The Token System – Chapter 1047
राजेंद्र ने बंसी की तरफ़ देखा। “दो नहीं, चार सिपाही ले जाओ।”
बंसी ने सिर हिलाया। “और?”
राजेंद्र ने अपनी बेल्ट सही की। “और मैं भी आ रहा हूँ।” वो सुमन की तरफ़ मुड़े। “तुम यहाँ रहो। इनका ख़याल रखो।”
सुमन ने कुछ कहना चाहा, फिर चुप हो गई। “ठीक है।” उसने कहा।
मैं बाहर निकला। गाड़ी तैयार थी। बंसी ने इंजन चालू किया।
मैं गाड़ी में बैठा। सामने अंधेरा सड़क थी, और दूर बसवा की तरफ़ जाती पगडंडी।
गाड़ी चली। मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा, क्योंकि अगर देखता तो शायद उतर जाता।
रास्ते में राजेंद्र ने अपने सिपाहियों को फ़ोन पर हिदायत दी। “कोई गोली नहीं चलेगी। पहले हम पहुँचेंगे। अगर दरवाज़ा बंद मिले, तो इंतज़ार। बिना मेरे इशारे के अंदर नहीं।”
बंसी ने पीछे मुड़कर मुझे देखा। “डर लग रहा है?”
“थोड़ा।” मैंने कहा।
“अच्छा। डर अच्छी चीज़ है।” उसने कहा। “जो बिल्कुल नहीं डरता, वो मर जाता है।”
मैंने खिड़की से बाहर देखा। खेत अंधेरे में लुप्त हो रहे थे। चाँद नहीं था।
“बंसी।” मैंने कहा।
“हाँ।”
“अगर तिजोरी में काग़ज़ मिल जाएं। और अगर उनमें किसी की ज़मीन का काग़ज़ हो, किसी का घर… तो हम क्या करेंगे?”
बंसी कुछ देर चुप रहा।
“पहले मिल जाने दो।” उसने कहा। “पहले उन्हें देख लेने दो। फिर बात करेंगे।”
गाड़ी एक मोड़ पर मुड़ी। सामने बसवा की हवेली की पुरानी दीवारें अंधेरे में खड़ी थीं। एक खिड़की में हल्की रोशनी थी।
राजेंद्र ने गाड़ी रोकी। “वहाँ कोई है।” उन्होंने धीरे से कहा।
बंसी ने गाड़ी बंद की। हम उतरे। चार सिपाही पीछे आए।
मैंने हवेली की तरफ़ देखा। रोशनी जल रही थी। हरि सिंह आ चुका था।
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ मुड़कर धीरे से कहा। “अब तुम पीछे रहो।” फिर बंसी की तरफ़। “तुम रास्ता दिखाओ।”
हम दीवार के साए में चलने लगे। मेरे हाथ ठंडे थे।
पीछे की तरफ़ पहुँचे। बंसी ने रसोई के पास वाला दरवाज़ा दिखाया। वहाँ एक सिपाही बैठा था। वो अकेला था, अपनी बंदूक कुर्सी के साथ झुकाकर रखी थी, और एक पुरानी लालटेन के पीछे बैठे-बैठे सुस्ता रहा था। राजेंद्र ने इशारा किया। दो सिपाही दोनों तरफ़ से घूमे।
मैंने अपनी साँस रोकी।
बसवा में अंदर, पीछे की तरफ़, काला दरवाज़ा था। बंद। और उसके पार, जिस तिजोरी में तीन सौ से ज़्यादा हस्ताक्षर थे — वो।
मैंने हाथ जोड़े।
राजेंद्र ने धीरे से कहा। “पहले सिपाही। फिर हम।”
वो चलने लगा।
॥
राजेंद्र ने सिपाही की तरफ़ कदम बढ़ाया ही था कि बंसी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“रुको।” बंसी ने धीरे से कहा। “लालटेन देखो।”
राजेंद्र रुका। उस सिपाही की लालटेन कुर्सी के पीछे रखी थी, और लौ बहुत धीमी थी — जैसे तेल ख़त्म हो रहा हो। सिपाही की आँखें बंद थीं, सिर एक तरफ़ झुका हुआ था। साँस लंबी और भारी चल रही थी।
“सो रहा है।” बंसी ने कहा।
राजेंद्र ने सिर हिलाया। उसने दो सिपाहियों को हाथ से इशारा किया। दोनों दीवार के साथ-साथ आगे बढ़े। एक उसकी कुर्सी के पीछे गया, दूसरा सामने। पहले वाले ने बंदूक उठाई, दूसरे ने उसका मुँह दबाया।
सिपाही की आँखें खुलीं। वो हड़बड़ाया, हाथ फड़फड़ाए, पर दूसरे सिपाही का हाथ उसके मुँह पर जमा था।
“चिल्लाना मत।” राजेंद्र उसके सामने खड़े थे। “चिल्लाए तो पहले तेरी टाँग जाएगी। समझा?”
सिपाही ने आँखों से हाँ कहा।
“अंदर कौन है?”
“साहब।” सिपाही ने मुँह खुलने पर हाँफते हुए कहा। “बस साहब और मैं। साहब आधे घंटे पहले आए।”
“और कोई?”
“दो आदमी शहर गए हैं। काग़ज़ लाने। साहब ने भेजा। वो अभी नहीं लौटे।”
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने कुछ नहीं कहा। दो आदमी बाहर — मतलब वक़्त कम है।
“काला दरवाज़ा कहाँ है?” राजेंद्र ने पूछा।
सिपाही ने ठुड्डी से रसोई की तरफ़ इशारा किया। “पीछे। रसोई के बगल में। पर साहब ने कहा है, वो दरवाज़ा कोई नहीं खोलता। उसकी चाबी साहब के गले में है।”
मेरी जेब में पापा की दी चाबी थी। मैंने उसे छुआ। ठंडी थी।
“दरवाज़ा खुला है या बंद?” बंसी ने पूछा।
“बंद।” सिपाही ने कहा। “साहब ने ख़ुद बंद किया।”
राजेंद्र ने सिपाही को कुर्सी से उठाया और एक सिपाही के हवाले करके दीवार की तरफ़ खड़ा कर दिया। फिर मेरी तरफ़ मुड़े।
“अंदर जाना है। पर पहले एक बात।” उनकी आवाज़ धीमी थी। “हरि सिंह कोई मामूली आदमी नहीं है। वो बीमार है, पर डरा हुआ जानवर सबसे ज़्यादा ख़तरनाक होता है। मेरे पीछे रहना। जो मैं कहूँ, वही करना।”
“ठीक है।” मैंने कहा।
बंसी आगे बढ़ा। “मैं रास्ता जानता हूँ। रसोई से होकर जाना होगा।”
हम रसोई में घुसे। अंदर अंधेरा था, बस चूल्हे की राख में आग की लाली बची थी। बर्तन धरे थे, एक बाल्टी में पानी था। दीवार से सटकर एक लंबी अलमारी थी, उससे आगे — काला दरवाज़ा।
वो दरवाज़ा लकड़ी का था, मोटा, और उस पर तीन ज़ंग लगे ताले थे। बीच में एक बड़ी कुंडी थी। दरवाज़े के नीचे से रोशनी की एक पतली लकीर आ रही थी।
राजेंद्र ने कान लगाया। अंदर से आवाज़ आ रही थी। कोई बोल रहा था — धीमी, टूटी आवाज़।
“तेरे पास कुछ नहीं बचा।” यह आवाज़ हरि सिंह की थी। “तेरे पास सिर्फ़ वो काग़ज़ हैं जो मैंने तुझसे लिखवाए। और वो अब भी मेरे पास हैं। तू अब भी वही है — मेरा मुंशी।”
मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा। कौन जवाब दे रहा था, सुनाई नहीं दिया।
“अब भी मेरे काम आ सकता है।” हरि सिंह फिर बोला। “अगर तू बस एक बात मान ले। बस एक।”
तभी राजेंद्र ने मुझसे हाथ लिया और मेरी जेब से चाबी निकाली। उन्होंने तालों में डाली। पहला ताला खुला — खट। फिर दूसरा — खट।
दरवाज़े के अंदर आवाज़ें बंद हो गईं।
तीसरा ताला था। राजेंद्र ने चाबी घुमाई, पर वो फँस गई। घुमाई फिर — नहीं।
“बंसी।” राजेंद्र ने धीरे से कहा।
बंसी ने कमर से एक पतली लोहे की तीली निकाली। “पीछे हटो।”
वो ताले के पास झुका। मैंने आवाज़ सुनी — धातु की धातु से रगड़। दस सेकंड। फिर एक हल्की चटक।
ताला खुला।
राजेंद्र ने कुंडी उठाई और दरवाज़ा धक्का दिया। दरवाज़ा खुला।
अंदर लालटेन जल रही थी — बड़ी, मेज़ पर रखी। उसकी रोशनी में मैंने पहले वो दीवार देखी जो सामने थी। दीवार पर एक लंबी अलमारी थी, जिसके पीछे से ईंटें निकली हुई थीं — आधी खुली। और उस खुले हिस्से में वो दिख रहा था — लोहे का बड़ा संदूक, जिसके सामने का हिस्सा खुला था और अंदर काग़ज़ों के बंडल भरे थे।
और उस संदूक के सामने, कुर्सी पर बैठा — हरि सिंह।
वो कुर्सी पर झुका बैठा था। पैरों में कंबल था, हाथों में लाठी। उसके सामने छोटी मेज़ थी, और उस पर कुछ काग़ज़ थे। हरि सिंह ने सिर उठाया। मुझे देखा। राजेंद्र को देखा।
उसके चेहरे पर डर नहीं था। थकान थी।
“अंदर आ गए।” उसने कहा। “अच्छा किया। बाहर खड़े रहते तो मैं सो जाता।”
राजेंद्र आगे बढ़े। “हरि सिंह, तुम गिरफ़्तार हो।”
“हूँ।” हरि सिंह ने कहा। “बस एक मिनट।”
उसने लाठी मेज़ पर रखी और अपनी कमीज़ के कॉलर से हाथ डालकर एक डोरी निकाली। डोरी में एक चाबी थी — छोटी, पीतल की। उसने उसे मेज़ पर रख दिया।
“ये उस दराज़ की है।” उसने संदूक की तरफ़ इशारा किया। “जो तुम ढूँढ रहे हो, वो वहीं है।”
राजेंद्र ने मुझे इशारा किया। मैं आगे बढ़ा। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने चाबी उठाई और संदूक के पास गया।
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