The Token System – Chapter 1066
“ले जा।” उसने कहा। “पर एक बात याद रखना — जो आदमी भवानी को भी डराता है, वो किसी अदालत से नहीं डरता।”
मैंने डिब्बा जेब में रखा। निकलते वक़्त राधा ने मेरा हाथ पकड़ा।
“रामलाल कहे हैं — सोमवार को वो ख़ुद आएँगे। और जो काग़ज़ उन्होंने जलाया था, उसकी कॉपी उनके पास है।”
मैं ठिठक गया। “कॉपी?”
“कुछ लोग पहले कॉपी रखते हैं। मेरे पति वैसे ही हैं।”
गाड़ी में बैठकर मैंने पन्ना फिर खोला। ‘… भाई को बचाने के लिए मैंने …’
“भाई किसका?” बंसी ने पूछा।
“यही तो समझ नहीं आ रहा।” मैंने अंगूठे का निशान देखा। “ये निशान किसी और का है। पापा का नहीं।”
“तो किसका?”
“ये मैं सक्सेना दीदी से पूछूँगा। वो काग़ज़ों की आदत जानती हैं।”
सक्सेना का दफ़्तार अदालत के पीछे एक पुरानी इमारत में था। उन्होंने पन्ना हाथ में लिया, दो मिनट तक देखा, फिर दीवार पर टँगे एक पुराने रजिस्टर की तरफ़ गईं।
“ये अंगूठा उस आदमी का है जो बीस साल पहले अस्पताल का रजिस्टर संभालता था।” उन्होंने कहा। “हर पन्ने पर उसका अंगूठा लगता था — इस तरह।”
उन्होंने उँगली रखी। मिलान साफ़ था।
“नाम?”
“रामदीन।” सक्सेना ने रजिस्टर बंद किया। “अस्पताल के रिकॉर्ड कमरे का चौकीदार था। अब रिटायर है। पुराने शहर में रहता है — उसके पीछे की गली में, कुएँ के पास।”
“वो भवानी का आदमी है?”
“नहीं।” सक्सेना ने कहा। “वो बस डरा हुआ आदमी है।”
बंसी ने बाहर रुककर सिगरेट सुलगाई। “रामदीन… ये तो वही नाम है जो मुझे कहीं और मिला था।”
“कहाँ?”
“याद नहीं। पर ये नाम मेरे कानों में पहले भी आया है।”
मैंने गाड़ी स्टार्ट की। “तो चलो, दोबारा सुन लो।”
पुराने शहर की गली में उतरते ही हवा बदल गई। ऊपर तारों पर कपड़े सूख रहे थे, कुएँ की जगह अब एक छोटा मंदिर था, और उसके पीछे पीली दीवार वाला एक कमरा — जिसका दरवाज़ा खुला था, पर अंदर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी।
मैंने दस्तक दी। कोई नहीं आया।
“अंदर देखूँ?” बंसी ने पूछा।
“अंदर?” मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
“खुला है।”
हम अंदर गए। एक चारपाई, एक मेज़, ऊपर एक पुराना पंखा। दीवार पर एक कैलेंडर लटक रहा था, जिसमें तारीख़ें काटी हुई थीं। मेज़ पर एक कटोरी में चाय ठंडी पड़ी थी।
“लगता है अभी-अभी उठा है।” बंसी ने कहा।
“या उठाकर ले गए।”
दरवाज़े के पीछे कुछ खुरखुराहट हुई। मैंने पलटकर देखा। एक बूढ़ा आदमी खड़ा था — झुकी कमर, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में लाठी, और आँखों में वो डर जो पहले रामलाल की आँखों में देखा था।
“तुम कौन हो?” उसने पूछा।
“मनोहर। किशनचंद का बेटा।”
उसकी लाठी हाथ से छूट गई। वो दीवार के सहारे बैठ गया।
“आ गए।” उसने धीरे से कहा। “बीस साल बाद।”
बंसी ने उसे पानी पिलाया। रामदीन ने गिलास हाथ में लेकर भी नहीं पिया। बस मेरी तरफ़ देखता रहा।
“तुम्हारे पापा…?” उसने पूछा।
“अस्पताल में। होश में हैं, पर कमज़ोर।”
“हाँ।” उसने आँखें बंद कर लीं। “होना ही था।”
“रामदीन चाचा, मुझे पता है कि आप डरते हैं।” मैंने धीरे से कहा। “मैं आपसे कुछ छीनने नहीं आया। बस एक जवाब चाहिए। ये अंगूठा आपका है न?”
उसने पन्ना देखा और चेहरा फेर लिया।
“नहीं।”
“चाचा…”
“कह दिया ना नहीं! जाओ यहाँ से!” उसकी आवाज़ चीख में बदल गई। “मेरे पास कुछ नहीं है। मुझे भवानी के कुत्ते सालों से पहचानते हैं। अगर तुम आए दिखे तो…”
“तो क्या?”
वो रुक गया। फिर बोला, “तो मेरी बेटी के स्कूल से फ़ोन आ जाएगा।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
मैं रामदीन के सामने बैठ गया। घुटनों के बल। “चाचा, मेरी बहन की शादी भी इसी डर से टल रही है। भवानी ने मेरे घर तक को धमकाया है। माँ को उठा लिया, पापा को दीवार में बंद कर दिया। मैं आपसे बस एक बात कहूँगा — अगर आज आप चुप रहे, तो कल आपकी बेटी उसी दरवाज़े पर खड़ी होगी जहाँ मेरी माँ खड़ी थी।”
रामदीन की आँखें भर आईं। उसने मुँह फेरा। बंसी चुपचाप दरवाज़े की तरफ़ चला गया।
पाँच मिनट तक कुछ नहीं बोला। फिर उसने घुटने पर हाथ रखा और खड़ा हो गया।
“बैठ।” उसने कहा। “मैं तुझे कुछ दिखाता हूँ।”
वो दीवार के कोने की तरफ़ बढ़ा, जहाँ ईंटों का एक छोटा हिस्सा अलग रंग का था। उसने चारपाई के नीचे से एक पुरानी छेनी निकाली और ईंटें हटाने लगा। दस मिनट बाद एक छोटी सी जगह खुली — उसमें लोहे की एक पुरानी पेटी थी।
“भवानी के आदमी आते थे।” उसने पेटी खोलते हुए कहा। “मुझे कहते — रजिस्टर निकाल। मैं निकलता था। वो पन्ने ले जाते। पर एक आदमी ने मुझे बीस साल पहले ये सिखा दिया था — जो दिया जाता है, उसकी नकल रखो।”
पेटी में पुरानी फ़ाइलों का ढेर था। सबसे नीचे से उसने एक पीला लिफ़ाफ़ा निकाला। फिर अंदर से तीन काग़ज़ — पीले, फटे, किनारों से टेढ़े।
“देख।” उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। “यही हैं वो तीन पन्ने जो रजिस्टर से गायब थे। मेरी नकल में आज भी हैं।”
मैंने काग़ज़ हाथ में लिए। उन पर साफ़-साफ़ लिखा था — तारीख़ें, नाम, और हर पन्ने के नीचे हस्ताक्षर।
“ये पापा के हस्ताक्षर हैं।” मेरी आवाज़ फिसल गई।
“हाँ।” रामदीन ने कहा। “ये वो रजिस्टर है जिसमें भवानी के होम से गायब हुए मरीज़ों की तारीख़ें दर्ज हैं। तेरे पापा ने इसे छिपाया था — भवानी से।”
बंसी काग़ज़ के पास आया। “तो जगदीश नाम का गवाह जो अदालत में आने वाला था — वो इसी रजिस्टर का हिस्सा था?”
“नहीं।” रामदीन ने कहा। “जगदीश तो बस सामने वाला आदमी है। ये रजिस्टर असली काग़ज़ है। इसमें साल दर साल के मरीज़ों के नाम हैं जो भवानी के होम भेजे गए और कभी वापस नहीं आए।”
मैंने पन्ने पलटे। हर पन्ने पर दस-बारह नाम। कोई नाम पूरा, कोई आधा। बीच में एक तारीख़ ऐसी थी जिसके आगे लिखा था — ‘डॉक्टर बीरा देवी — भर्ती हुई — वापस नहीं आई।’
मेरा हाथ रुक गया। “डॉक्टर बीरा देवी…?”
“हाँ।” रामदीन ने कहा। “अमर की माँ।”
मैंने काग़ज़ जेब में रखा। “चाचा, ये मुझे देंगे?”
“यही तो सोच रहा हूँ।” वो हँसा। आँसू में भीगी हँसी। “बीस साल रखा, कभी किसी काम नहीं आया। आज लग रहा है, इसे इसी दिन आना था।”
मैं उठकर उसके पैर छूने लगा। उसने हाथ पकड़कर रोक लिया।
“पैर मत छू।” उसने कहा। “मैंने बीस साल चुप रहकर गुनाह किया है। ये तो तुझे देकर मैं अपना हिसाब बराबर कर रहा हूँ।”
उसने काग़ज़ अपनी तरफ़ खींच लिए और एक पल के लिए छाती से लगा लिए, जैसे बिदा कर रहा हो। फिर बढ़ा दिए।
“एक बात और।” वो रुका। मैंने पलटकर देखा।
“सुखिया मरी नहीं है।”
बंसी ठिठक गया। मैंने कदम रोके।
“क्या कहा?”
“सुखिया ज़िंदा है।” रामदीन ने धीरे से कहा। “उसका नाम बदल दिया गया है। जब भवानी के आदमियों ने उसका नाम रजिस्टर से मिटाया, तो उसने नाम ही बदल लिया। अब वो पुराने शहर में ही रहती है — बिलकुल मेरे पीछे की गली में।”
“और आपने अब तक नहीं बताया?” बंसी की आवाज़ में गुस्सा साफ़ था।
“कैसे बताता?” रामदीन का चेहरा फिर बुढ़ा गया। “जिसने अपना नाम बदला, उसकी इज़्ज़त उसके नाम में ही है। अगर मैं बोलता, तो भवानी के आदमी उसे भी ढूँढ लेते।”
“अब?” मैंने पूछा।
“अब तू आया है।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “अब तुझे डर नहीं है — ये मैं देख रहा हूँ।”
“उसका अब क्या नाम है?”
रामदीन मुस्कुराया। पहली बार। “गंगा। वो अपने आप को सुखिया का बदला कहती है।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। वो कुछ सोच रहा था।
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