The Token System – Chapter 102
"तीन, मन्नू, ये सबसे बड़ा। उन काग़ज़ों में मुंशी का हस्ताक्षर है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तेरे बाप का नाम भी उसमें है।"
मेरी जीभ तालू से चिपक गई।
"वो गवाह हैं या मुलज़िम?"
"मुझे नहीं पता।" उसका स्वर ईमानदार था। "पर तेरे बाप ने ये लिफ़ाफ़ा मेरे पास रखकर यही कहा था कि मैं ख़ुद हिस्सा हूँ।"
"हिस्सा!"
"मैंने सोचा था ये बोलने से तू भाग जाएगा।" शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। "तू नहीं भागा।"
मैं कुर्सी में बैठा रहा। दिमाग़ में बस एक बात घूम रही थी — मुंशी का हस्ताक्षर। पचास हज़ार के नोट। वो लिफ़ाफ़ा। टोकन।
"शेखर बाबू, मैं अब जाऊँगा। पर एक बात कहता हूँ। मेरे पास पचास हज़ार हैं जो मुंशी की तरफ़ से मिले हैं। मैं उनमें से एक नोट भी नहीं खर्च करूँगा जब तक मुझे पता न हो कि वो किसका पैसा है। मेरे टोकन में ये जो भवानी का क़तरा है — मुझे उस तक पहुँचना है।"
शेखर बाबू खड़े हुए। इस बार उनकी आँखों में वो डर नहीं था, कुछ और था जो बहुत दिनों से बंद था।
"तू रोज़ यहाँ आया कर," उन्होंने कहा। "कुंडी खुली रहेगी।"
बाहर निकला तो सूरज निकल आया था। मैं साइकिल पर बैठा और थाने पहुँचा। राजेंद्र ने मुझे दूर से देखकर ही पहचान लिया।
"क्या हुआ?"
"शेखर बाबू मिले।" मैंने एक साँस में सब बताया — काग़ज़, मुंशी की चिट्ठी, हस्ताक्षर।
राजेंद्र एक देर तक छत की तरफ़ देखता रहा।
"अगर तेरे बाप का हस्ताक्षर उन काग़ज़ों पर है," उसने कहा, "तो ये भवानी की कोई नई चाल नहीं। ये कोई पुराना गोरखधंधा है जो तेरे बाप ने आधा छोड़ा और मर गए।"
"या मारे गए।"
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा, कुछ नहीं बोला।
"राजेंद्र भाई, एक काम कीजिए। रिकॉर्ड कमरे की इमारत पर आज से एक रात का पहरा रखिए। दिखने वाला। अगर कोई काग़ज़ छेड़ने आए तो पता चले।"
"ये मैं कर सकता हूँ। पर ख़बरदार जो लिखा-पढ़ी है—"
"मैं नहीं छेड़ूँगा। शेखर बाबू से मिलकर ही।"
वो उठा। "मन्नू, एक बात। भवानी का आदमी कल स्कूल के बाहर नहीं आया। सिपाही ने बताया। पूरे दिन कोई नहीं।"
यह बात मेरे पेट में ठंडी उतर गई।
"तो वो कहाँ है?"
"यही सोच रहा हूँ।"
मैं घर लौटा। बूढ़ा बरामदे में बैठा था, हाथ में माँ का दिया हुआ गिलास। लड़का आँगन में पत्थर से लकीरें खींच रहा था। बंसी दुकान की तरफ़ जाने की तैयारी में था।
मैंने रामकिशन जाट को अलग बुलाया।
"चाचा, मुझे कुछ बताइए।" मैं उनके पास बैठा। "मुंशी जी आपके घर आते थे?"
बूढ़े का हाथ गिलास पर रुक गया।
"क्यों पूछ रहा है?"
"पूछ रहा हूँ।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगे, जैसे तौल रहे हों।
"आते थे। जाड़े में। बैठक में बैठते थे और बाहर से ताला लगाते थे। मैं अंदर नहीं जाता था। वो कहते थे — ये काग़ज़ ऐसे हैं कि देखे नहीं, बस संभाले जाएँ।"
"कौन से काग़ज़?"
"कुछ नहीं जानता।" उन्होंने गिलास रखा। "पर एक दिन जब वो जल्दी में गए तो एक पन्ना पलट गया। मैंने देखा — उस पर तुम्हारे गाँव का नाम था और एक मोहर। उस मोहर पर दो हाथी बने थे।"
मैं बैठा रह गया।
दो हाथी — वो अव्वल नंबर बस की निशानी थी। या शायद… मेरे मन ने उसे छुआ।
"चाचा," मैंने धीरे से कहा, "क्या वो मोहर भवानी के ड्राइवरों की यूनियन की थी?"
बूढ़े ने मेरी तरफ़ देखा। "मैं नहीं जानता। पर हाँ, मुंशी ने उस दिन मुझसे एक बात कही थी — 'जिस दिन ये काग़ज़ उजाले में आएँगे, उस दिन बसें रुक जाएँगी।'"
मैं उठा और आँगन में आ गया। लड़का मेरी तरफ़ देख रहा था।
"तुम्हारा नाम क्या है?" मैंने उससे पूछा।
"रवि।"
"रवि, आज स्कूल मत जा।"
"माँ पूछेगी—"
"मैं माँ को फ़ोन करूँगा। तू आज मेरी दुकान पर बैठ। बंसी के पास।"
बूढ़े ने मेरी तरफ़ देखा, आँखें भर आईं, पर कुछ नहीं बोले। बस अपने पोते का सिर सहलाया।
दोपहर को माँ ने खाना लगाया। बूढ़े के लिए अलग थाली, लड़के के लिए अलग। मैं दरवाज़े पर बैठा देख रहा था। माँ मेरे पास आई और फुसफुसाई।
"ये बूढ़ा कब तक यहाँ?"
"पता नहीं।"
"मेरा मतलब ये नहीं।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता। पर तेरे पीछे उनके जितने आदमी लगे हैं, वो इस घर को देख रहे हैं। तेरे बाप ने सब कुछ पीछे छोड़ा और चले गए। तू मैं हूँ, मुझे अकेला न छोड़।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा।
"माँ, मैं हूँ ना।"
"यही तो फ़र्क़ है," वो फिर बोली। मैं हँसा, आँखें भर आईं।
शाम को बंसी आया। उसके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था।
"क्या हुआ?"
"दुकान का शटर उठाया तो अंदर एक लिफ़ाफ़ा पड़ा था।" उसने जेब से एक सादा लिफ़ाफ़ा निकाला। "मेरे नाम का। किसी ने रात में डाल दिया।"
मैंने खोला। अंदर एक फ़ोटो थी — बंसी की दुकान का बाहर से लिया हुआ फ़ोटो, और उसके नीचे एक लाइन:
"कुछ लोग ज़्यादा बोलकर ख़ुद को बड़ा समझते हैं। दुकान प्यारी है।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
"मन्नू, ये भवानी का आदमी है।"
"पता है।" मैंने फ़ोटो अपनी जेब में रखी। "बंसी, तू अब अपनी दुकान नहीं खोलेगा।"
"तो क्या करूँ? बैठूँ?"
"हाँ। मेरी दुकान पर बैठ। मेरा सामान उठा। दुकान के पीछे एक कमरा है, वो भी ले चल।"
"मन्नू—"
"बंसी, ये पहली धमकी नहीं है। कल रात भवानी ने तेरे बारे में पूछा था राजेंद्र से। आज तेरी दुकान की फ़ोटो आई। ये क्रम है। क्रम बताता है कि अगला कदम क्या है।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा, फिर सिर हिलाया।
"तू बदल गया है," उसने कहा।
"कैसे?"
"पहले तू सोचता था कि सब ठीक हो जाएगा। अब नहीं सोचता।"
रात दस बजे घर में सब लेटे थे। लड़का बूढ़े के साथ। माँ अंदर। बंसी बरामदे में चारपाई पर, आँखें खुली। मैं छत पर गया और बैठ गया। आकाश साफ़ था, तारे गिने जा सकते थे।
मेरी जेब में टोकन था, ठंडा। मुंशी का काग़ज़ था, जेब में तह किया हुआ। शेखर बाबू की बातें थीं, दिमाग़ में। भवानी का नाम था, हर तरफ़।
मैंने काग़ज़ फिर पढ़ा। "माफ़ कर देना।" मेरा गला भर आया।
नीचे से बंसी की आवाज़ आई।
"मन्नू, सो जा। सुबह कुछ करेंगे।"
"आ रहा हूँ।"
मैं लेटा। नींद एक हल्की बात बनकर आई और टूट गई।
सुबह तक़रीबन चार बजे मेरी जेब गरम हुई।
बहुत गरम। मैंने टोकन निकाला। किनारे की लकीरें खिसक रही थीं। उन पर शब्द उभरे—
"शेखर बाबू, आज, रिकॉर्ड कमरा।"
मैंने छत की तरफ़ देखा। तारे कम हो गए थे। पूरब में पहली लकीर उभर रही थी।
मैं उठा। जेब में टोकन रखा। बंसी की चारपाई की तरफ़ देखा — वो उठकर बैठ चुका था, जैसे उसे पता था।
"क्या हुआ?" उसने पूछा।
"शेखर बाबू के पास जाना है।"
॥
रवि की आँखों में डर तैर रहा था, और सुबह की पहली किरण दरवाज़े की दरार से आँगन में आ रही थी। मैंने कमरे में झाँका — रामकिशन जाट चारपाई पर बैठे थे, और उनके हाथ अपने घुटनों पर टिके थे, जैसे कुछ भारी उठाने की तैयारी में हों। माँ रसोई में चाय की केतली रख रही थी।
"मैं जा रहा हूँ," मैंने दरवाज़े से कहा।
माँ ने पलटकर देखा।
"इतनी सुबह?"
"रिकॉर्ड कमरा। शेखर बाबू।"
वो कुछ बोलती, उससे पहले बंसी बरामदे से उठकर आ गया, उसने अपनी चादर समेटी और सिर पर हाथ फेरा।
"मैं चलूँ?"
"तू यहीं रह। दुकान पर रवि को बिठाना है। और बूढ़े को अकेला नहीं छोड़ना।"
"मन्नू—"
"बंसी, तेरी दुकान की फ़ोटो आई है। तेरा वहाँ जाना ठीक नहीं।"
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