The Token System1018 / 1154

The Token System – Chapter 1018

7 min read November 6, 2026

भवानी चुपचाप आ गया था। उसने दरवाज़े पर खड़े होकर कहा, "अमर की दवा ऊपर की शेल्फ़ पर है। पर वो तेरे हाथ नहीं लगेगी।"

"क्यों?"

"क्योंकि इस कमरे की चीज़ों का हिसाब उस आदमी से जुड़ा है जिसके पास टोकन है।" श्रीपत मुड़ा। "तू टोकन लेकर आया है। तू अंदर आ सकता है। अगर टोकन छोड़ दे, तो दवा उठा ले।"

मैंने भवानी को देखा। वह दरवाज़े की चौखट पर टिका था, चेहरे पर कुछ नहीं।

"ये टोकन मेरा नहीं है।" मैंने कहा। "अमर ने दिया था।"

श्रीपत हँसा। "अमर ने दिया था, या अमर का बाप ने रखा था उसकी जेब में? फ़र्क़ कर ले।"

"फ़र्क़ यही है कि अमर ने अपने हाथ से मेरी हथेली पर रखा था। बोलते हुए। होश में।"

श्रीपत ने लाठी की नोक ज़मीन पर टिकाई। "अच्छा। तो एक और बात सुन ले। अमर का हिसाब इसी टोकन पर टिका है। तू इसे जेब में रखकर घूम रहा है — मतलब तू उसका हिसाब अपनी जेब में बंद करके बैठा है। और जो हिसाब बंद होता है, उसका दम घुटता है। तुझे लगता है तू अमर को बचा रहा है? तू उसे धीरे-धीरे मार रहा है।"

मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए। भवानी ने पहली बार आवाज़ दी। "बाप की बात में दम है।"

"तू चुप रह।" मैंने उसकी तरफ़ देखे बग़ैर कहा। "तेरे हिसाब का भी तो यही हाल है।"

श्रीपत ने शेल्फ़ की तरफ़ इशारा किया। "दवा वहाँ है। तीन शीशियाँ। अमर के लिए दो हफ़्ते का हिसाब। देख ले, गिन ले, अपनी आँख से।"

मैंने गर्दन उठाकर देखा। ऊपर वाली शेल्फ़ पर नीले ढक्कन वाली तीन शीशियाँ रखी थीं, उनके नीचे एक पीला कार्ड जिस पर मरीज़ का नाम और तारीख़ लिखी थी।

"दिख गई?" श्रीपत बोला। "अब सुन। ये दवा यहाँ से निकलेगी तो एक ही शर्त पर — तू अपने टोकन का हिसाब छोड़कर जा।"

"हिसाब कैसे छोड़ूँ? मैं तो जानता भी नहीं कि चलता कैसे है।"

श्रीपत ने लाठी हिलाई, जैसे स्कूल का मास्टर लकड़ी घुमाता है। "वही तो। तू टोकन लेकर घूमता है और उसका हिसाब नहीं जानता। बता दूँ?"

वह रैक के पास गया और एक स्टूल खींचकर बैठ गया। भवानी दरवाज़े पर खड़ा रहा, हिला नहीं।

"हर काम के बदले तीन हिस्से होते हैं।" श्रीपत ने उँगली उठाई। "एक हिस्सा उसके हाथ में जाता है जो काम करता है। दूसरा हिसाब में रहता है। और तीसरा —" उसने उँगली नीचे की। "तीसरा उस पर खर्च होता है जिसका इस काम में कुछ नुक़सान हुआ है। किसी का वक़्त, किसी की ज़मीन, किसी की नींद, किसी की साँस।"

मैंने कहा, "और तेरे हर काम में तीसरा हिस्सा किसकी जेब में गया?"

श्रीपत की उँगली हवा में रुक गई।

"बोल।" मैंने कदम बढ़ाया। "तेरे हर काम में तीसरा हिस्सा उस आदमी की जेब में गया जिसका नुक़सान हुआ? या अपनी जेब में? क्योंकि जब मैंने वो टोकन देखा था, तेरे हिसाब में तीसरा हिस्सा कहीं नहीं दिखा। सिर्फ़ दो हिस्से दिखे — तेरा और हिसाब का। तीसरा तू खा गया।"

भवानी ने दरवाज़े की चौखट छोड़ दी। एक कदम अंदर आया।

श्रीपत का चेहरा कड़ा हो गया। उसने लाठी उठाई, फिर धीरे से नीचे रखी। "तेरे बाप ने भी यही सवाल पूछा था।" उसकी आवाज़ बदली। "चौबीस साल पहले। उसी कमरे में। और उसके बाद वो शहर छोड़कर गया।"

"तो तूने उसे भगाया नहीं, उसने ख़ुद छोड़ा?"

"मैंने उसे रास्ता दिखाया।" श्रीपत ने आँखें उठाईं। "उसने कहा था — मुझे ऐसा हिसाब नहीं चाहिए। मैंने कहा — फिर हिसाब तुझे नहीं, तेरे बेटे को मिलेगा। और वो चला गया।"

मेरी साँस रुक गई। मैंने पीछे खड़े भवानी की तरफ़ देखा। उसने नज़रें नहीं मिलाईं।

"तू झूठ बोल रहा है।" मैंने कहा।

"बोलता तो झूठ कभी नहीं।" भवानी ने कहा। आवाज़ सपाट। "मैं तेरे बाप का दोस्त था। उसने मुझे छोड़ा, मैंने उसे नहीं छोड़ा।"

श्रीपत ने शेल्फ़ की तरफ़ देखा। "अब फ़ैसला तेरा। दवा यहाँ है। तीन शीशी। मैं कह रहा हूँ — ठंडा टोकन मेज़ पर रख दे, दवा ले जा। तेरा टोकन वैसे भी अधूरा है। उसका हिसाब किसी और के पास है। उसे पूरा होने दे।"

"नहीं।" मैंने कहा।

"नहीं?" श्रीपत ने भौंहें चढ़ाईं। "अमर की जान का सवाल है।"

"अमर की जान का सवाल है, इसलिए मैं इस टोकन को तेरे हाथ में नहीं दूँगा।" मैंने कमरे के बीच में कदम रखा। "तूने ये टोकन भवानी से छीना था, भवानी ने किसी और से। जिस दिन ये टोकन तेरे पास आया, उस दिन से हर हिसाब में एक हिस्सा किसी गरीब की जेब से गायब होता आया है। अब नहीं।"

श्रीपत उठ खड़ा हुआ। लाठी उसके हाथ में काँपी।

भवानी ने अचानक कहा, "दवा दे दे।"

दोनों ने उसकी तरफ़ देखा।

"दवा दे दे।" भवानी ने दोहराया। "टोकन अभी नहीं। टोकन का हिसाब कल अदालत में खुलेगा। पर दवा आज दे। बच्चा मरेगा तो हिसाब किस पर बैठेगा — तुझ पर या मुझ पर, ये कल जज तय करेगा। पर आज ये दवा ऊपर से उतरेगी।"

श्रीपत ने भवानी को देखा। देर तक देखा। फिर उसने लाठी से शेल्फ़ की तरफ़ इशारा किया।

"ले।"

मैंने स्टूल खींचा, चढ़ा, तीनों शीशियाँ उठाईं। ठंडी थीं, काँच पर उमस जमी थी। पीला कार्ड भी उतारा — उस पर अमर का नाम था, और मरीज़ की तारीख़।

नीचे उतरा तो भवानी ने हाथ बढ़ाया। "कार्ड मुझे दे।"

"क्यों?"

"क्योंकि इस कमरे से जो निकले, उसका हिसाब मेरे दफ़्तार में दर्ज होना चाहिए।" उसकी आवाज़ में वही पुरानी लय लौट आई थी। "वरना कल अदालत में यही कार्ड तेरे ख़िलाफ़ होगा — कहेगा, मन्नू ने दवा चुराई।"

मैंने कार्ड जेब में रख लिया। "कल अदालत में यही कार्ड मेरी तरफ़ से पेश होगा। और उस पर तेरे दफ़्तार की मोहर नहीं होगी।"

भवानी ठिठका।

श्रीपत ने घड़ी देखी। "अब जा। तेरी गाड़ी बाहर खड़ी है। और सुन —" उसने लाठी की नोक मेरी तरफ़ उठाई। "कल अदालत में जो भी हो, आज रात दोनों टोकन एक ही शहर में जागेंगे। दोनों एक दूसरे को खींचेंगे। जो पहले बुझेगा, उसका हिसाब दूसरे पर चढ़ेगा। मैंने तुझे बता दिया। अब तेरा हिसाब, तेरा फ़ैसला।"

बाहर निकला तो धूप सिर पर पड़ी। मैंने साँस ली। राजेंद्र गाड़ी के पास खड़ा था, हाथ में मोबाइल।

"सुमन का फ़ोन था।" उसने कहा। "अमर की हालत रात से ठीक है, पर डॉक्टर कह रही हैं — दवा देर से पहुँची तो दिक्कत हो सकती है।"

मैंने शीशियाँ उसकी तरफ़ बढ़ाईं। "लेकर चल। सीधा अस्पताल।"

गाड़ी में बैठे तो राजेंद्र ने पीछे मुड़कर देखा। भवानी और श्रीपत दोनों उस गली के मोड़ पर खड़े थे। श्रीपत लाठी पर टेक लगाए, और भवानी उसके बगल में, हाथ जेब में।

"ये दोनों साथ खड़े हैं।" राजेंद्र ने कहा। "ये अच्छी बात नहीं।"

गाड़ी चली। मैंने पीछे देखा — दोनों अब भी वहीं थे, छोटे होते जा रहे थे।

अस्पताल पहुँचे तो सुमन इमरजेंसी के बाहर खड़ी थी। मैंने शीशियाँ उसके हाथ में रखीं। उसने ढक्कन खोलकर सूँघा, कार्ड देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा।

"ये दवा तीन महीने पुरानी है।" उसने कहा। "एक्सपायरी अगले महीने है। चलेगी।"

"बस चल जाए।"

सुमन ने नर्स को बुलाया और शीशियाँ दे दीं। फिर मेरी तरफ़ मुड़ी। "तूने ये कैसे निकाला?"

"बाद में।" मैंने कहा। "पहले बता — अमर होश में है?"

"होश में है, पर कमज़ोर है। बोल नहीं पा रहा। हाथ हिला रहा है।"

मैं वार्ड में गया। अमर चारपाई पर लेटा था। चेहरा पीला, आँखें धँसी हुईं। मेरी तरफ़ देखा तो उसके होंठ हिले।

मैंने कुर्सी खींचकर पास बैठा। "दवा आ गई। अब ठीक होगा।"

वह सिर हिलाने की कोशिश करने लगा। फिर उसने हाथ उठाया और मेरी जेब की तरफ़ इशारा किया।

"क्या?"

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