The Token System – Chapter 1040
मेरा गला किसी ने पकड़ लिया। “हाँ, पापा। मैं यहीं हूँ।”
“मैंने… मैंने सुना था तू आ गया।” पापा की आवाज़ रुक-रुक कर आई। “वो औरत — जमुना — वो भी यहीं थी पहले। उसे हरि सिंह ने बाद में कहीं और बंद किया। मुझे यहीं रखा… बीस साल।”
“पापा, बस कुछ घंटे।” मैंने दरवाज़े पर माथा टेका। “चार बजे। मैं खुद आकर ताला खोलूँगा।”
“मत खोलना।” पापा ने कहा। “अदालत के सामने खुलना। वरना हरि सिंह के वकील कहेंगे — हमने कुछ मिलाया।”
मैंने दाँत भींचे। अंदर से खाँसी की आवाज़ आई — लंबी, सूखी।
“पापा, दवा —”
“जमुना देती आई है।” उन्होंने कहा। “बस, वो बीस साल में तीन बार आई। हरि सिंह की मेहरबानी।”
मैंने जमुना की तरफ़ देखा। वो दीवार से टिकी खड़ी थी, आँखें नीची।
“मैं आती रही।” उसने धीरे से कहा। “जब भी हरि सिंह भूलता, मैं चुपके से आ जाती। रोटी, दवा — जो हो सका।”
ऊपर से बंसी की आवाज़ आई। “मन्नू! ऊपर आ जा — भवानी कुछ कह रहा है।”
मैंने पापा से कहा, “चार बजे। मैं किसी को अकेला नहीं छोड़ूँगा — सुमन को बुलाकर लाता हूँ।”
“सुमन?” पापा ने पूछा। “वो डॉक्टर?”
“हाँ। वो भी अब इस हिसाब में है।”
मैं सीढ़ी चढ़ा। रोशनी में आते ही आँखें चौंधियाईं। आँगन में जमुना भी ऊपर आई। सरस्वती अब भी वहीं खड़ी थी — लाठी पर झुकी।
भवानी मेरे सामने आया। उसका चेहरा पहले जैसा नहीं था। आँखें धँसी हुई, होंठ सूखे।
“मन्नू।” उसने कहा। “मैं उस ताले की चाबी अदालत को नहीं दूँगा, जब तक तू मेरी एक बात नहीं मानता।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। “अब भी सौदा?”
“सौदा नहीं।” भवानी ने कहा। “एक शर्त।”
“कह।”
“हरि सिंह का कमरा — जो उसने होम में बनाया था — उसमें एक लोहे का डिब्बा है।” भवानी ने कहा। “अदालत वो डिब्बा खोलेगी तो उसमें मेरे बाप का नाम निकलेगा। मैं चाहता हूँ वो डिब्बा मैं खुद अदालत को दूँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि वो डिब्बा मेरे बाप का है।” भवानी ने कहा। “मैंने बीस साल उस आदमी के नाम पर काग़ज़ बदले — अपने बाप के नाम पर। अब वो नाम अदालत में आए, तो मैं चाहता हूँ मैं अपने हाथ से लाऊँ।”
मैंने जमुना की तरफ़ देखा। उसने कुछ नहीं कहा।
“तेरे हाथ से आए, तेरे हाथ से नहीं आए —” मैंने कहा। “काग़ज़ वही रहेगा।”
“वही रहेगा।” भवानी ने कहा। “पर मेरा बेटा मेरे सामने खड़ा होकर मेरा नाम सुने — ये मैं सह नहीं पाऊँगा।”
“तेरा बेटा तो कल ही तेरे ख़िलाफ़ गवाही दे चुका।”
“वो अदालत में था।” भवानी ने कहा। “ये हवेली का आँगन है।” उसकी आवाज़ भर्राई। “यहाँ मेरे बाप ने, मेरे दादा ने —”
“तेरे बाप ने यहाँ क्या किया, वो सबको पता है।” मैंने कहा।
भवानी चुप हो गया। फिर उसने कहा, “मैं तुझसे शर्त नहीं कर रहा, मन्नू। मैं तुझसे गुज़ारिश कर रहा हूँ।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा — वो आदमी जिसने मेरे पापा को बीस साल कैद में रखा, जिसने माँ को धमकाया, जिसने रीना की शादी तुड़वाने की कोशिश की। और मुझे याद आया — हवेली के काग़ज़ में लिखा था, “जो इस हिसाब को पूरा करेगा, वो हवेली का मालिक नहीं, हिसाब का रखवाला होगा।”
“ठीक है।” मैंने कहा।
बंसी ने मेरी कुहनी पकड़ी। “मन्नू —”
“डिब्बा वो खुद लाएगा।” मैंने कहा। “पर एक शर्त मेरी भी है।”
“कह।”
“वो डिब्बा जब अदालत खोलेगी, तब हरि सिंह खुद वहाँ होगा।” मैंने कहा। “डिब्बा खुलेगा, अंदर का नाम पढ़ा जाएगा — और अगर उसमें भवानी का नाम निकला, तो भवानी खुद उसे पढ़ेगा। अदालत के सामने।”
भवानी ने एक पल सोचा। फिर उसने सिर हिलाया।
“मंज़ूर।” उसने कहा।
जमुना ने मेरी तरफ़ देखा। “तूने उस पर भरोसा कर लिया?”
