The Token System – Chapter 1023
ताला वही था जो ऊपर वाले ताले से मिलता-जुलता था, पर छोटा। मैंने चाबी डाली। घूमी।
डब्बा खुला। उसमें सिर्फ़ एक काग़ज़ था, मुड़ा हुआ, पीली स्याही से लिखा — कौशल्या का काग़ज़, जिस पर चार नाम थे। हरि सिंह। श्रीपत। रामदीन मिस्त्री। और चौथा — सरस्वती, कौशल्या की बेटी।
चौथे नाम के नीचे एक छोटी लिखाई थी, बहुत ही महीन — "यह हिस्सा भवानी को दिया गया, सिर्फ़ इस शर्त पर कि वह अपने बाप के किए का हिसाब देगा। शर्त आज तक पूरी नहीं हुई। इसलिए हिस्सा वापस।"
मैंने काग़ज़ सीने से लगाया। ऊपर सीढ़ियों से कम्मो की आवाज़ आई — "मिल गया?"
"मिल गया।" मैंने कहा।
मैं ऊपर लौटा। बाहर आया तो सूरज ऊपर आ गया था। कम्मो ने काग़ज़ देखा, और पहली बार उसकी धुँधली आँखों में पानी दिखा।
"सरस्वती।" उसने कहा। "मेरी बहन की बेटी का नाम। तीस साल से ये नाम किसी काग़ज़ पर नहीं आया।"
बंसी ने कम्मो की तरफ़ देखा। "तो अब क्या? काग़ज़ मिल गया, पर भवानी के पास अभी भी हवेली है।"
"नहीं है।" मैंने कहा। "शर्त पूरी नहीं हुई। मतलब हिस्सा भवानी के पास है ही नहीं।"
"तो फिर उसके पास क्या है?"
"जो उसने चालीस साल में कमाया — वो भी अब नहीं। क्योंकि उसने कभी नहीं लिखा कि ये शर्त पूरी हुई।"
तभी मेरा मोबाइल बजा। सुमन का नंबर था।
"मन्नू, भवानी अस्पताल में है।" सुमन की आवाज़ तेज़ थी। "वो अमर के कमरे के बाहर खड़ा है और अमर की दवा पर रोक लगवा रहा है। दवा यहीं स्टोर में है, पर भवानी ने स्टोर का ताला बदलवा दिया है। वो कह रहा है — अगर मन्नू नींव नहीं खोलेगा तो दवा नहीं मिलेगी।"
मैंने कम्मो की तरफ़ देखा। "तुम यहीं रुको। मैं अस्पताल जा रहा हूँ।"
"लेकिन —"
"बंसी!" मैंने कहा। "चाबी और काग़ज़ कम्मो को दो। राजेंद्र, तुम यहीं रुको। गाड़ी से मैं जा रहा हूँ।"
मैं अस्पताल पहुँचा। लॉबी में भवानी खड़ा था, चारों तरफ़ उसके आदमी थे। सुमन उसके सामने खड़ी थी, हाथ में एक कार्ड।
"भवानी।" सुमन ने कहा। "दवा स्टोर से निकलेगी। चाहे वो अस्पताल का स्टोर हो या इस होम का।"
भवानी हँसा। "ये मेरा होम है, बेटा। मैं किसी को मुफ़्त दवा नहीं देता।"
"फिर लिख दो।" सुमन ने अपना कार्ड भवानी की तरफ़ बढ़ाया। "दाम मेरे वेतन से कटेगा।"
भवानी ने कार्ड नहीं लिया। "दाम काग़ज़ से चुकता है, डॉक्टर। तेरे काग़ज़ से नहीं, मन्नू के काग़ज़ से। जो काग़ज़ उसने अभी नींव से निकाला है, वो अदालत से मेरी अर्ज़ी वापस बुलाने की शर्त पर —"
"ना।" मैंने कहा।
भवानी मेरी तरफ़ मुड़ा। "तेरा काग़ज़ मेरे पास आया, तो अमर ज़िंदा रहेगा।"
"अमर ज़िंदा है।" मैंने कहा। "और तेरी शर्तों की ज़रूरत नहीं।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया। उसने भवानी की तरफ़ मुड़कर कहा — "मैं डॉक्टर हूँ, दलाल नहीं।"
और वह मुड़कर चली गई।
भवानी मेरी तरफ़ देखता रहा। उसके चेहरे पर पहली बार कुछ और था — डर नहीं, थकान।
"तेरे पापा भी ऐसे ही बोलते थे।" उसने कहा।
"मेरे पापा अब भी ज़िंदा हैं।"
"ज़िंदा हैं, पर उनका हिसाब तेरे हाथ में है। और तू वो कभी नहीं खोल पाएगा, क्योंकि तूने भी वही किया जो मैंने किया — लड़ा, हारा नहीं।"
"मैंने किसी को दबाया नहीं।"
"पर तूने भी किसी को माफ़ नहीं किया।" भवानी ने कहा। "अंतर यही है, मन्नू। मैंने हवेली छीनी। तूने हिसाब। जब हिसाब पूरा होगा, तू देखेगा — तेरे और मेरे बीच कुछ नहीं बचा, सिवा उस टोकन के।"
वह चला गया।
बाहर गाड़ी में सुमन बैठी थी। मैं बैठा। उसने गाड़ी स्टार्ट नहीं की।
"अस्पताल के पुराने स्टोर की एक चाबी मेरे पास है।" उसने कहा। "बचपन से। पापा वहाँ काम करते थे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"उस स्टोर में धूल में दबी एक पुरानी अलमारी है।" सुमन ने कहा। "मुझे याद है, एक बार पापा ने वहाँ से एक पीला काग़ज़ निकालकर मुझे दिखाया था। उस पर लिखा था — कौशल्या। मैं तब पाँच साल की थी, इसलिए नाम भूल गई थी। आज तेरी बात सुनकर याद आया।"
