The Token System – Chapter 1024
"उन्होंने किया।" सुमन ने काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया। "उन्होंने बताने की कोशिश की। पर जिसे बताना था, वो अमर थे। और अमर हादसे में चले गए।"
"तो मतलब ये काग़ज़ चालीस साल से यहाँ —"
"और भवानी को पता है कि ये काग़ज़ है।" सुमन ने कहा। "इसीलिए उसने स्टोर का ताला बदला। उसे नहीं पता कहाँ है, पर उसे पता है कि है।"
तभी बाहर किसी के जूतों की आवाज़ आई। सुमन ने फौरन काग़ज़ अपनी जैकेट में रखा। मैंने मोबाइल की रोशनी बंद कर दी।
दरवाज़े की तरफ़ से आवाज़ आई — "अंदर कौन है?"
सुमन ने मेरी आँखों में देखा। फिर उसने अपनी आवाज़ सख़्त करके कहा — "डॉक्टर सुमन। अस्पताल का स्टोर चेक कर रही हूँ। तुम कौन हो?"
दरवाज़ा खुला। एक सिक्योरिटी गार्ड था, हाथ में टॉर्च। उसके पीछे एक और आदमी — जिसे मैंने पहचाना। भवानी के साथ लॉबी में खड़ा था।
"मैडम, आपको यहाँ आने की इजाज़त नहीं है।" गार्ड ने कहा।
"ये होम का स्टोर है।" सुमन ने कहा। "और मैं होम की डॉक्टर हूँ।"
"भवानी साहब —"
"भवानी साहब अस्पताल के मालिक नहीं हैं।" सुमन ने कहा। "वो सिर्फ़ ट्रस्ट के सदस्य हैं, और आज उनकी सदस्यता भी सवालों के नीचे है।"
गार्ड ने पीछे खड़े आदमी की तरफ़ देखा। वो आदमी कुछ कहने ही वाला था कि मैंने कहा — "तुमने भवानी का हुक्म मानकर दवा रोकी। अमर की दवा। अगर अमर को कुछ हुआ, तो तुम हो सीधे ज़िम्मेदार। तुम्हारा नाम क्या है? मैं लिख लेता हूँ।"
गार्ड की टॉर्च का रुख़ बदला। "सर, मैंने कुछ नहीं किया। मुझे तो हुक्म मिला था —"
"किसका हुक्म?"
"भवानी साहब का।"
"तो जाकर भवानी साहब से कहो — काग़ज़ नहीं मिला।" मैंने कहा।
आदमी ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर सोच थी — सोच कि किसकी तरफ़ खड़ा हो। फिर उसने गार्ड को इशारा किया और वे दोनों पीछे हट गए। दरवाज़ा खुला रह गया।
सुमन ने साँस रोकी हुई थी। "अगर उसने देख लिया होता —"
"उसने देख लिया तो क्या?" मैंने कहा। "ये काग़ज़ अब बाहर आएगा।" मैंने जैकेट की तरफ़ देखा। "पर एक बात समझ नहीं आई। भवानी ने चालीस साल में इस स्टोर के काग़ज़ क्यों नहीं जलाए? वो तो सब जला देता है।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "क्योंकि ये काग़ज़ उसके लिए भी ज़रूरी था।"
"कैसे?"
"सोच।" उसने कहा। "सूची में कौशल्या का नाम है। मतलब भवानी के पास पंद्रह साल की एक लड़की भेजी गई। अगर वो लड़की भवानी के घर से भागी, तो भवानी पर इल्ज़ाम आता। पर अगर वो लड़की कहीं और रहने लगी, तो भवानी को कुछ नहीं।"
"तो वो काग़ज़ भवानी के लिए सबूत है — कि उसने कौशल्या को नहीं रखा, किसी और ने रखा।"
"हाँ।" सुमन ने कहा। "और इसीलिए उसने इसे जलाया नहीं — वो इसे छुपाता रहा। अपने बचाव के लिए।"
मैं स्टोर में खड़ा सोचता रहा। चालीस साल का खेल एक काग़ज़ में सिमटा हुआ था, और वो काग़ज़ अब मेरी जैकेट में था।
बाहर निकलते वक़्त सुमन ने स्टोर का दरवाज़ा बंद किया, पर ताला नहीं लगाया।
"ताला क्यों नहीं लगा रही?"
"क्योंकि अब ये स्टोर बंद नहीं रहेगा।" उसने कहा।
गाड़ी में बैठकर सुमन ने चाबी घुमाई। इंजन की आवाज़ आई। सामने भवानी की गाड़ी अब भी गेट पर खड़ी थी, पर मुझे लगा कि उसका ड्राइवर हमारी तरफ़ देख रहा है।
"एक बात है।" सुमन ने कहा। "वो काग़ज़ जो मैंने तुम्हें दिखाया — उससे मुझे कुछ और याद आया।"
"क्या?"