“भरोसा नहीं किया।” मैंने कहा। “दाँव लगाया। वो अपने बेटे के सामने अपना नाम पढ़ेगा — इससे बड़ी सज़ा इस आदमी को मैं क्या दूँगा?”
सरस्वती ने लाठी टेकी और आगे बढ़ी। “हवेली अब खुली है।” उसने कहा। “जो काग़ज़ मेरे पास थे, उनमें एक और बात लिखी थी।”
“क्या?” मैंने पूछा।
“हवेली के नीचे वाला कमरा — जिसे तुम लोग नींव का कमरा कहते हो —” उसने कहा। “उसमें एक दराज़ है, जिसमें हिसाब की आख़िरी किताब है। उस किताब में पाँचों हिस्सों का लिखा है। अगर वो किताब अदालत में गई, तो हिसाब पूरा — बराबर।”
“तो किताब कहाँ है?” मैंने पूछा।
“वो मेरे पास नहीं।” सरस्वती ने कहा। “हरि सिंह ने उसे मेरे हाथ से लिया था, उस रात — जिस रात मुझे यहाँ से निकाला गया।”
ऊपर से एक आवाज़ आई। सबने सिर उठाया। हवेली की छत के किनारे पर राजेंद्र खड़ा था, हाथ में लालटेन।
“मन्नू!” उसने कहा। “हरि सिंह की गाड़ी से एक लोहे का डिब्बा मिला है। सीलबंद। वो कह रहा है — डिब्बा मेरा है, मैं ही खोलूँगा।”
मैंने भवानी की तरफ़ देखा। भवानी ने आँखें झुका लीं।
“तो डिब्बा किसका?” बंसी ने पूछा।
“डिब्बा अदालत का।” मैंने कहा। “पर खुलेगा — शाम चार बजे। सबके सामने।”
राजेंद्र ने सिर हिलाया और छत से ग़ायब हो गया।
सुमन आँगन में आई — हाथ में छोटी लाल डिबिया। मेरे पास आकर बोली, “किशनचंद को देखना है मुझे। मैंने बीस साल में ऐसे मरीज़ नहीं देखे जो बंद कमरे में रहे हों।”
“अभी नहीं।” मैंने कहा। “चार बजे।”
“मुझे परवाह नहीं अदालत की।” सुमन ने कहा। “अगर वो बेहोश हो गए अंदर, तो तेरी अदालत क्या करेगी?”
“मोहर —”
“मोहर की कोई औकात नहीं, अगर आदमी की साँस जा रही हो।” सुमन ने कहा। “मैं अंदर जा रही हूँ। तू जज को फ़ोन कर।”
मैंने अपना फ़ोन निकाला। सुमन की बात सही थी। मैंने सक्सेना को फ़ोन किया और सारी बात बताई। सक्सेना ने कहा, “मैं जज साहब से बात करती हूँ। तू सुमन को अंदर भेज — मैं मोहर की ज़िम्मेदारी लेती हूँ।”
मैंने फ़ोन रखा और सुमन को सीढ़ी की तरफ़ बढ़ाया। वो उतरी, मैं पीछे। दरवाज़े की दरार पर उसने मुँह सटाया।
“किशनचंद जी?” उसने कहा। “मैं डॉक्टर सुमन हूँ। मन्नू ने भेजा है।”
अंदर से हल्की आवाज़ आई। “आ जाओ… पर मोहर मत तोड़ना।”
सुमन ने एक छोटा टॉर्च जलाया और दरार से अंदर रोशनी डाली। कुछ देर देखती रही। फिर उसने मेरी तरफ़ मुड़कर कहा, “उनका चेहरा पीला है, होंठ सूखे हैं, पर होश में हैं। पानी भेज — बोतल से। मैं दवा देती हूँ।”
मैं ऊपर भागा, पानी लिया, नीचे लाया। सुमन ने बोतल की टोंटी दरार में लगाई और पापा ने पिया।
“अब तू ऊपर जा।” सुमन ने कहा। “मैं यहीं रहूँगी — अंदर नहीं जाऊँगी, पर दरवाज़े के बाहर। जब तक अदालत न आए।”
“तू बाहर —”
“मैं डॉक्टर हूँ।” सुमन ने कहा। “मेरा काम दरवाज़े के इस तरफ़ भी हो सकता है।”
मैं ऊपर आया। आँगन में भवानी अब भी खड़ा था, सरस्वती लाठी पर झुकी बैठी थी, जमुना दीवार से टिकी थी।
“किशन ठीक है?” जमुना ने पूछा।
“सुमन कह रही है होश में हैं।” मैंने कहा।
जमुना ने आँख मूँद ली। “बीस साल।” उसने धीरे से कहा। “बीस साल मैंने उस आदमी को हर दिन देखा — दीवार से बात करते, कोयले से लकीरें खींचते। वो हर रोज़ एक लकीर खींचता — मैं पूछती, क्यों? कहता — जिस दिन लकीरें पूरी होंगी, उस दिन बाहर जाऊँगा।”
“कितनी लकीरें थीं?”
जमुना ने मेरी तरफ़ देखा। “सात हज़ार तीन सौ।” उसने कहा। “जब वो अंदर आया था, मैंने खुद गिनी थीं।”
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। सात हज़ार तीन सौ दिन। बीस साल।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno