The Token System – Chapter 1039
“यही है।” जमुना ने कहा।
“क्या?”
“आख़िरी हिसाब।” उसने कहा। “मेरे हिस्से का।”
उसने संदूक की तरफ़ बढ़कर ताला देखा। ताला ज़ंग लगा था, पर खुला हुआ था।
“खुला है।” मैंने कहा।
“क्योंकि कोई मुझसे पहले आ चुका है।” जमुना ने कहा।
उसने संदूक खोला। उसमें एक भूरे रंग की मोटी बही थी — फटी जिल्द, पीले पन्ने। और उसके नीचे एक छोटी सी पीली पर्ची।
जमुना ने पर्ची उठाई। पढ़कर उसका चेहरा उतर गया।
“क्या लिखा है?” मैंने पूछा।
उसने पर्ची मुझे दी। उस पर लिखा था — “जमुना — तेरा हिसाब तो बराबर है। पर तेरे बाद वाला हिसाब अभी बाक़ी है। — कौशल्या।”
“कौशल्या?” मैंने कहा। “पर वो तो —”
“चालीस साल पहले मरी थी।” जमुना ने कहा। “मैं जानती हूँ। पर ये उसकी लिखाई है।”
वो बही उठाने लगी, तभी ऊपर से राजेंद्र की आवाज़ आई। “मन्नू! जल्दी आओ।”
मैं भागा। सीढ़ियों से ऊपर आकर देखा — हवेली के आँगन में एक औरत खड़ी थी, सिर पर सफ़ेद दुपट्टा, हाथ में लाठी। साथ में वो सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी, जो हरि सिंह का नौकर बताया जा रहा था।
वो औरत बूढ़ी थी — अस्सी से ऊपर। पर आँखें तेज़ थीं।
“ये कौन है?” राजेंद्र ने जमुना से पूछा, जो मेरे पीछे आई थी।
जमुना उसे देखकर रुक गई। उसकी आँखें फैल गईं।
“कौशल्या?” उसने धीरे से कहा।
औरत ने दुपट्टा सरका दिया। उसके चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, पर पहचान साफ़ थी।
“नहीं।” उसने कहा। “मैं कौशल्या नहीं हूँ।”
“तो —”
“मैं वो हूँ जिसका नाम सब भूल गए।” औरत ने कहा। “मैं सरस्वती हूँ। कौशल्या की बेटी।”
मैंने जमुना की तरफ़ देखा। जमुना की आँखों में आँसू थे।
“पर — तू तो चालीस साल पहले —”
“मरने की ख़बर फैलाई गई थी।” सरस्वती ने कहा। “असल में मुझे उस रात यहाँ से निकाल दिया गया था। किसी ने मुझे बचा लिया। और मैं आज तक इंतज़ार कर रही थी।”
“किसने बचाया?” मैंने पूछा।
सरस्वती ने अपनी लाठी आगे बढ़ाई। “इसने नहीं। पर इसके पास जो काग़ज़ है, वो मेरा है।”
उसने सफ़ेद कुर्ते वाले की तरफ़ इशारा किया। उसने आगे बढ़कर एक लिफ़ाफ़ा जमुना की तरफ़ बढ़ाया।
“ये क्या है?” जमुना ने पूछा।
“तेरा हिसाब।” सरस्वती ने कहा। “और मेरा।”
जमुना ने लिफ़ाफ़ा नहीं लिया। उसने सरस्वती की तरफ़ देखा।
“तू मेरी बहन की बेटी है।” जमुना ने कहा। “मैं तुझे पहचानती हूँ। तू वही है जो कौशल्या की गोद में खेलती थी।”
“हाँ।” सरस्वती ने कहा। “और तू वही है जिसे मैंने आख़िरी बार हवेली के पीछे देखा था — जब तुझे कोठरी में बंद किया जा रहा था।”
जमुना ने लिफ़ाफ़ा लिया। खोला। अंदर एक पुरानी रसीद थी, जिस पर लिखा था — “सरस्वती — हवेली का चौथा हिस्सा — अपनी माँ कौशल्या की तरफ़ से।”
जमुना ने रसीद पढ़ी और सरस्वती की तरफ़ देखा।
“तो अब हिस्सेदार चार हैं।” उसने कहा।
“चार नहीं।” सरस्वती ने कहा। “पाँच।”
“क्या?”
“मेरे पास एक और काग़ज़ है।” सरस्वती ने कहा। “जिसमें हवेली का पाँचवाँ हिस्सा उस आदमी का है जो सबसे आख़िर में हिसाब पूरा करेगा।”
उसने सफ़ेद कुर्ते वाले की तरफ़ देखा। उसने दूसरा लिफ़ाफ़ा निकाला — इस बार मेरी तरफ़ बढ़ाया।
“ये तेरा है।” सरस्वती ने कहा। “तेरा और तेरे पापा का।”
मैंने लिफ़ाफ़ा लिया। खोला। अंदर एक काग़ज़ था — पीला, मुड़ा हुआ। उस पर लिखा था — “मनोहर — हवेली का पाँचवाँ हिस्सा — उसका जो हिसाब पूरा करेगा।”
मेरे हाथ काँपने लगे।
“पर मैंने कुछ नहीं किया।” मैंने कहा। “मैंने सिर्फ़ —”
“तूने सिर्फ़ ये नहीं किया कि तूने हिसाब पूरा किया।” सरस्वती ने कहा। “तूने वो किया जो चालीस साल में किसी ने नहीं किया — तूने किसी को मारा नहीं, किसी को डराया नहीं, किसी का हक़ नहीं छीना। तूने सिर्फ़ हिसाब किया।”
भवानी आगे आया। “तो अब पाँच हिस्से हो गए?”
