The Token System – Chapter 1057
“क्या मतलब?”
“मतलब ये कि वो हमें जानने को बुला रहा है।” मैंने कहा। “और अगर बाबा हवेली की वसीयत से जुड़ा है, तो हो सकता है वो वसीयत का आख़िरी रखवाला हो।”
बंसी ने गाड़ी रोक दी। “मन्नू। ये दिन ख़त्म हो रहा है। कल सुबह अदालत है। हमें कुछ ठहरना चाहिए।”
“ठहरना?” मैंने कहा। “बंसी, हम बीस साल की रेस में आख़िरी मोड़ पर हैं। तुझे ठहरना अच्छा लग रहा है?”
“ना।” उसने कहा। “मुझे तेरा चेहरा अच्छा नहीं लग रहा। वो हँस रहा है।”
मैंने शीशे में अपना चेहरा देखा। सच कहूँ तो मुझे भी हँसी आ रही थी — थकान की, डर की, और उस उम्मीद की जो अब आँखों में जम गई थी।
“एक काम कर।” मैंने कहा। “सुबह अदालत से पहले, हमें जज साहब से कहना होगा कि वसीयत का आख़िरी पन्ना मिल गया है। बिना उनकी जानकारी कुछ नहीं होगा।”
“और टोकन का शब्द?”
“वो बाद में।” मैंने कहा। “पहले वसीयत। फिर बाबा।”
गाड़ी फिर चली। रास्ते में सुमन का फ़ोन आया। मैंने उठाया।
“मन्नू।” उसकी आवाज़ में एक अजीब सी फुर्ती थी। “पापा ने अभी एक बात कही। दो बार। बस दो शब्द।”
“क्या?”
“वो बोले — ‘तीसरा पन्ना।’ और फिर सो गए।”
मैंने बंसी को देखा। बंसी ने मेरी आँखें पढ़ीं, और उसका हाथ स्टीयरिंग पर कस गया।
“मन्नू।” बंसी ने कहा। “क्या सोच रहा है?”
“वसीयत के तीन पन्ने थे।” मैंने कहा। “एक दादा ने छिपाया — वो मिल गया। दूसरा पापा के पास। और तीसरा — तीसरे पन्ने का ज़िक्र पापा ने खुद किया।”
“यानी तीनों का कोई मतलब है।”
“तीसरा पन्ना।” मैंने दोहराया। “पापा ने सोते हुए कहा। जिसने बीस साल बोला नहीं, वो नींद में बोल रहा है।”
मैंने पीछे मुड़कर देखा। अदालत की तरफ़ जाती सड़क खाली थी।
“कल सुबह।” मैंने कहा। “अदालत से पहले, मुझे पापा ये बात खुद बतानी है।”
“और अगर नहीं बताया?”
“तो मैं उसे वो काग़ज़ दिखाकर पूछूँगा।” मैंने कहा। “क्योंकि अब कोई काग़ज़ छिपाने का वक़्त नहीं है।”
अस्पताल का गेट पास आया। मैंने टोकन जेब में रखा। उँगली अब भी उस पूरे हो चुके शब्द पर थी।
“बाबा।” मैंने अपने आप से कहा। “अब तू कौन है?”
पर जवाब देने वाला कोई नहीं था। बस टोकन था, ठंडा पड़ा, जैसे अगले सवाल का इंतज़ार कर रहा हो।
बंसी ने गाड़ी अस्पताल के गेट पर रोकी। हम उतरे। सुमन सीढ़ियों पर खड़ी थी, और उसके पीछे गलियारे में राजेंद्र आ रहा था, हाथ में एक काग़ज़ लिए।
“मन्नू!” राजेंद्र ने दूर से आवाज़ दी। “एक ख़बर है।”
“अभी नहीं, राजेंद्र।” मैंने कहा। “पहले पापा।”
“ये ख़बर भी पापा की ही है।” वो पास आया। “हरि सिंह ने कुछ देर पहले हिरासत में एक बात कही है। उसने कहा — ‘अगर मन्नू वसीयत का पहला पन्ना लेकर आया है, तो उसे बता देना कि तीसरा पन्ना उसके सामने रखा है। और वो हमेशा से उसके सामने था।’”
मैं उसे देखता रह गया।
“क्या मतलब?” बंसी ने कहा।
“मतलब—” मैंने धीरे से शुरू किया।
राजेंद्र ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। “ये भी उसने भिजवाया है।”
मैंने काग़ज़ पढ़ा। छोटी सी पर्ची थी, और उस पर सिर्फ़ एक लाइन:
“तीसरा पन्ना वो है जो तू रोज़ देखता है — खेत्री की पहाड़ी पर, जले मंदिर के पीछे, पुराने पीपल के नीचे।”
मैंने पर्ची मोड़कर जेब में रखी। सुमन ने मेरी तरफ़ देखा।
“अब क्या?” उसने पूछा।
“अब मैं पहले पापा से मिलूँगा।” मैंने कहा। “फिर खेत्री।”
“अभी रात में?”
“अभी।” मैंने कहा। “क्योंकि अब सुबह का इंतज़ार करने का वक़्त नहीं है।”
मैं सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। पीछे बंसी और राजेंद्र थे। और ऊपर वार्ड की खिड़की से रोशनी आ रही थी, जो मुझे बुला रही थी।
दरवाज़े पर पहुँचकर मैं रुका। सुमन साथ थी। मैंने उससे कहा, “अंदर सिर्फ़ मैं जाऊँगा।”
“ठीक है।”
मैंने दरवाज़ा खोला। पापा की आँखें खुली थीं। वो छत को देख रहे थे।
“पापा।” मैंने कहा।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में पहले आँसू आया — फिर उसके पीछे कुछ और।
“मन्नू।” उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा। “तूने वो काग़ज़ पढ़ लिया, ना?”
“हाँ।”
“और तू अब तीसरे पन्ने की बात करने आया है।”
मैं हक्का-बक्का रह गया।
“तुझे कैसे पता?”
“क्योंकि मैं इंतज़ार कर रहा था।” उन्होंने कहा। “बीस साल से। तीसरा पन्ना हवेली की उस दीवार में नहीं है — वो पहाड़ी पर है। और वहाँ जाने से पहले मुझे तुझे एक बात बतानी है।”
“क्या?”
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी पकड़ कमज़ोर थी, पर उँगलियाँ कसी हुई थीं।
“वहाँ जो तुझे मिलेगा,” उन्होंने कहा, “वो वसीयत का पन्ना नहीं है।”
“तो क्या है?”
“वो असली टोकन है।” उन्होंने कहा। “जो हवेली की नींव में हमेशा से था, और जो अब जाग चुका है।”
मैंने पीछे हटकर देखा। मेरी जेब में टोकन था। मैंने उसे छुआ। हल्का गरम।
“अगर मेरे पास टोकन है,” मैंने कहा, “तो असली टोकन क्या है?”
पापा ने आँखें बंद कर लीं। “पहाड़ी पर जो है, वो टोकन नहीं — वो हवेली का पहला पत्थर है। और उसका नाम लिखने वाला आख़िरी हिसाब लिखेगा।”
मैं कुछ कहने ही वाला था कि खिड़की के बाहर कुछ चमका। मैंने देखा — अस्पताल की पार्किंग में एक सफ़ेद गाड़ी रुकी थी। और उसके बोनट पर कुछ रखा था।
मैंने पापा का हाथ छोड़ा। “पापा, एक मिनट।”
मैं खिड़की के पास गया। सफ़ेद गाड़ी के बोनट पर एक लालटेन जल रही थी। और उस लालटेन के पीछे, गाड़ी की छत पर, एक काग़ज़ चिपका था।
“बंसी!” मैंने आवाज़ दी। “नीचे कोई है!”
बंसी भागकर खिड़की के पास आया। “कौन?”
“सफ़ेद गाड़ी।”
बंसी ने नीचे देखा और फिर मेरी तरफ़। “वो रुकी नहीं, भाग रही है।”
मैंने देखा — गाड़ी अब गेट की तरफ़ भाग रही थी, और उसके पीछे से कुछ उड़ रहा था — काग़ज़। एक, दो… पाँच।
“वो काग़ज़ गिरा रही है।” मैंने कहा। “राजेंद्र!”
राजेंद्र नीचे भागा। मैंने पापा की तरफ़ पलटकर देखा।
“जा।” उन्होंने कहा। “मैं यहीं हूँ।”
मैं भागा। सीढ़ियाँ दो-दो करके उतरा। बाहर पहुँचा तो राजेंद्र ज़मीन से काग़ज़ उठा रहा था। पाँच काग़ज़ थे। हवा उन्हें इधर-उधर कर रही थी।
“दे।” मैंने कहा।
राजेंद्र ने दिए। मैंने उन्हें एक साथ किया।
पहला काग़ज़ — सफ़ेद, खाली।
दूसरा — खाली।
तीसरा — उस पर एक तारीख़ थी, पर कोई अक्षर नहीं।
चौथा — उस पर एक ही लाइन थी: “चल।”
और पाँचवाँ — सबसे नीचे वाला — उस पर पूरा वाक्य था:
“कल सुबह जो जीतेगा, उसका नाम हवेली की दीवार पर लिखा जाएगा। और जो हारेगा, उसका खाता हमेशा के लिए बंद।”
मैंने पाँचों काग़ज़ अपनी जेब में रखे। मुझे पता था — ये धमकी नहीं थी। ये ऐलान था।
बंसी मेरे पास आया। “अब?”
मैंने ऊपर देखा। अस्पताल की खिड़की पर पापा की परछाईं दिख रही थी।
मैंने टोकन जेब से निकाला। उसे हथेली पर रखा। और उँगली से छुआ।
टोकन गरम हुआ। और उस पर एक नई लकीर उभरी — बाईसवीं। और उसके नीचे एक शब्द:
“सुबह।”
मैंने टोकन वापस जेब में रखा। बंसी की तरफ़ देखा।
“अब सुबह तक का सब्र नहीं है।” मैंने कहा। “चलती है गाड़ी?”
“चलती है।” बंसी ने कहा। “पर एक बात कहूँ?”
“कह।”
“तेरी जेब में अब तीन काग़ज़ हैं — वसीयत का पन्ना, धमकी वाली पाँच पर्चियाँ, और एक डिबिया जिसे तूने अभी खोला भी नहीं। सुबह अदालत में तू क्या लेकर जाएगा?”
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