The Token System – Chapter 1046
पापा की आँखें भर आईं। उन्होंने सुमन की तरफ़ देखा। सुमन ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“मैं…” पापा ने कुछ कहना चाहा, पर हाँफ गए।
सुमन ने पानी का गिलास पास रखा। “धीरे। एक-एक शब्द।”
पापा ने पानी पिया। फिर बोले। “पहले हरि सिंह के बाप का काम था। जब मैं चौबीस साल का था। एक दुकान थी। रामगंज में। हरि सिंह के बाप की। मज़दूरी करता था। एक दिन… रात को।” वो रुके। “एक आदमी आया। रामगंज की उस गली में। हरि सिंह के बाप का आदमी भी था। मुझे उस रात दुकान पर रुकना पड़ा। और उस आदमी ने…।”
पापा की आवाज़ रुक गई। उनके होंठ हिलते रहे, पर शब्द नहीं निकले।
“क्या हुआ?” राजेंद्र ने धीरे से पूछा।
“हरि सिंह के बाप ने उस आदमी को मार डाला।” पापा ने कहा। “और… और मैंने देखा। मैं चुप रहा। मैं… मैं डर गया था। मैंने पुलिस को नहीं बताया। और वो जानता था कि मैंने देखा।”
सुमन की पकड़ मज़बूत हुई।
“तो उसने मुझे गवाही के बदले…।” पापा ने कहा। “चुप रहने के बदले। हर महीने। एक हस्ताक्षर। मेरे नाम पर। मेरे… मेरे गाँव में जो ज़मीन थी, वो गिरवी रखी। कोई पंचायत का काग़ज़? नहीं। जो भी हो, मैंने पढ़ा नहीं।”
“पच्चीस साल पहले?” राजेंद्र ने पूछा।
पापा ने सिर हिलाया। “पहले सिर्फ़ हस्ताक्षर थे। बाद में उसने मुझे… इस्तेमाल करना शुरू किया। जो चीज़ उसे लेनी होती, वो मेरे नाम पर ले लेता। मैं उसका हाथ था।”
राजेंद्र की आँखें सिकुड़ गईं।
“और मुझे क्या पता होता, क्या साइन कर रहा हूँ?” पापा ने कहा। “उसने मुझे पढ़ना ही नहीं सिखाया। मैं अंगूठा लगाता था। धीरे-धीरे हस्ताक्षर बना।”
एक लंबी साँस राजेंद्र ने ली।
“जिस आदमी को उसने मारा था,” सुमन ने कहा, “किसने देखा?”
“सिर्फ़ मैं।” पापा ने कहा।
“और हरि सिंह के बाप को क्या हुआ?”
“बुढ़ापे में मर गया।” पापा ने कहा। “पर हरि सिंह ने सब कुछ संभाल लिया। उसने… उसने वो सब अपने पास रखा। मुझे बसवा की हवेली में रखा। वहीं पर वो मुझसे हस्ताक्षर करवाता। महीने के आख़िर में।”
“और वो काग़ज़ कहाँ हैं?” राजेंद्र ने पूछा।
पापा ने आँखें बंद कर लीं। “मुझे नहीं पता। पर… बसवा की हवेली में। एक कमरा है, नीचे। जहाँ वो… जहाँ वो अपने काम करता है। एक तिजोरी है, दीवार के अंदर। पीछे, एक अलमारी के। मैंने सुना था उसे। एक बार। जब मैं जवान था। वो उसे खोलता था।”
राजेंद्र खड़े हो गए।
“आपको आराम करना होगा।” सुमन ने कहा। “अभी बहुत बात हो गई।”
पापा ने सुमन का हाथ पकड़ा। “तुम… तुम मेरी बेटी हो?”
सुमन रुकी। उसने कुछ नहीं कहा। उसकी आँखें भर आईं, पर उसने पलक नहीं झपकी।
“हाँ।”
“तुम्हारा नाम…?”
“सुमन।”
पापा ने उसका चेहरा देखा। “मैंने तुम्हें कभी…।”
“बाद में।” सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ नरम थी, पर मज़बूत। “अभी बस साँस लीजिए।”
बाहर आकर राजेंद्र ने अपना फ़ोन निकाला।
“बसवा।” उन्होंने बंसी से कहा। “हवेली के पीछे का रास्ता है क्या?”
बंसी ने सिर हिलाया। “दो रास्ते हैं। एक मुख्य, एक पीछे वाला। पीछे वाला बंद पड़ा है, पर खुलता है। खेत के किनारे से।”
“अभी रात में कोई नहीं जाएगा।” राजेंद्र ने कहा। “सुबह पहले पहुंचेंगे। वारंट लेकर।”
“वारंट?” मैंने कहा। “वो तिजोरी खुलवाने के लिए?”
“हाँ।” राजेंद्र ने कहा। “पर एक दिक्कत है।”
“क्या?”
“हरि सिंह अभी शहर में है। हमने उसे रोक नहीं रखा।” राजेंद्र ने कहा। “सुबह तक वो हवेली जा सकता है। वो तिजोरी खाली कर सकता है। और फिर हमारे पास कुछ नहीं बचेगा।”
सुमन आगे आई। “तो सुबह नहीं। अभी।”
“अभी रात है।” राजेंद्र ने कहा। “बिना वारंट कैसे?”
“किशनचंद ने बयान दिया है।” सुमन ने कहा। “वो गवाह है। उसका बयान है कि उसके हस्ताक्षर ज़बरदस्ती लिए गए। ये जान का ख़तरा है। किशनचंद की जान का, और… उन काग़ज़ों पर जो किसी की ज़मीन हैं, उन लोगों की ज़िंदगी का। आप की स्थिति में, इसे बचाने का हक़ है। आप उसे ख़त्म नहीं होने दे सकते।”
राजेंद्र सोच में पड़े। बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
“मैं चलूँगा।” मैंने कहा। “मैं जानता हूँ कि कौन सा कमरा है। वो जगह मैंने देखी है।”
“मन्नू।” सुमन ने कहा। “तुम अभी भी… ”
“मैं ठीक हूँ।” मैंने कहा। “और अगर काग़ज़ उस तिजोरी में हैं, तो हरि सिंह उन्हें नहीं छुएगा — क्योंकि वो सोचता है कि कोई जानता ही नहीं। मैं जानता हूँ।”
राजेंद्र कुछ देर चुप रहे। “ठीक है। पर मेरी शर्त है। तुम सामने नहीं जाओगे। सिर्फ़ रास्ता दिखाओगे। हमारे सिपाही पहले जाएँगे।”
“मंज़ूर।”
“बंसी।” राजेंद्र ने कहा। “गाड़ी निकालो। दो सिपाही साथ ले जाओ। हम पीछे आ रहे हैं।”
बंसी दौड़कर गया।
मैं पापा की तरफ़ मुड़ा। वो अब भी स्ट्रेचर पर पड़े थे। उनकी आँखें बंद थीं, पर उनके होंठ फिर उसी नाम को दोहरा रहे थे। “बसवा। बसवा।”
मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। ठंडा था। “पापा।” मैंने धीरे कहा। “मैं जा रहा हूँ। वो काग़ज़ लेकर आऊँगा। आप… आप बस यहीं रहिए।”
उन्होंने मेरा हाथ दबाया। बहुत हल्का। फिर आँखें खोलीं। मुझे देखा।
“मन्नू।” वो बोले।
“हाँ।”
“वो तिजोरी… उसकी चाबी हरि सिंह की जेब में होगी। या उसकी गाड़ी में। बसवा में उसके पास हमेशा एक थैला रहता था, जिसमें चाबियाँ रहती थीं। पर… ” वो रुके। “पुरानी हवेली की तिजोरी। उसमें एक बात है। उसे खोलने के लिए सिर्फ़ एक चाबी नहीं चाहिए। दो चाबियाँ हैं।”
“दूसरी?”
“हरि सिंह के पास।” पापा ने कहा। “एक उसके पास होगी। दूसरी… दूसरी मुझे पता है कहाँ है। अस्पताल के पुराने कमरे में। वो काग़ज़ जो उसने मुझसे साइन करवाए थे, उनमें से एक का नंबर…।” उनकी आवाज़ रुक गई। “नहीं। भूल जाओ। ये बहुत पुराना है।”
“कहिए।” मैंने कहा।
“चौदह साल पहले।” पापा ने कहा। “उसने मुझसे एक काग़ज़ साइन करवाया था जिसमें लिखा था कि मैंने उसे कुछ चीज़ें दीं। गिरवी रखीं। उसमें एक ताले की चाबी भी थी। मैंने वो साइन किया। मुझे पता नहीं कि वो चीज़ें क्या थीं। पर… एक कमरे में… ज़मीन के नीचे एक तिजोरी है, दूसरी। बसवा में नहीं, गाँव के बाहर। मेरे पुराने घर के पास।”
राजेंद्र ने उनकी तरफ़ झुककर पूछा। “किशनचंद जी। ये बहुत ज़रूरी है। दूसरी तिजोरी कहाँ है?”
पापा ने आँखें बंद कर लीं। “नहीं। मैं… मैं अभी और नहीं। पहले बसवा। पहले वो काग़ज़। अगर हरि सिंह को पता चलेगा कि मैंने बोला है, तो वो सब कुछ… जला देगा। चाबी… चाबी मेरे पास है। यहाँ।” उन्होंने बाँह हिलाई। “जेब में। बीच वाली। वो पुरानी है।”
सुमन ने झुककर उनकी जेब देखी। एक छोटी सी लोहे की चाबी निकली।
“ये।” पापा ने कहा। “ये दूसरी तिजोरी की है। जब हरि सिंह ने मुझे यहाँ छोड़ा, तो वो मेरे कपड़ों में भूल गया। मैंने कभी लौटाई नहीं।”
राजेंद्र ने चाबी सुमन से ली। अपनी जेब में रखी।
“अब चलो।” उन्होंने कहा।
“पापा।” मैंने कहा। “वो बसवा में कौन सा कमरा? जहाँ तिजोरी है?”
पापा ने धीरे से कहा। “नीचे का। पीछे की तरफ़। जहाँ रसोई है, उसके बगल में। वहाँ एक काला दरवाज़ा है। उसके अंदर। पर… मन्नू।”
“हाँ?”
“वहाँ एक सिपाही रहता है। रात को। हरि सिंह ने रखा है।” उनकी आवाज़ काँपी। “वो… वो बंदूक रखता है।”
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