The Token System – Chapter 1058
मैंने अपनी जेब को थपथपाया। “सब। और सबसे ऊपर — सच।”
बंसी ने सिर हिलाया। दोनों ने कदम बढ़ाए। राजेंद्र पीछे रुका और बोला, “मैं थाने चलता हूँ। रात में सबको सतर्क कर देता हूँ।”
“कर दे।” मैंने कहा। “और राजेंद्र, अगर रात में कोई भी घर के बाहर निकले, मुझे ख़बर कर।”
“समझ गया।”
गाड़ी की तरफ़ चलते हुए मेरी उँगली जेब में डिबिया पर थी। उसका ढक्कन अब भी चिपका था, जैसे कह रहा हो — वक़्त आया तो खुलूँगा।
मैंने पीछे मुड़कर अस्पताल की खिड़की देखी। पापा अब भी वहीं खड़े थे, हाथ सीधा मेरी तरफ़। जैसे कह रहे हों — अब तेरी बारी।
बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की। हेडलाइट जली। रात अभी लंबी थी, पर सुबह का पहला किनारा दूर नहीं था।
॥
गाड़ी अस्पताल के गेट से निकली और बंसी ने सीधा हवेली की तरफ़ मोड़ लिया। पर मेरा हाथ गाड़ी के दरवाज़े पर था और मैंने उसे रोक दिया।
“रुक। अदालत।”
बंसी ने ब्रेक मारे। “अदालत? इस वक़्त?”
“सक्सेना को पन्ना दिखाना है। और जज साहब शाम तक बैठते हैं। अगर ये पन्ना सुबह तक मेरी जेब में रहा और कुछ हो गया, तो सब ख़त्म।”
बंसी ने गाड़ी पलट दी। रास्ते में मैंने वो पन्ना दोबारा पढ़ा। काग़ज़ पुराना था, किनारे से फटा, पर स्याही अब भी काली थी। ऊपर लिखा था — हवेली का आधा हिस्सा सुखदेव माली का, आधा तीन बहनों का। और नीचे, एक अलग लिखाई में, जो सुखदेव की नहीं थी:
“हरि सिंह का बाप हिसाब में हेरफेर करता था, इसलिए उसका नाम इस काग़ज़ से हटाया गया। जो इसे पढ़े, वो इसका हिसाब रखे।”
मैंने बंसी को सुनाया। बंसी ने गाड़ी की स्पीड बढ़ाई। “तो मतलब हवेली का मालिक कोई एक नहीं था। दादा और तीन बहनें। और भवानी के बाप को काग़ज़ से ही काट दिया गया।”
“और भवानी अब तक ख़ुद को मालिक समझ रहा था।”
अदालत पहुँचे तो शाम के चार बज चुके थे। आँगन खाली था, पर जज साहब का कमरा खुला था। सक्सेना बरामदे में खड़ी थीं, हाथ में फ़ाइल।
“मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी।” उन्होंने कहा। “जज साहब ने कहा है — आज ही। कुछ देर और, फिर वो घर चले जाएँगे।”
“पन्ना मिल गया।” मैंने कहा।
सक्सेना ने मेरी तरफ़ देखा। “कहाँ से?”
“पापा ने रिकॉर्ड कमरे के दराज़ के नीचे छिपाया था। बीस साल।”
सक्सेना ने पन्ना लिया। उँगली से किनारा छुआ। फिर उन्होंने आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई पुरानी बात याद आ गई हो।
“ये काग़ज़ अदालत में जाना चाहिए।” उन्होंने कहा। “अभी।”
हम अंदर गए। जज साहब कुर्सी पर बैठे थे, चश्मा उतारकर मेज़ पर रख रहे थे। उन्होंने हमें देखा और बिना कुछ पूछे कहा, “बैठो।”
सक्सेना ने पन्ना उनके सामने रखा। “माई लॉर्ड, ये काग़ज़ आज मिला है। वसीयत के आख़िरी पन्ने से जुड़ता है।”
जज साहब ने पन्ना उठाया। धीरे-धीरे पढ़ा। बीच में एक बार रुके, चश्मा फिर पहना, और फिर पढ़ा। जब पूरा पढ़ लिया तो पन्ना मेज़ पर रख दिया और पीछे टेक लगाकर बैठ गए।
“तुम जानते हो इसमें क्या लिखा है?” उन्होंने मुझसे पूछा।
“जितना पढ़ पाया।”
“इसमें लिखा है कि हवेली आधी सुखदेव माली की है — यानी तुम्हारे दादा की, और आधी तीन बहनों की — कौशल्या, जमुना और कम्मो की। और जो चौथा नाम था, उसे जान-बूझकर हटाया गया है, क्योंकि उस आदमी ने हिसाब में हेरफेर की थी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सक्सेना ने कुर्सी पकड़ ली। बंसी दरवाज़े के पास खड़ा था और उसने सिर झुका लिया, जैसे किसी पुराने ज़ख़्म पर पट्टी बँध गई हो।
जज साहब ने आगे कहा, “यानी जिस हवेली पर आज सुनवाई चल रही है, वो किसी एक की नहीं थी। उसका हिसाब चार हाथों में बँटा था। और अदालत ने अब तक भवानी सिंह को एक ही मालिक मानकर काग़ज़ लिए थे।”
वो रुके। मेरी तरफ़ देखा।
“तुम्हारे पास कुछ और है?”
मैंने जेब से पीतल की डिबिया निकाली — वही जिसे मैंने अभी तक नहीं खोला था। ढक्कन अब भी चिपका था। मैंने ज़ोर लगाया, नाखून से किनारा उठाया। ढक्कन खुला। अंदर एक तह काग़ज़ था, मुड़ा हुआ, और उस पर दो लाइनें, बहुत छोटी लिखाई में:
“मैंने हिस्सा नहीं बेचा। मैंने सिर्फ़ चुप रहने का सौदा किया था। — किशनचंद”
मैंने वो काग़ज़ जज साहब को दिया। उन्होंने पढ़ा और सक्सेना की तरफ़ बढ़ा दिया।
“ये अलग मामला है।” सक्सेना ने कहा। “पर इससे साफ़ होता है कि किशनचंद ने हिस्सा बेचा नहीं था।”
जज साहब ने काग़ज़ मेज़ पर रखे और कुर्सी पीछे सरकाई।
“अदालत का हुक्म है,” वो बोले, “कि हवेली और उसकी ज़मीन पर अदालत की मोहर लगेगी। नीलामी रद्द। और हरि सिंह के सारे काग़ज़ों की जाँच होगी — हर एक काग़ज़, जो उसने पिछले बीस साल में जमा किया। साथ ही, ये नया काग़ज़ अदालत के रिकॉर्ड में दर्ज होगा।”
वो उठे। “कल सुबह दस बजे। तब तक कोई कुछ नहीं छुएगा।”
हम बाहर आए। सूरज ढल रहा था और बरामदे की छत पर कबूतर बैठे थे। मैंने जेब से टोकन निकाला। उसे हथेली पर रखा। ठंडा था, एकदम ठंडा। और उस पर एक नई लकीर उभर आई थी — “इक्कीस” नहीं, बाईसवीं के ऊपर, तेईसवीं। यानी हिसाब आगे बढ़ गया था।
मैंने टोकन वापस रखा। बंसी मेरे पास आया, हँसते हुए।
“तेरी बहन का फ़ोन आया था।” उसने कहा। “कह रही है शादी की तारीख़ तय हो गई। और वो चाहती है कि तू ही लिफ़ाफ़ा दे।”
मैं मुस्कुराया। कुछ दिनों में पहली बार मेरे अंदर कुछ हल्का हुआ, जैसे सीने पर से कोई पत्थर हटा हो।
“तारीख़ क्या कह रही है?”
“अगले रविवार।” बंसी ने कहा। “कह रही है — मंडप में तेरे बिना कोई नहीं बैठेगा।”
“तो बैठना पड़ेगा।”
हम हँस रहे थे कि सक्सेना दौड़कर आईं। उनकी साँस फूली हुई थी, हाथ में काग़ज़ था। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा।
“मन्नू। हरि सिंह ने अदालत में एक आख़िरी बयान दिया है।”
“क्या बयान?”
“वो चाहता है कि अगली सुनवाई में उसका वकील वो काग़ज़ पेश करे जो उसने बीस साल पहले किशनचंद से ज़बरदस्ती लिया था।”
मेरा हाथ रुक गया। “कौन सा काग़ज़?”
सक्सेना ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। “ये उसकी लिखी पर्ची है। इसमें काग़ज़ का ज़िक्र है — वो काग़ज़ जिस पर तेरे पापा ने अपने हाथ से लिखा है — ‘मैंने अपना हिस्सा बेच दिया।’”
बंसी की हँसी बंद हो गई।
मैंने सक्सेना की तरफ़ देखा। “पर पापा ने तो अभी कहा — उन्होंने हिस्सा नहीं बेचा। उन्होंने चुप रहने का सौदा किया। ये डिबिया का काग़ज़ कह रहा है।”
“तभी तो हरि सिंह इसे अदालत में लाना चाहता है।” सक्सेना ने कहा। “अगर वो काग़ज़ असली है, तो तेरे पापा का ये काग़ज़ झूठा साबित होगा। और अगर वो झूठा साबित हुआ, तो कल का हुक्म भी हिल जाएगा।”
मेरे हाथ से चाय का गिलास छूट गया। गिलास ज़मीन पर गिरा और टूट गया। चाय बरामदे के फ़र्श पर फैल गई। बंसी ने झुककर टुकड़े उठाए, पर मैं वहीं खड़ा रहा।
क्योंकि अगर वो काग़ज़ असली है — जिस पर पापा ने अपने हाथ से लिखा हो कि उन्होंने हिस्सा बेच दिया — तो सारा हिसाब उलट जाएगा। जो हिस्सा पापा का कहा जा रहा था, वो पापा का ही नहीं रहेगा।
मैंने सक्सेना की तरफ़ देखा। “वो काग़ज़ कहाँ है?”
“हरि सिंह के पास। उसने कहा है — कल सुबह दस बजे वो ख़ुद लाएगा।”
“और अगर वो न लाए?”
“तो अदालत मान लेगी कि काग़ज़ है।”
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