मैंने गाड़ी के शीशे से बाहर देखा। भवानी की गाड़ी अभी भी गेट पर खड़ी थी।
"स्टोर तीन साल से बंद है।" सुमन ने कहा। "और उसके अंदर जो रखा है, उसकी सूची किसी के पास नहीं।"
मैंने टोकन जेब से निकाला। पीतल ठंडा था। पर सत्रहवीं लकीर के नीचे नया शब्द उभर रहा था — "स्टोर।"
"चल।" मैंने कहा। "अभी।"
सुमन ने गाड़ी स्टार्ट की। सामने भवानी की गाड़ी ने रास्ता छोड़ा। और मुझे पहली बार लगा कि भवानी की गाड़ी छोटी हो गई है — जैसे उसका पहिया ही खुल गया हो।
गाड़ी अस्पताल के पिछले हिस्से की तरफ़ मुड़ी। वहाँ पुराना ब्लॉक था — जिसे अब कोई नहीं देखता, सिवाय उस रास्ते के जो सफ़ाईकर्मी रोज़ लेते थे। सुमन ने गाड़ी रोकी और बिना कुछ कहे उतर गई। मैं उसके पीछे-पीछे चला।
दरवाज़े पर ज़ंग लगी थी। सुमन ने अपनी जेब से एक चाबी निकाली — छोटी, पुरानी, जिसका रंग पीतल जैसा पीला पड़ गया था। उसने चाबी डाली और ज़ोर लगाया। ताला टूटा नहीं — खुला। जैसे वो बस इंतज़ार कर रहा था।
अंदर अंधेरा था। सुमन ने मोबाइल की रोशनी जलाई। धूल की मोटी परत हर चीज़ पर बैठी थी। दीवार के साथ लोहे के रैक थे, जिन पर दवाओं के डिब्बे सूखकर पीले पड़ गए थे। कुछ डिब्बों से बू आ रही थी — पुरानी दवा की, जो अब दवा नहीं रही।
"यहाँ कोई आता नहीं?" मैंने पूछा।
"तीन साल से ताला ही नहीं खुला।" सुमन ने आगे बढ़ते हुए कहा। "भवानी ने इसे बंद कराया था उस दिन, जब बच्चों को यहाँ से दवा मिलनी बंद हुई थी।"
आख़िरी रैक के पीछे एक अलमारी थी — लकड़ी की, काली पड़ी हुई। सुमन ने उसकी तरफ़ इशारा किया।
"यही है।"
हम दोनों ने अलमारी खींची। वह भारी थी, पहिए जाम हो चुके थे। अंदर काग़ज़ों का ढेर था। कोई फाइल नहीं, बस ढीले काग़ज़। कुछ फटे, कुछ पर पानी की छाप। सुमन ने एक-एक उठाकर देखना शुरू किया।
"ये तो खाली रसीदें हैं।" उसने कहा।
"वो रहने दे।" मैंने कहा। "पीला काग़ज़ ढूँढ।"
उसके हाथ रुक गए। नीचे से उसने एक काग़ज़ खींचा — पीला, जिसका कोना जल चुका था, और जिस पर किसी ने मोटे अक्षरों में कुछ लिखा था। उसने मेरी तरफ़ बढ़ाया।
सिर्फ़ एक नाम नहीं था वहाँ। नाम के नीचे एक तारीख़ थी, और तारीख़ के नीचे लिखा था — "दवा सौंपी गई। मुफ़्त।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। "दवा? ये कौशल्या की दवा का रिकॉर्ड है?"
सुमन ने काग़ज़ ध्यान से पढ़ा। "नहीं।" उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "ये रसीद नहीं है। ये एक सूची है — उन बच्चों के नाम, जिन्हें इस होम ने लिया था, और जिनके नाम पर सरकार से पैसा आता था।"
"तो?"
"तो इसमें कौशल्या का नाम है, पर उसके आगे लिखा है — पंद्रह साल की उम्र में भवानी के घर भेजी गई।" सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "उसकी उम्र पंद्रह साल थी, मन्नू। और ये सूची किसी सरकारी दफ़्तर में नहीं गई। ये यहीं दबी रही।"
मैंने काग़ज़ उसके हाथ से लिया। पीछे की तरफ़ कुछ और लिखा था — बहुत छोटे अक्षरों में, जैसे कोई जल्दी में लिखकर भाग गया हो।
"पढ़।" सुमन ने कहा।
"अगर ये सूची बाहर आई, तो भवानी नाम बदल देगा, जैसे उसने पहले बदले। इसलिए सबूत यहीं रख रहा हूँ, दूसरे स्टोर में। भवानी को पता नहीं। जो इसे पढ़े, वो अमर को बताए।"
नीचे एक दस्तख़त थे — जो अब मैं पहचानता था। मेरे पापा के।
मेरा हाथ काँपा। सुमन ने मुझे देखा, पर कुछ नहीं कहा।
"उन्हें पता था।" मैंने कहा। "वो इस स्टोर में काम करते थे, उन्हें सब पता था, और उन्होंने कुछ नहीं किया —"
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