The Token System – Chapter 1060
रामगंज की गली से निकलते ही बंसी ने गाड़ी की रफ़्तार बढ़ाई। सड़क किनारे कुत्ते भौंक रहे थे और मैं जेब में टोकन दबाए बैठा था, जो अब भी हल्का गरम था।
"हवेली की रसोई," मैंने कहा। "बसंती वहीं काम करती थी बीस साल पहले।"
बंसी ने पहिया घुमाया। "बीस साल पहले की औरत को इस वक़्त कहाँ ढूँढेगा? गली-गली घूमेंगे तो सुबह निकल जाएगी।"
"तो गली-गली घूमेंगे।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुरा दिया। "तेरे पास जवाब हर बार तैयार होता है।"
हवेली के पीछे वाली गली में पुलिस का एक सिपाही अब भी तैनात था। हमने गाड़ी दूर खड़ी की। मैंने सिपाही को अपना चेहरा दिखाया, वो मुझे नाम से जानता था।
"कुछ पता चला?" मैंने पूछा।
"कुछ औरतें आती थीं सुबह, हवेली के पीछे वाले कुएँ पर कपड़े धोने। मैंने पूछा तो बोलीं — पुरानी चक्की के पास बसंती रहती है।"
मेरा दिल एक धक्का बढ़ गया। "कहाँ? पुरानी चक्की?"
"बसवा रोड पर। चक्की तो बंद है, पर उसके पास की बस्ती में एक बूढ़ी औरत रहती है — अकेली। पीली दीवार वाला घर।"
बंसी ने मेरी कलाई पकड़ी। "चल।"
बसवा रोड पर पुरानी चक्की का ढाँचा अब भी खड़ा था — लोहे का जंग लगा पहिया, टूटी छत। उसके पीछे मिट्टी की गली में पीली दीवार वाला एक कमरे का घर। दरवाज़ा अंदर से बंद।
मैंने दरवाज़ा खटखटाया। कुछ नहीं हुआ। फिर खिड़की की तरफ़ गया। खिड़की के परदे के पीछे हल्की रोशनी थी।
"बसंती देवी?" मैंने आवाज़ दी।
अंदर कोई हिला। फिर एक धीमी, फटी आवाज़ आई। "कौन?"
"मैं मनोहर हूँ। किशनचंद का बेटा।"
अंदर लंबा सन्नाटा रहा। फिर कुंडी खुलने की आवाज़ आई और दरवाज़ा थोड़ा सा खुला। सत्तर से ऊपर की एक औरत सामने खड़ी थी — सफ़ेद बाल, झुकी कमर, हाथ में छड़ी। उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें भर आईं।
"किशनचंद का बेटा," उसने धीरे से कहा। "तू आ गया। मैं बीस साल से इस दरवाज़े से यही आस लगाए बैठी थी।"
वो दरवाज़ा पूरा खोलकर पीछे हटी। अंदर एक चारपाई थी, एक छोटा चूल्हा, और दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर।
"आ," उसने कहा। "बैठ। मैं चाय बनाती हूँ।"
"बसंती देवी, मेरे पास वक़्त कम है। कल सुबह अदालत में—"
"अदालत?" उसने मेरी तरफ़ देखा। "हरि सिंह की अदालत?"
"हाँ।"
वो चूल्हे के पास बैठ गई और अपनी छड़ी दीवार के सहारे टिका दी।
"मैं तेरे पापा को जानती हूँ," उसने कहा। "वो कभी किसी का बुरा नहीं चाहता था। पर हरि सिंह ने उसे तोड़ दिया। एक रात हवेली में चीखें सुनाई दीं। मैं रसोई में थी। सुबह मैंने देखा — सुखिया का काग़ज़ मेज़ पर पड़ा था और सुखिया ग़ायब था।"
"सुखिया कहाँ गया?"
"मुझे नहीं पता। बस इतना पता है कि उस रात के बाद हरि सिंह ने मुझे हवेली से निकाल दिया। कहा — अब तू यहाँ मत आना।"
मैंने आगे झुककर पूछा। "तुमने उस रात कुछ देखा था?"
बसंती ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से बोली।
"मैंने देखा था — हरि सिंह ने तेरे पापा का हाथ पकड़कर काग़ज़ पर अँगूठा लगवाया था। तेरे पापा रो रहे थे। मैं वहीं खड़ी थी, रोटी बेल रही थी। हरि सिंह ने मेरी तरफ़ देखा और कहा — 'अगर एक शब्द बोला, तो तेरे भाई का पता भूल जाना।' मेरा भाई सुखिया उसी वक़्त से ग़ायब था। बीस साल से मैं चुप हूँ।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा। "कल अदालत में गवाही दोगी?"
उसकी आँखें फिर भर आईं। "बीस साल बाद?"
"बीस साल बाद।"
उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर दीवार पर लगी तस्वीर की तरफ़। तस्वीर में एक जवान आदमी था — सुखिया।
"हाँ," उसने कहा। "जाऊँगी। पर एक बात कहता हूँ — मेरे पास उस रात का कोई काग़ज़ नहीं। सिर्फ़ याद है।"
"याद काफ़ी है।"
मैं उठा। बंसी दरवाज़े पर खड़ा सब सुन रहा था। बसंती ने मुझे रोका।
"एक बात और।" उसने चारपाई के नीचे से एक टिन का छोटा डिब्बा निकाला और खोला। अंदर एक मुड़ा पीला काग़ज़ था। "ये सुखिया ने उस रात मेरी झोली में डाल दिया था। मैंने बीस साल इसे नहीं खोला। इसे तेरे पापा को देना।"
मैंने काग़ज़ लिया। पीला, फटा, मोड़ पर मिट्टी।
"क्या है इसमें?"
"मैंने नहीं पढ़ा।" उसने कहा। "मैं अनपढ़ हूँ। पर सुखिया ने कहा था — इसे सिर्फ़ उस आदमी को देना जो इसका हक़दार हो।"
मैंने काग़ज़ मोड़कर अपनी जेब में रखा। "बसंती देवी, कल सुबह नौ बजे एक गाड़ी आएगी तुम्हें लेने।"
"मैं तैयार रहूँगी।"
गाड़ी में बैठकर मैंने वो पीला काग़ज़ खोला। उसमें एक लाइन थी — टूटी हिंदी में, सुखिया की लिखाई में।
"हरि सिंह ने काग़ज़ पर अँगूठा लिया। मैं गवाह हूँ। पीछे का कुआँ जानता है — वहाँ कुछ गड़ा है जो हरि सिंह को डराता है।"
बंसी ने काग़ज़ पढ़ा और सीटिए बैठ गया। "पीछे का कुआँ…"
"हवेली का कुआँ," मैंने कहा। "जो सीमेंट से बंद है।"
"मन्नू, आज रात हमें कुआँ खोदना है।"
मैंने कुछ देर सोचा। "नहीं। कल सुबह अदालत में हरि सिंह का काग़ज़ आएगा। उससे पहले मुझे कुछ और चाहिए — पापा के पुराने हस्ताक्षर का नमूना।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर हरि सिंह का काग़ज़ ज़बरदस्ती का है, तो उस पर पापा का अँगूठा उस तरह का होगा जैसे कोई खींचकर लगवा रहा हो। और अगर पापा के सही हस्ताक्षर का नमूना मिल जाए, तो फ़र्क़ साफ़ दिखेगा।"
"वो नमूना कहाँ मिलेगा?"
"सुमन से पूछना पड़ेगा। पापा के पुराने रिकॉर्ड अस्पताल के रजिस्टर में हैं।"
बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की। "और वो रजिस्टर?"
"शेखर बाबू की दराज़ में बंद है।"
रात के ग्यारह बज रहे थे जब हम अस्पताल पहुँचे। शेखर बाबू अब भी सुमन के केबिन में थे — कुर्सी पर सिकुड़े हुए, चश्मा नाक पर, हाथ में पुरानी फ़ाइल।
"रजिस्टर?" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "मेरे पास है। पर मन्नू — उस रजिस्टर में तुम्हारे पापा के सिर्फ़ दो बार हस्ताक्षर हैं। एक — जब वो अस्पताल में भर्ती हुए थे, और दूसरा — जब उनकी नौकरी छूटी थी।"
"काफ़ी है।"
शेखर बाबू दराज़ खोलने के लिए झुके। "और सुनो — भवानी का पुराना वकील कल आ रहा है। मुझे राजेंद्र ने बताया।"
"हमें भी पता है।"
"नहीं जानते।" शेखर बाबू ने सिर उठाया। "वो शहर के सबसे महँगे वकील होने वाले हैं। और सबसे ख़तरनाक बात — वो पहले भवानी के ख़िलाफ़ लड़ चुके हैं। उन्हें भवानी के हर कमज़ोर कोने का पता है।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
शेखर बाबू ने रजिस्टर निकाला और पन्ने पलटने लगे। "ये है — अस्पताल की भर्ती का रजिस्टर। पन्ना चालीस। पापा का नाम, उम्र, हस्ताक्षर। और ये — पन्ना अठहत्तर। नौकरी छोड़ने का फ़ॉर्म।"
मैंने दोनों पन्ने ग़ौर से देखे। दोनों में पापा का अँगूठा था, पर दोनों अँगूठे की शक्ल में फ़र्क़ था।
"देखो," मैंने शेखर बाबू को दिखाया। "पन्ना चालीस में अँगूठा सीधा और साफ़ है। पन्ना अठहत्तर में अँगूठा टेढ़ा है, जैसे खींचकर लगाया गया हो।"
शेखर बाबू ने रजिस्टर पास रखकर देखा। "पन्ना अठहत्तर — ये तो वो फ़ॉर्म है जब उन्हें भवानी के होम में जाने से रोका गया था। उस वक़्त वो बहुत कमज़ोर थे। पर हरि सिंह ने कहा — ये अँगूठा उनका ही है।"
"ये नमूना काम आएगा।"
बाहर निकलते वक़्त सुमन बरामदे में खड़ी थीं। "कुछ मिला?"
"पापा के दो अँगूठे," मैंने कहा। "अब कल अदालत में हरि सिंह के काग़ज़ से मिलान करेंगे।"
सुमन ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, एक बात और — बसंती को गवाही के लिए तैयार करना पड़ेगा। बीस साल की चुप्पी टूटेगी तो आवाज़ काँपेगी। अदालत में काँपती आवाज़ कमज़ोरी नहीं दिखनी चाहिए।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno