बचाते हैं।”
बंसी चुप हो गया।
पुरानी बस्ती में घुसते ही गंध बदल गई। गली के आख़िर में एक छोटा-सा मकान था, पीली दीवार, टूटा फाटक। बंद था।
“ताला?” बंसी ने पूछा।
मैंने फाटक को धक्का दिया। खुल गया। अंदर आँगन में कुछ काग़ज़ पड़े थे, पर साफ़-सुथरे। जलने का निशान नहीं।
“यहाँ तो कुछ जला ही नहीं,” बंसी ने कहा।
“क्योंकि जलाने वाला अस्पताल से बाहर नहीं लाया।” मैंने आँगन में पड़े काग़ज़ उठाए। अस्पताल के पुराने फॉर्म थे। एक-एक करके देखे — कुछ ख़ाली, कुछ पर हस्ताक्षर। फिर मेरा हाथ रुका।
एक फॉर्म पर पापा की लिखाई थी। बिलकुल उसी तरह, जैसे जले पन्ने पर। नीचे रामलाल के हस्ताक्षर — और भवानी की मुहर।
“बंसी, ये देख।” मैंने उसे दिखाया। “ये असली काग़ज़ है। न जला, न फटा। रामलाल ने इसे जलाना तो दूर, यहाँ रखा है — क्योंकि इसे देखकर उसे अपने ही किए पर डर लगता है। ये उसका अपना गुनाह है, जो वो छुपाए फिर रहा है।”
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