The Token System – Chapter 103
उसने मुँह बना लिया, पर मान गया। रामकिशन जाट ने उठकर मेरी तरफ़ देखा।
"मन्नू बेटा, शेखर बाबू से मेरी बात कह देना। कहना — वो काग़ज़ जो उसने दफ़्तर में छुपाया था, वो मेरा है। मेरे बेटे का है।"
"कहूँगा।"
मैंने पोटली उठाई, टोकन जेब में रखा, और निकल पड़ा।
सुबह की हवा में ठंडक थी। रामगंज की गलियाँ खाली थीं, सिर्फ़ एक-दो दूध वाले साइकिल पर निकले थे। अस्पताल का रास्ता मुझे अब रटा हुआ लगता था — वो मोड़, वो पीली दीवार, वो टूटा फाटक। मैं सात बजे से पहले पहुँचना चाहता था, शेखर बाबू के आने से पहले, ताकि दरवाज़े पर बैठकर उसका इंतज़ार कर सकूँ और वो भाग न सके।
पर वो पहले से पहुँचा हुआ था।
दूसरी मंज़िल का रिकॉर्ड कमरा — लोहे का दरवाज़ा, जंग लगी कुंडी, और अंदर पीली रोशनी में शेखर बाबू अपनी मेज़ पर झुके हुए काग़ज़ झाँक रहे थे। उनका चश्मा नाक पर फिसला हुआ था। मैंने दरवाज़ा खोला तो वो उठ खड़े हुए, कुर्सी पीछे खिसक गई।
"तुम? इतनी सुबह?"
"आपने कहा था — कुंडी खुली रहेगी।"
"मैंने कहा था…" उन्होंने चश्मा ठीक किया। "मैंने कहा था कि जब तुम्हारे पास वो हो जो मैंने कहा था, तब आना।"
"मेरे पास वो सब है जो आपने सोचा भी नहीं।" मैंने दरवाज़ा बंद किया। "रामकिशन जाट का ज़मीन का काग़ज़। नर्सिंग होम वाली ज़मीन का सच। और आपका वो दराज़, जिसमें हवेली के काग़ज़ हैं।"
शेखर बाबू का रंग उड़ गया। वो मेज़ के पीछे से निकले और दरवाज़े की तरफ़ बढ़े — मुझे लगा भागेंगे — पर उन्होंने कुंडी लगा दी और खिड़की की तरफ़ देखकर परदा खींच दिया।
"कौन-कौन जानता है कि तुम यहाँ हो?"
"कोई नहीं।"
"अच्छा।" उन्होंने गहरी साँस ली। "बैठो।"
मैं कुर्सी पर बैठ गया। वो अपनी कुर्सी पर गिरे, जैसे पैर साथ छोड़ गए हों।
"मन्नू, मैं तुम्हें एक बात बताने वाला हूँ।" उन्होंने मेज़ पर रखी फ़ाइलें समेटीं, बेवजह। "मैंने भवानी के लिए काग़ज़ों में गड़बड़ की है। बहुत साल पहले। तब मैं जवान था, तब मुझे लगता था कि यह सब ऐसे ही चलता है। ज़मीन का एक काग़ज़ लाओ, दूसरा लगाओ, मुहर बदल दो। हिसाब में गड़बड़ कर दो। मैंने किया।"
मैं चुप बैठा रहा।
"पर एक दिन मेरे ही बाप की ज़मीन उस सूची में आ गई।" उनकी आवाज़ फूटने लगी। "उसी सूची में, मन्नू। जो मैं ख़ुद तैयार करता था। मेरे बाप का नाम, उसी काग़ज़ पर। मैंने भवानी से कहा तो वो हँसा और बोला — अरे शेखर बाबू, सबका नंबर आता है।"
वो रुके। उनका हाथ मेज़ पर काँप रहा था।
"बाप ने वो ज़मीन कभी वापस नहीं पाई। मर गया उसी ग़म में। और मैं यहाँ बैठा हूँ।"
कमरे में सन्नाटा था, पर मैंने उसे भरने नहीं दिया।
"शेखर बाबू, मेरे सवाल का जवाब दो। भवानी के पास ऐसी कौन सी चीज़ है जिससे वो इतना बेखौफ़ है? वो किसी से नहीं डरता। न पुलिस से, न अदालत से, न भगवान से। कोई चीज़ है जो उसे सहारा दे रही है।"
शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने धीरे से अपनी दराज़ खोली, अंदर झाँका जैसे कुछ ढूँढ रहे हों, फिर बंद कर दी।
"एक बार," वो बोले, "मैं उसके दफ़्तर में देर तक रुका था। काग़ज़ों का बंडल लेकर गया था। वो अंदर कमरे में था, और मैं बाहर कुर्सी पर बैठा इंतज़ार कर रहा था। तभी उसकी मेज़ पर पड़ा एक डिब्बा मैंने उठाकर देखा — मुझे लगा मिठाई है।"
"उसमें क्या था?"
"पीतल का एक टुकड़ा। सिक्के जैसा, पर सिक्का नहीं। गोल, थोड़ा मोटा।" उन्होंने हाथ से आकार बनाया। "मैंने उसे उलटा-पलटा, पर वो चमकता नहीं था। जैसे पुराना पड़ा हो, बासी। उस पर कुछ लिखा भी नहीं था। मैंने सोचा — भवानी इसे क्यों संभालकर रखता है?"
"फिर क्या हुआ?"
"तभी उसकी आवाज़ आई — 'शेखर बाबू!' मैंने डिब्बा वापस रखा। वो आया, मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में जो था, वो मैंने सिर्फ़ एक बार और देखा है — उस रात, जब उसके दादा की बही की बात चली थी।" वो थोड़ा रुके। "उसने मुझसे सिर्फ़ इतना कहा — 'ये डिब्बा मत छूना।' और मैंने फिर कभी नहीं छुआ।"
मैंने पूछा, "वो टुकड़ा टूटा हुआ था?"
शेखर बाबू चौंककर मेरी तरफ़ देखा।
"कैसे जाना?"
"बताइए।"
"उसका एक कोना टूटा हुआ था। जहाँ लगता है सिक्के का किनारा होता है, वहाँ एक टुकड़ा निकला हुआ था — जैसे किसी ने तोड़ा हो। उस जगह रंग भी अलग था, थोड़ा काला।"
मेरे हाथ मेज़ पर रखे थे। मैंने उन्हें वापस खींच लिया ताकि शेखर को काँपते न देखें। जेब में टोकन ठंडा था, पर मेरे अंदर कुछ गरम हो रहा था — वो एक कोना, जो सरोज बुआ ने भवानी के टोकन का बताया था, वो कोना जो मेरे टोकन से अलग था। भवानी के पास भी वही टोकन है। बस टूटा हुआ। और एक कोना अलग।
"शेखर बाबू, वो दराज़ जिसमें हवेली के काग़ज़ हैं — खोलिए।"
"मन्नू—"
"अब।"
वो उठे, चाबियों का गुच्छा निकाला, और दीवार के कोने वाली लोहे की दराज़ खोली। अंदर पुराने काग़ज़, धूल, और दो नक्शे लिपटे पड़े थे। मैंने ऊपर वाला नक्शा उठाया — मोटा काग़ज़, जगह-जगह से फटा, कोनों से मुड़ा हुआ। खोला तो सामने हवेली का नक्शा आया।
नीचे लिखा था — खेत्री, हवेली, पुराना नंबर तीन सौ सत्ताईस।
मैंने उँगली नक्शे पर घुमाई। दो मंज़िल, आँगन, पीछे का कुआँ — कुएँ के ऊपर क्रॉस बना था, यानी अब वो दब गया है। ऊपर की मंज़िल पर एक कमरा ऐसा बना था जिसका कोई दरवाज़ा नक्शे में नहीं था — चारों तरफ़ दीवार, और बीच में एक छोटा सा चौकोर।
"ये क्या है?" मैंने उँगली उस चौकोर पर रखी।
शेखर बाबू ने झुककर देखा।
"पता नहीं। ये नक्शा साठ साल पुराना है। हो सकता है उस ज़माने में कोई रोशनदान रहा हो।"
"रोशनदान नहीं।" मैंने ध्यान से देखा। "रोशनदान छत पर होता है। ये दीवार के बीच है।"
"तो क्या?"
"कुछ नहीं।" मैंने नक्शा मोड़कर अपनी पोटली में रख लिया।
"अरे, ये तो दफ़्तर का है—"
"आपके दफ़्तर ने मेरे बाप का हिसाब लिया था, शेखर बाबू। ये नक्शा उसी हिसाब का हिस्सा है।"
वो कुछ नहीं बोले। उन्होंने दराज़ बंद की, चाबी घुमाई, और मेरी तरफ़ देखा।
"मन्नू, एक बात कहूँ?"
"कहिए।"
"मैंने अपना हिसाब चुकाने के लिए तुम्हें वो काग़ज़ दिया जो तुम्हारे बाप ने छोड़ा था। मैंने तुम्हें रिकॉर्ड कमरे की कुंडी खुली रखने दी। पर अब जो होगा, उसका हिसाब मेरे सिर नहीं आएगा। मैंने जो करना था, कर दिया। मैं अपनी नौकरी और अपनी बेटी के साथ रहना चाहता हूँ।"
मैं उठा।
"शेखर बाबू, आपकी बेटी की शादी भवानी ने तोड़वाई थी। मुझे पता है।"
उनका चेहरा सख़्त हो गया।
"ये मैंने किसी को नहीं बताया।"
"बताने की ज़रूरत नहीं पड़ी। मैंने ख़ुद देखा — झामा राम की गली में। वो लड़की आज भी अपनी मौसी के घर में रहती है, और उसने भवानी के आदमियों को छत से देखा है। आप डरते हैं कि अगर आप खुलकर बोले, तो उसके साथ फिर कुछ हो जाएगा।"
शेखर बाबू की आँखें भर आईं, पर उन्होंने आँसू पोंछे नहीं।
"तुम्हारे बाप ने भी मुझे यही कहा था," वो धीरे से बोले। "अपनी बेटी बचा ले, शेखर। बाक़ी हिसाब ख़ुद चल जाएगा।"
मैंने दरवाज़ा खोला।
"आपकी बेटी सुरक्षित रहेगी। मेरा वादा है।"
वो बोले नहीं। मैं बाहर निकल आया।
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