The Token System – Chapter 1038
“होने दो।” जमुना ने कहा। “मैं बीस साल से इसी दिन का इंतज़ार कर रही हूँ।”
मैं पापा के पास बैठ गया। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा।
“माँ?” उन्होंने पूछा।
“ठीक हैं।” मैंने कहा। “घर पर।”
“रीना?”
“वो भी। स्कूल में पढ़ाती है।”
उनकी आँखें भर आईं। “अच्छा किया। अच्छा किया तूने।”
“क्या?”
“मेरे बिना भी तुम लोग ज़िंदा रहे।” उन्होंने कहा। “ये मेरी सबसे बड़ी जीत है।”
तभी बाहर से आवाज़ आई — कई पैरों की। राजेंद्र भागकर गया और लौटा।
“अफ़सर लौटा है।” उसने कहा। “कह रहा है कि हरि सिंह बाहर भागने की कोशिश कर रहा था, पर उसे पकड़ लिया गया है।”
“कहाँ है वो?” मैंने पूछा।
“बाहर। गाड़ी में बंद है।”
हम सब बाहर आए। पापा को सुमन और राजेंद्र ने सहारा दिया। जमुना उनके साथ थी।
आँगन में सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। उसके पिछले हिस्से में हरि सिंह बैठा था, दोनों तरफ़ सिपाही।
जमुना ने गाड़ी की तरफ़ देखा और आगे बढ़ी। सिपाही ने रोका।
“बस एक बात।” उसने कहा।
राजेंद्र ने इशारा किया। उसने हरि सिंह की तरफ़ देखा।
“हरि सिंह।” उसने कहा।
हरि सिंह ने आँखें उठाईं। उसकी आँखों में कोई पहचान नहीं थी।
“मैं जमुना हूँ।” उसने कहा। “कौशल्या की बहन।”
हरि सिंह ने एक पल को उसकी तरफ़ देखा, फिर आँखें नीची कर लीं।
“तुम्हारी माँ की रसीद मेरे पास है।” जमुना ने कहा। “और अब वो अदालत के पास जाएगी।”
हरि सिंह ने कोई जवाब नहीं दिया।
जमुना हमारे पास लौटी। उसने मेरी बाँह पकड़ी — उसकी पकड़ मज़बूत थी।
“मन्नू।” उसने कहा। “तेरे पापा ज़िंदा हैं। पर वो सिर्फ़ ज़िंदा नहीं हैं — उन्होंने मुझे तुझसे मिलने भेजा है।”
“क्या?”
“बीस साल में उन्होंने एक बात कही थी — ‘जिस दिन मेरा बेटा हवेली की दीवार के सामने खड़ा होगा, उस दिन मुझे बाहर ले आना। पहले नहीं।’ और मैं उस दिन का इंतज़ार कर रही थी।”
मैंने पापा की तरफ़ देखा। वो सुमन के सहारे खड़े थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और हल्का सा मुस्कुराए।
“आख़िरी हिसाब अभी बाकी है।” जमुना ने कहा। “चार बजे तक का वक़्त है।”
“क्या मतलब?”
“तेरे पापा कहते थे — हवेली का हिसाब तभी पूरा होगा जब चारों हिस्से अपनी जगह हों। तीन हो गए। चौथा बाकी है।” उसने मेरी जेब की तरफ़ देखा। “और तेरे पास वो है — टोकन।”
मैंने टोकन निकाला। बीस लकीरें, नीचे ‘नाम’ शब्द। पर उसके नीचे, हल्की स्याही में, एक नई लकीर उभर रही थी — इक्कीसवीं।
“देखा?” जमुना ने कहा। “वो कह रहा है — अभी वक़्त है।”
भवानी हमारे पीछे आया। उसकी आवाज़ धीमी थी।
“जमुना।” उसने कहा।
जमुना रुकी। “क्या?”
“मुझे माफ़ कर दे।”
जमुना ने उसकी तरफ़ देखा — लंबा, सीधा। “माफ़ी?”
“हाँ।”
“माफ़ करने का हक़ मेरे पास है — पर मैं नहीं करूँगी।” उसने कहा। “बीस साल मैंने उस कोठरी में काटे। बाहर हवा चली, बारिश आई, तेरे होम में खाना बना, तेरे बच्चे बड़े हुए — और मैं दीवार के पीछे बैठी रही।” उसने गला साफ़ किया। “तू माफ़ी तब माँग जब तेरा हिसाब पूरा हो जाए। अभी तो तेरा हिसाब शुरू भी नहीं हुआ।”
भवानी चुप खड़ा रहा।
राजेंद्र ने आकर मेरी तरफ़ देखा। “जज साहब से बात हो गई है। शाम चार बजे हवेली का बंद कमरा खुलेगा — और उसमें भी ऊपर की तरह ही सब कुछ मिलेगा।”
“साढ़े तीन घंटे हैं।” सक्सेना ने कहा।
मैंने टोकन जेब में रखा और हवेली की तरफ़ देखा। पीली दीवार, टूटी खिड़कियाँ, और ऊपर वाली खिड़की — जिसके पीछे हरि सिंह बीस साल बैठा रहा।
“जमुना।” मैंने कहा। “तीन बजे कहाँ मिलें?”
“यहीं।” उसने कहा। “हवेली के आँगन में। और एक बात — तेरे पापा को पहले डॉक्टर के पास ले जा। वो बीस साल से टूटे हुए हैं।”
“डॉक्टर सुमन यहीं हैं।”
“डॉक्टर नहीं।” जमुना ने कहा। “अस्पताल। जाँच। इससे पहले कि वो आख़िरी हिसाब में खड़े हों, उन्हें खड़े होने लायक होना चाहिए।”
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया। “मैं अभी एम्बुलेंस बुलाती हूँ।”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। “नहीं जाऊँगा।”
“पापा —”
“नहीं जाऊँगा।” उन्होंने दोहराया। “बीस साल इस दीवार के पीछे रहा। तीन घंटे इसके सामने रह लूँगा।”
“पर तुम्हारी हालत —”
“मेरी हालत ठीक है।” उन्होंने कहा। “मैंने बीस साल इसी दिन के लिए साँस ली है।”
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। उसने धीरे से कहा, “उन्हें रहने दो। ज़्यादा नहीं — बस जाँच का सामान मँगवा लेती हूँ।”
वो गई। जमुना मेरे पास आई और धीरे से बोली, “वो औरत — कम्मो — तूने उसे देखा?”
“हाँ। वो अस्पताल में है।”
“वो ज़िंदा है?”
“हाँ। पर मन्नू — वो कौशल्या के बारे में झूठ बोली थी।”
“झूठ नहीं।” जमुना ने कहा। “वो सच बोली थी — कौशल्या मर चुकी है। पर वो ये नहीं बता पाई कि उसकी दूसरी बहन ज़िंदा है।”
“क्यों?”
“क्योंकि उसे भी नहीं पता होगा।” जमुना ने कहा। “हरि सिंह ने मेरा नाम सारे काग़ज़ों से मिटवा दिया था। जिस नाम को मैंने चालीस साल पहले छोड़ा, वो किसी काग़ज़ पर नहीं है।”
“तो कम्मो को कैसे पता चलेगा?”
“जब मैं उसके सामने खड़ी होऊँगी।” जमुना ने कहा।
तभी भवानी फिर आया — इस बार उसके हाथ में एक पुराना पीला काग़ज़ था।
“जमुना।” उसने कहा। “ये तेरे लिए है।”
जमुना ने काग़ज़ लिया। उसे खोला। उसके हाथ काँपने लगे।
“कहाँ से मिला?”
“मेरे नहीं पता।” भवानी ने कहा। “सुबह जब मैं आया, तो गेट पर पड़ा था।”
जमुना ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। उस पर लिखा था — “जमुना — आख़िरी हिसाब से पहले दीवार के भीतर देख। तेरा हिस्सा वहाँ नहीं है। तेरा हिस्सा हवेली के नीचे है। — सुखदेव।”
“सुखदेव?” मैंने कहा। “मेरे दादा?”
“ये उनकी लिखाई नहीं है।” जमुना ने कहा। “पर वो नाम जानता है जो सिर्फ़ सुखदेव जानता था।”
“क्या?”
“कि मेरा हिस्सा दीवार में नहीं, हवेली के नीचे है।” उसने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा। “जो भी ये काग़ज़ छोड़ गया है, वो चाहता है कि मैं आख़िरी हिसाब से पहले हवेली के नीचे जाऊँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि शायद वहीं आख़िरी सच है।” जमुना ने कहा।
राजेंद्र ने बीच में आकर कहा, “तीन बजे तक का वक़्त है। ज़्यादा दूर मत जाइए।”
“दूर नहीं जा रही।” जमुना ने कहा। “बस हवेली के नीचे जा रही हूँ।”
वो हवेली के भीतर गई। मैं उसके पीछे। राजेंद्र भी।
हवेली के अंदर का हिस्सा ठंडा था — जैसे किसी ने बीस साल से यहाँ हवा नहीं आने दी। जमुना ने बीच वाले कमरे की ज़मीन पर एक चौकोर पत्थर दिखाया।
“यहाँ।” उसने कहा। “ये पत्थर हटाओ।”
“ये तो अदालत का हुक्म है — कुछ नहीं हिलेगा।” राजेंद्र ने कहा।
“मैं हिला नहीं रही।” जमुना ने कहा। “मैं अपनी ज़मीन के नीचे जा रही हूँ।”
उसने पत्थर के किनारे पर हाथ रखा। उसकी उँगलियों ने एक जगह दबाया और पत्थर हल्का सा हिला।
“ये पत्थर नहीं है।” राजेंद्र ने हैरान होकर कहा। “ये ढक्कन है।”
“हाँ।” जमुना ने कहा। “मेरी माँ ने बनवाया था।”
राजेंद्र ने सिपाहियों को बुलाया। चार आदमियों ने मिलकर ढक्कन उठाया। नीचे सीढ़ियाँ थीं — छोटी, संकरी, ईंटों की।
जमुना सबसे पहले उतरी। मैं उसके पीछे। नीचे एक कमरा था — डेढ़ कमरे जितना, दीवारों पर पुराने चित्र, बीच में एक लकड़ी की मेज़, और मेज़ पर एक लोहे का संदूक।
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