“हाँ।” सरस्वती ने कहा। “और तेरा कोई नहीं।”
भवानी ने आँखें नीची कर लीं।
मैंने टोकन जेब से निकाला। इक्कीसवीं लकीर पूरी हो चुकी थी। उसके नीचे एक नया शब्द उभरा — “पाँच।”
जमुना ने मेरी बाँह पकड़ी। “इसका मतलब —”
“इसका मतलब,” मैंने कहा, “कि अब सिर्फ़ हिसाब नहीं, नाम भी पाँच हैं। और सबसे आख़िरी नाम… मेरा है।”
सूरज ढल रहा था। हवेली की दीवार पर पीली रोशनी पड़ रही थी। और मुझे लगा जैसे दीवार भी साँस ले रही हो।
सरस्वती ने मेरी तरफ़ देखा। “अब तुझे वो करना है जो किसी ने अब तक नहीं किया।”
“क्या?”
“हिसाब बराबर करना।” उसने कहा। “सिर्फ़ अपना नहीं — सबका।”
॥
सरस्वती की लाठी की नोक ज़मीन पर टिकी रही और उसकी आवाज़ आँगन में गूँजती रही — “सिर्फ़ अपना नहीं, सबका।” मैंने काग़ज़ जेब में रखा और सरस्वती से पूछा, “बुआ, पापा बीस साल कहाँ रहे?”
सरस्वती ने जमुना की तरफ़ देखा। जमुना ने मेरी कलाई पकड़ी और कहा, “चल, दिखाती हूँ।”
हम हवेली के पिछले हिस्से की तरफ़ बढ़े। भवानी वहीं खड़ा रह गया — न जाने की हिम्मत, न रोकने की। बंसी मेरे पीछे-पीछे आया।
पिछले आँगन में पुरानी ईंटों की दीवार थी, जिस पर पाँच लकीरें खुदी थीं। जमुना ने उसी दीवार के कोने पर हाथ रखा और एक ईंट दबाई। दीवार में एक छोटी सीढ़ी दिखी — संकरी, तीन-चार पत्थर की, नीचे की तरफ़ जाती हुई।
“यहाँ से उतरना है।” जमुना ने कहा। “सँभलकर — पत्थर ढीले हैं।”
मैंने नीचे पैर रखा। सीढ़ी गीली थी, हवा में मिट्टी और बंद कमरे की बदबू थी। जमुना मेरे आगे उतरी, मैं पीछे। दो कदम के बाद अंधेरा इतना घना हो गया कि अपनी ही उँगलियाँ नहीं दिख रही थीं।
“बंसी!” मैंने ऊपर आवाज़ दी। “माचिस या कुछ?”
बंसी की आवाज़ ऊपर से आई। “रुक, मोबाइल की बत्ती जला रहा हूँ।”
रोशनी पड़ी तो दीवारों पर कोयले से लिखे निशान दिखे। लंबी-लंबी लकीरें — जैसे किसी ने हर दिन गिनती की हो। मैंने उँगली से छुआ। कोयला हाथ में लग गया।
“ये लकीरें किसने —”
“किशन ने।” जमुना ने कहा। “जब वो यहाँ बंद था। हर दिन एक। मैंने भी बनाईं — पास वाली दीवार पर। फिर हरि सिंह ने मिटा दीं।”
नीचे पहुँचकर मैंने देखा — एक छोटा कमरा, छत से पानी टपकता, फ़र्श पर भूसा और टूटी चारपाई का ढाँचा। और सामने, लोहे का मोटा दरवाज़ा, जिस पर जंग ने गहरे दाग छोड़े थे। दरवाज़े पर एक पुरानी कुंडी और उस पर ताज़ा मोहर — लाल मोम, ऊपर अदालत का निशान।
“ताला तो पुराना है।” मैंने कहा। “पर मोहर —”
“अदालत ने कल रात लगवाई।” जमुना ने कहा। “जज साहब ने कहा था — शाम चार बजे बंद कमरा खुलेगा। जो कुछ मिलेगा, सबके सामने खुलेगा। तेरे पापा भी तब तक बंद रहेंगे।”
“क्यों?” मैंने कहा। “वो बीमार हैं। मैंने उन्हें बाहर देखा है — कमज़ोर हैं, खड़े नहीं रह पाते।”
“हरि सिंह के वकील ने कहा कि अगर किशनचंद बाहर रहे, तो काग़ज़ बदल सकते हैं।” जमुना ने कहा। “जज ने सिर्फ़ इसीलिए कमरा बंद रखने का हुक्म दिया। ये कमरे की भीतरी मोहर है — कोई तोड़े तो अदालत की बेइज़्ज़ती।”
मैंने दरवाज़े की दरार से अंदर झाँका। अंधेरा, बस। पर साँस की आवाज़ आ रही थी — धीमी, कमज़ोर।
“पापा?” मैंने कहा, दरवाज़े से मुँह सटाकर।
कुछ देर सन्नाटा रहा। फिर लकड़ी पर नाखून खुरचने की आवाज़ आई।
“मन्नू…?” अंदर से फुसफुसाहट आई। “बेटा… तू सच में है?”
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno