The Token System – Chapter 1059
मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन हथेली पर रखा। वो अब भी ठंडा था, पर मेरी उँगली उस पर टिकी थी।
“मुझे पापा से मिलना है।” मैंने कहा। “अभी।”
बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की। अदालत के गेट से निकलते वक़्त मैंने पीछे मुड़कर देखा। सक्सेना बरामदे में खड़ी थीं, हाथ में काग़ज़, और उनका चेहरा पहली बार थका हुआ लग रहा था।
रास्ते में बंसी चुप था। फिर बोला, “मन्नू, अगर वो काग़ज़ सच में तेरे पापा के हाथ का है…”
“तो पापा ने झूठ बोला।” मैंने कहा। “पर मुझे यक़ीन है — वो मजबूरी थी। हरि सिंह ने उनसे ज़बरदस्ती लिया था। पापा ने ख़ुद डिबिया में लिखकर रखा है — ‘मैंने सिर्फ़ चुप रहने का सौदा किया।’”
“पर अदालत में काग़ज़ क्या कहेगा?”
“वही जो सच है। और सच ये है कि पापा ने दबाव में लिखा था। हमें वो दबाव साबित करना होगा।”
बंसी ने गाड़ी की रफ़्तार बढ़ाई। “कैसे?”
“पापा से पूछकर।” मैंने कहा। “वो बताएँगे — उस वक़्त कौन मौजूद था, कौन गवाह था, किसने देखा था। और हरि सिंह के पास अगर वो काग़ज़ है, तो उसे लाने वाला भी कोई होगा।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “तू क्या कह रहा है?”
“मैं कह रहा हूँ कि अगर हरि सिंह कल सुबह वो काग़ज़ लाएगा, तो वो काग़ज़ आज रात कहीं रखा हुआ है। और अगर हम उसे पहले ढूँढ लें, तो कल अदालत में हम पहले बोलेंगे।”
बंसी ने कुछ सोचा। “हरि सिंह के पास से कोई काग़ज़ निकालना आसान नहीं। वो अदालत की हिरासत में है। उसके आदमी बाहर हैं।”
“तो हम उसके आदमी से पूछेंगे।”
बंसी ने गाड़ी रोक दी। “मन्नू, तू थक गया है। कल सुबह अदालत है। आज रात हमें सिर्फ़ एक काम करना चाहिए — पापा से बात। और सबसे ज़रूरी — सो जाना।”
“सोना?”
“हाँ।” बंसी ने कहा। “तेरे हाथ काँप रहे हैं और तेरी आँखें लाल हैं। अगर तू कल अदालत में ऐसा ही खड़ा रहा, तो हरि सिंह का वकील तुझे एक मिनट में उलझा देगा।”
मैंने अपने हाथ देखे। सच में काँप रहे थे।
“ठीक है।” मैंने कहा। “पहले पापा। फिर घर।”
अस्पताल पहुँचे तो सुमन वार्ड के बाहर खड़ी थीं। उन्होंने मुझे देखा और हाथ पकड़कर अलग ले गईं।
“पापा जाग रहे हैं।” उन्होंने कहा। “पर कमज़ोर हैं। ज़्यादा मत पूछना।”
“सुमन, एक बात।”
“क्या?”
“पापा के हाथ की लिखाई उन्होंने कहीं काग़ज़ पर लिखी थी — ‘मैंने अपना हिस्सा बेच दिया’ — क्या तुमने कभी सुना है?”
सुमन का चेहरा बदल गया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और फिर पीछे मुड़कर वार्ड के दरवाज़े की तरफ़।
“कहाँ सुना?”
“हरि सिंह के पास वो काग़ज़ है। उसने अदालत को बताया है।”
सुमन की आँखें सिकुड़ीं। “अगर वो काग़ज़ सच में तेरे पापा के हाथ का है, तो हमें उसके हाथ की लिखाई का नमूना चाहिए। कोई पुराना काग़ज़, जिस पर उसने ख़ुद लिखा हो।”
“घर में पापा की डायरी है। और उनके हस्ताक्षर वाले काग़ज़।”
“तो जल्दी से ले आओ।” सुमन ने कहा। “हरि सिंह का वकील कल इसी बात पर खेलेगा — कि हमारे पास लिखाई का नमूना नहीं। अगर हम काग़ज़ की तुलना कर सकें, तो साबित कर सकते हैं कि वो काग़ज़ ज़बरदस्ती लिखवाया गया था या नहीं।”
मैंने सिर हिलाया। “मैं अभी जाता हूँ।”
“और मन्नू,” सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा, “पापा से ज़्यादा मत पूछना। वो बहुत कमज़ोर हैं।”
“पर सवाल यही है — उनसे क्या पूछूँ?”
“वो बताएँगे।” सुमन ने कहा। “उन्होंने अभी-अभी ‘तीसरा पन्ना’ कहा था। अब ‘काग़ज़’ कह रहे हैं। उनके अंदर की बात बाहर आ रही है।”
मैं वार्ड में गया। पापा बिस्तर पर लेटे थे। सफ़ेद चादर उनके शरीर पर ढीली पड़ रही थी। उनकी आँखें खुली थीं, छत की तरफ़ देख रही थीं। मैंने कुर्सी खींची और पास बैठ गया।
“पापा।”
उन्होंने सिर घुमाया। “आ गया?”
“हाँ। एक बात पूछनी है।”
“पूछ।”
“हरि सिंह के पास एक काग़ज़ है। जिस पर आपके हाथ की लिखाई में लिखा है — ‘मैंने अपना हिस्सा बेच दिया।’”
पापा बिस्तर में हिल गए। उन्होंने आँखें बंद कीं, फिर खोलीं।
“वो काग़ज़ था।” उन्होंने कहा, धीमी आवाज़ में। “हरि सिंह ने मुझसे ज़बरदस्ती लिखवाया था।”
“कब?”
“बीस साल पहले। उस रात के बाद जब मुझे लगा कि मैं हवेली दरवाज़ा खोलकर देखूँगा और कोई मुझे मार देगा। उसने काग़ज़ लिखवाया, मेरा अँगूठा लिया, और कहा — ‘अब तू चुप, वरना तेरी बहन को उठा लेंगे।’”
“तो वो काग़ज़ झूठा है।”
“वो काग़ज़ उसने मुझसे लिखवाया।” पापा ने कहा। “मेरे हाथ का था, पर मेरा मन नहीं था। पर अदालत में ये साबित करना मुश्किल होगा, बेटा।”
“तब कोई गवाह था?”
पापा ने छत की तरफ़ देखा। “एक था। एक बूढ़ा आदमी — सुखिया। वो उस वक़्त हवेली में रहता था। उसने देखा था, जब हरि सिंह ने मेरा हाथ पकड़कर काग़ज़ पर अँगूठा लगवाया।”
“सुखिया?”
“वो बीस साल पहले मरा बताया गया था। पर मुझे नहीं लगता।” पापा ने आँखें बंद कीं। “मुझे नहीं लगता वो मरा।”
मैं कुछ देर वहीं बैठा रहा। पापा की साँस धीमी थी। मैंने उनका हाथ थामा। उन्होंने आँखें खोलीं और मुश्किल से मुस्कुराए।
“जा।” उन्होंने कहा। “काग़ज़ सम्भाल।”
मैं वार्ड से बाहर आया। बरामदे में सुमन खड़ी थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“क्या बोले?”
“एक गवाह था — सुखिया।”
सुमन ने कुछ सोचा। “सुखिया। वो नाम…”
“क्या?”
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। “कुछ दिन पहले बंद बसवा के रजिस्टर में एक नाम मिला था — सुखिया। पर वो मरी हुई थी। मैंने सोचा था — पुराना नाम होगा।”
“तो चलो।” मैंने कहा।
“कहाँ?”
“पापा से पूछकर — सुखिया कहाँ रहता था।”
मैं वापस पापा के पास गया। “पापा, सुखिया कहाँ रहता था?”
पापा की आँखें फिर खुलीं। “हवेली के पीछे, पीपल के नीचे, एक छोटा घर था। उसकी एक बहन थी — बसंती। मुझे याद है, सुखिया मुझसे कहता था — ‘अगर मुझे कुछ हो जाए, तो बसंती के पास जाना।’”
“बसंती कहाँ है?”
“पता नहीं।” पापा ने कहा। “पर मुझे लगता है — वो हवेली की रसोई में काम करती थी।”
मैं बाहर आया। बंसी से सब कहा। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
“मन्नू, आज रात सिर्फ़ एक काम करना है — बसंती को ढूँढना। अगर वो ज़िंदा है, तो कल अदालत में हमारे पास गवाह होगा।”
“और अगर नहीं मिली?”
“तो कल हम अदालत में सिर्फ़ वही कहेंगे जो सच है — और भगवान भरोसा।”
मैंने टोकन फिर जेब से निकाला। उसे हथेली पर रखा। अबकी बार वो गरम था। और उस पर एक शब्द उभरा, जो अभी तक नहीं आया था:
“बसंती।”
मैंने टोकन वापस जेब में रखा। “बंसी, गाड़ी चालू कर।”
बंसी हँसा। “क्या बात है?”
“टोकन बोल रहा है।”
हम गाड़ी की तरफ़ चले। बाहर सड़क पर लालटेनें जल रही थीं और किसी की हँसी ज़ोर से आ रही थी। मैंने पीछे मुड़कर अस्पताल की खिड़की देखी। पापा के कमरे में रोशनी थी। मुझे लगा — जैसे वो खड़े होकर मेरी तरफ़ देख रहे हों।
बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की और हम रामगंज की तरफ़ बढ़ गए। रास्ते में मैंने सोचा — कल सुबह अदालत में जो काग़ज़ हरि सिंह लाएगा, वो शायद सिर्फ़ एक काग़ज़ नहीं होगा। वो पापा की चुप्पी का दस्तावेज़ होगा। और उसे ज़बरदस्ती का साबित करने के लिए हमें वो बूढ़ी औरत चाहिए, जो आज तक शायद उस रात को भूली नहीं।
गाड़ी ने मोड़ लिया। बसंती का पता अभी भी मेरे दिमाग़ में घूम रहा था — हवेली की रसोई। जहाँ सब शुरू हुआ था।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno