The Token System – Chapter 1061
"मैं सुबह जल्दी जाऊँगा।"
रात में मैं घर पहुँचा तो माँ चूल्हे के पास बैठी थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं पूछा। बस एक गिलास पानी बढ़ाया।
"कल अदालत है," मैंने कहा।
"जानती हूँ," माँ ने कहा। "तेरे पापा बता रहे थे।"
"तुमने उनसे बात की?"
"फ़ोन पर।" माँ ने अपना आँचल ठीक किया। "उन्होंने कहा — बसंती मिल गई तो उससे कहना, किशनचंद उसका कर्ज़दार है।"
मैं चारपाई पर बैठ गया। माँ ने चाय का गिलास मेरे आगे रखा।
"मन्नू," माँ ने धीरे से कहा। "कल अदालत में जब हरि सिंह का काग़ज़ आएगा, तो वो काग़ज़ देखकर मत घबराना। वो काग़ज़ बीस साल पुराना है, पर उस पर ताज़ी स्याही का असर भी होगा।"
"क्या मतलब?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "क्योंकि हरि सिंह का आदमी कल सुबह जल्दी आएगा। और वो काग़ज़ जो लाएगा — वो असली नहीं, नक़ल होगी। असली काग़ज़ हरि सिंह ने कहीं और छिपाया है।"
मेरा गिलास हाथ से छूटते-छूटते बचा। "तुम्हें कैसे पता?"
माँ ने अपने आँचल से गिलास पकड़ा। "क्योंकि बीस साल पहले जब पापा ने काग़ज़ लिखा था, तो उसकी एक कॉपी मैंने बनाकर छिपा दी थी।"
माँ उठकर बंद कमरे की तरफ़ गईं और दरवाज़ा खोला। अंदर अँधेरा था। वो पलंग के नीचे से एक लोहे का छोटा डिब्बा निकाल लाईं और मेरे आगे रख दिया।
"ये क्या है?"
"खोल।"
मैंने डिब्बा खोला। अंदर एक पीला काग़ज़ था — एक ही लाइन, पर पापा की साफ़ लिखाई में।
"मैंने अपना हिस्सा नहीं बेचा। मैंने चुप्पी का सौदा किया। — किशनचंद।"
कोई अँगूठा नहीं था। कोई मुहर नहीं थी। सिर्फ़ पापा की लिखाई।
"ये काग़ज़ अदालत में काम आएगा?" मैंने पूछा।
"ये काग़ज़ साबित करेगा कि पापा लिख सकते थे," माँ ने कहा। "और अगर वो लिख सकते थे, तो जो काग़ज़ पर सिर्फ़ अँगूठा है — वो ज़बरदस्ती का है।"
मैंने डिब्बा अपनी जेब में रखा। माँ वापस चूल्हे के पास बैठ गईं।
"माँ," मैंने कहा। "तुमने ये काग़ज़ बीस साल क्यों छिपाया?"
माँ कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं। "क्योंकि अगर हरि सिंह को पता चल जाता कि मैंने कॉपी बनाई है, तो वो तुम्हें उठा ले जाता। बीस साल मैंने इस डिब्बे को अपने पलंग के नीचे रखा और किसी को नहीं बताया — तेरे पापा को भी नहीं।"
"पापा को भी नहीं?"
"पापा को भी नहीं।" माँ ने चूल्हे की आग देखी। "अब जा। सुबह के लिए तैयार हो।"
सुबह आठ बजे मैं बसंती के घर पहुँचा। वो तैयार बैठी थी — सफ़ेद साड़ी, बाल कंघी किए, चेहरे पर थोड़ी लाली। उसके हाथ में एक छोटा थैला था।
"ये क्या है?"
"सुखिया की मुंडी," उसने कहा। "मैंने बीस साल इसकी पूजा की। लगा — उसकी आत्मा को शांति मिलेगी जब सच बोलूँगी।"
मैंने गाड़ी का दरवाज़ा खोला। बसंती बैठी।
गाड़ी अदालत की तरफ़ बढ़ी। रास्ते में बसंती ने मेरी तरफ़ देखा।
"मन्नू," उसने कहा। "मैं अदालत में क्या बोलूँगी, वो मुझे आता है। पर एक बात है — मैं जब उस रात को याद करती हूँ, तो मुझे कुछ और भी याद आता है।"
"क्या?"
"हरि सिंह के साथ उस रात एक और आदमी था। छोटे कद का, मोटा। उसने काग़ज़ पकड़ा था जब तेरे पापा का हाथ दबाया जा रहा था।"
"कौन?"
"मैं नाम नहीं जानती।" बसंती ने कहा। "पर उस आदमी के हाथ पर एक निशान था — गोल, टोकन जैसा।"
मेरा हाथ अपनी जेब की तरफ़ गया।
नौ बजकर पाँच मिनट पर हम अदालत पहुँचे। बरामदे में भीड़ थी — पुलिस, अख़बार वाले, भवानी के आदमी। भवानी ख़ुद एक कोने में बैठा था, हाथ जोड़े, आँखें बंद। मैंने उसे देखा और अंदर चला गया।
दस बजे जज साहब आए। कमरे में ख़ामोशी फैल गई।
सक्सेना खड़ी हुईं। "जज साहब, मेरे पास हवेली की असली वसीयत का आख़िरी पन्ना है, जो कल अदालत में दर्ज हुआ। साथ ही पीतल की डिबिया से निकली किशनचंद की पर्ची और सुखिया का छोड़ा काग़ज़।"
जज साहब ने सभी काग़ज़ अपने सामने रखे और एक-एक कर पढ़े। जब सुखिया वाला काग़ज़ पढ़ा, तो रुक गए।
"ये काग़ज़ कहाँ से आया?" उन्होंने पूछा।
"जज साहब," सक्सेना ने कहा, "ये बसंती नाम की औरत ने दिया है, जो हवेली की रसोई में बीस साल काम करती थी।"
जज साहब ने सिर हिलाया और काग़ज़ अपने पास रख लिया।
फिर हरि सिंह का वकील खड़ा हुआ। लंबा, गोरा, महँगी घड़ी। उसने सक्सेना की तरफ़ देखा।
"जज साहब, मेरा कहना है कि ये सारे काग़ज़ जाली हैं। सक्सेना ने जज साहब को गुमराह किया है। हवेली पर मेरे मुवक्किल का हक़ है और उसके पास किशनचंद के हस्ताक्षर वाला काग़ज़ है जिस पर साफ़ लिखा है — मैंने अपना हिस्सा बेच दिया।"
जज साहब ने उसकी तरफ़ देखा। "वो काग़ज़ अदालत में पेश करो।"
वकील ने अपने ब्रीफ़केस से एक लिफ़ाफ़ा निकाला और अदालत के मुंशी को दिया। जज साहब ने खोला, पढ़ा और सक्सेना की तरफ़ बढ़ा दिया।
सक्सेना ने पढ़ा और मेरी तरफ़ देखा। "जज साहब, ये काग़ज़ पर सिर्फ़ अँगूठा है। हस्ताक्षर नहीं।"
"अँगूठा ही हस्ताक्षर है," वकील ने कहा।
"पर जज साहब," सक्सेना ने कहा, "मेरे पास सबूत है कि किशनचंद लिख सकते थे।"
उसने माँ का दिया काग़ज़ जज को दिया। जज साहब ने पढ़ा।
"ये किशनचंद की लिखाई में है?"
"हाँ जज साहब। और मेरे पास अस्पताल का रजिस्टर भी है — पन्ना चालीस, जिस पर उनका साफ़ अँगूठा है।"
जज साहब ने दोनों अँगूठे — पन्ना चालीस और हरि सिंह के काग़ज़ वाला — पास-पास रखे और कुछ देर देखते रहे।
"ये दोनों अँगूठे एक आदमी के नहीं हो सकते," उन्होंने धीरे से कहा।
वकील ने कुछ कहना चाहा, पर जज साहब ने हाथ उठाया।
"अदालत सारे काग़ज़ अपने कब्ज़े में लेती है। सुनवाई कल सुबह दस बजे फिर होगी।"
वकील कुछ बड़बड़ाया और बैठ गया। हरि सिंह का चेहरा सफ़ेद था। वो अपनी कुर्सी पर पसर गया था।
बाहर बरामदे में भीड़ कम नहीं हुई थी। मैं सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा ही था कि भवानी मेरे सामने आ गया। उसकी आँखों में कोई ग़ुस्सा नहीं था — बस थकान।
"मनोहर," उसने धीरे से कहा। "मैंने अपने हिसाब का पहला हिस्सा आज चुका दिया।"
मैं रुक गया। "क्या मतलब?"
"हरि सिंह को मैंने ही पकड़वाया था।" भवानी ने कहा। "मेरा हिसाब तीन हिस्सों में था। पहला — हरि सिंह। वो ख़त्म। अब दो बाकी हैं।"
"तीन हिस्से कहाँ से आ गए?"
भवानी मुस्कुराया। वो मुस्कुराहट ठंडी थी, जैसे किसी पुराने दर्द को ढक रही हो। "मेरे बाप ने जब हवेली हड़पी, तो उसने तीन लोगों के हिस्से लिए थे — सुखदेव, रामदीन और उस औरत का जिसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं। उसने तीनों को धोखा दिया। और जब मैं बड़ा हुआ, तो उसने मुझसे कहा — 'बेटा, तीनों का हिसाब चुकाना तेरा काम है।' मैंने हरि सिंह से शुरुआत की।"
"तू हिसाब चुका रहा है?"
"मैं हिसाब का मालिक नहीं हूँ," भवानी ने कहा। "मैं सिर्फ़ उसका पहरेदार हूँ।" वो मुड़ा और सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा।
बंसी ने मेरी बाँह पकड़ी और खींचकर अलग ले गया। "भवानी हार नहीं मानेगा। वो नया वकील लाएगा। सबको झूठा साबित करेगा।"
"उसका वकील पहले से आ गया है," मैंने कहा।
"पर वो आज हार गया," बंसी ने कहा। "और जो आदमी एक बार हारता है, वो दूसरी बार ज़्यादा ख़तरनाक होता है।"
शाम को मैं सुमन के केबिन में था। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"अदालत में क्या हुआ?"
"जज ने सारे काग़ज़ अपने कब्ज़े में ले लिए।"
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