"पापा ने एक बार कहा था — स्टोर में दो हिस्से हैं। बाहर वाला दवाओं का, और अंदर वाला जिसका दरवाज़ा अलमारी के पीछे है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "हमने अलमारी हटाई, पर पीछे कुछ नहीं था।"
"इसलिए कि अलमारी पूरी नहीं हटी।" सुमन ने कहा। "उसके नीचे एक और तख़्ता है। मुझे अब याद आ रहा है।"
मैंने गाड़ी का दरवाज़ा खोला। "तो चल, वापस चलते हैं।"
"नहीं।" सुमन ने कहा। "अब नहीं। भवानी के आदमी वहाँ हैं। हमें दिन में जाना होगा, जब सब देख रहे हों। रात में कुछ नहीं होगा।"
मैं बैठ गया। बात सही थी।
"तो अब?" मैंने पूछा।
"अब वो।" सुमन ने काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया। "ये काग़ज़ अमर तक पहुँचना चाहिए। वो ही इसका सही इस्तेमाल कर सकते हैं।"
"अमर अस्पताल में हैं।"
"तो कल सुबह सबसे पहले अमर से मिलेंगे।" सुमन ने कहा। "और तब तक — भवानी को पता नहीं कि काग़ज़ हमारे पास है।"
गाड़ी चली। रास्ते में मैंने मोबाइल निकाला और कम्मो को संदेश भेजा — "काग़ज़ मिल गया। कुछ और भी है। सुबह बताऊँगा।"
जवाब तुरंत आया — "बंसी कह रहा है, राजेंद्र ने भवानी का एक आदमी हवेली के पीछे देखा है। वो कुछ ढूँढ रहा था।"
मैंने सुमन को बताया। उसने गाड़ी की रफ़्तार बढ़ाई।
"भवानी को शक है।" उसने कहा। "वो हवेली में कुछ ढूँढ रहा है — शायद वही काग़ज़।"
"पर वो काग़ज़ स्टोर में था।"
"भवानी को ये नहीं पता।" सुमन ने कहा। "उसे लगता है कि काग़ज़ हवेली में है, क्योंकि वहीं से सब शुरू हुआ था।"
मैंने टोकन जेब में महसूस किया। वो ठंडा था। पर सत्रहवीं लकीर के नीचे अब एक और शब्द जुड़ गया था, जो पहले नहीं था। मैंने उसे पढ़ा — "अंदर।"
"सुमन।" मैंने कहा। "तुम्हारे पापा ने अंदर वाले हिस्से में क्या रखा था, कभी बताया?"
उसने मेरी तरफ़ देखा। "एक बार कहा था — जो चीज़ें ऊपर वालों को देनी होती हैं, वो बाहर रखी जाती हैं। और जो चीज़ें किसी को नहीं देनी होतीं, वो अंदर।"
"मतलब?"
"मतलब, अंदर वो काग़ज़ हैं जो किसी सरकारी दफ़्तर तक नहीं पहुँचने चाहिए थे।" सुमन ने कहा। "जैसे ये।" उसने जैकेट पर हाथ रखा।
गाड़ी हवेली के गेट पर रुकी। बंसी बाहर खड़ा था। राजेंद्र भी। कम्मो दरवाज़े पर।
मैं उतरा। बंसी ने कहा — "वो आदमी चला गया। पर कुछ लेकर नहीं गया। हमने देखा, वो सिर्फ़ दीवारें टटोल रहा था।"
"दीवारें?" सुमन ने कहा।
"हाँ।" बंसी ने कहा। "जैसे कुछ छुपा हो।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने काग़ज़ उसके हाथ से लिया और कम्मो की तरफ़ बढ़ाया।
"ये रखो।" मैंने कहा। "किसी को मत बताना, कहाँ रखा है।"
कम्मो ने काग़ज़ लिया। उसके हाथ हल्के काँप रहे थे। "मन्नू, ये सच में —"
"सच में।" मैंने कहा। "पर अभी ये काग़ज़ किसी काम का नहीं, जब तक अमर इसे नहीं देखते।"
कम्मो ने सिर हिलाया और अंदर चली गई।
रात बारह बजे के करीब सब लोग आँगन में बैठे थे। सुमन चाय बना रही थी। मैंने सुमन से कहा — "कल सुबह तुम्हें अस्पताल जाना है, और मुझे —"
"तुम मेरे साथ चलोगे।" सुमन ने कहा। "अकेली नहीं जाऊँगी। भवानी कुछ भी कर सकता है।"
"और अंदर वाला हिस्सा?"
"दोपहर में।" सुमन ने कहा। "पहले अमर, फिर स्टोर।"
मैंने सिर हिलाया। तभी सुमन ने चाय का कप मेरी तरफ़ बढ़ाया और कहा — "एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"तुम्हारे पापा ज़िंदा हैं। भवानी ने कहा था। तुमने कभी उनसे मिलने की कोशिश क्यों नहीं की?"
मैंने चाय की तरफ़ देखा। "की थी। तीन साल पहले। जब मुझे पता चला कि वो ज़िंदा हैं। पर जिस पते पर गया, वहाँ एक बूढ़ा आदमी मिला जो कहता रहा — 'वो नहीं आता।'"
"और फिर?"
"फिर मैंने दो बार और कोशिश की। तीसरी बार वो आदमी नहीं था। घर खाली था। लोगों ने कहा — चला गया।" मैंने चाय का घूँट लिया। "किसी ने नहीं बताया कहाँ।"
सुमन कुछ देर चुप रही। फिर बोली — "कल अमर से पूछेंगे। शायद उन्हें पता हो।"
आँगन की लाइट अचानक बंद हुई। फिर जल गई। सबने ऊपर देखा। तार हिल रहा था।
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