The Token System – Chapter 1019
वह फिर इशारा करने लगा। मैंने जेब से टोकन निकाला। उसकी आँखें टोकन पर टिक गईं। होंठ हिले — कोई शब्द नहीं निकला, पर मैंने होठों का आकार पहचान लिया।
"तीन।"
अमर ने सिर हिलाया। फिर उसने उँगली उठाकर मेरी तरफ़ इशारा किया, फिर अपनी तरफ़, फिर आसमान की तरफ़।
"तीन क्या?" मैंने पूछा। "तीन टोकन?"
उसने सिर हिलाया — ना में। फिर उसने तीन उँगलियाँ दिखाईं और उनमें से एक मोड़ दी।
मुझे कुछ समझ नहीं आया। सेक्रेटरी ने कहा, "वो थक गया है। बाद में।"
मैं उठा। दरवाज़े पर सुमन खड़ी थी। उसने मुझे बाहर इशारा किया।
"एक बात।" उसने धीरे से कहा। "तेरे टोकन पर आज सुबह से कोई नई लकीर नहीं उभरी?"
मैंने टोकन जेब से निकाला। उसमें सोलह लकीरें थीं — वही जो कल थीं। कोई नई नहीं।
"नहीं।"
"अजीब है।" सुमन ने कहा। "श्रीपत ने कहा — आज रात एक टोकन बुझेगा। अगर तेरे टोकन पर कुछ नहीं उभर रहा, तो मतलब हिसाब तेरे टोकन पर नहीं, दूसरे पर चल रहा है।"
"यानी?"
"यानी इस वक़्त जो हिसाब चल रहा है, वो तेरा नहीं है। और जिसका है, उसका हिसाब पूरा होने वाला है।"
मैंने टोकन मुट्ठी में बंद किया। पीतल ठंडा था।
बाहर बरामदे में बंसी आया, हाथ में चाय का गिलास। उसने गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया। "पी। चेहरा देख रहा हूँ तेरा।"
मैंने गिलास लिया। "बंसी, आज रात हमें हवेली के पास रुकना है।"
"क्यों?"
"क्योंकि श्रीपत ने कहा — दोनों टोकन एक शहर में जागेंगे, एक दूसरे को खींचेंगे। अगर एक बुझा, तो दूसरे पर हिसाब चढ़ेगा।"
बंसी ने चाय का घूँट लिया। "मतलब रात को खेल होगा।"
"मतलब रात को सब तय होगा।"
शाम को मैं घर पहुँचा। माँ चूल्हे पर रोटी बना रही थी। पीछे के कमरे से रीना की आवाज़ आ रही थी — किसी से फ़ोन पर बात कर रही थी।
मैंने माँ के पास बैठकर कहा, "माँ, आज रात मुझे हवेली के पास रुकना है।"
माँ ने तवा नहीं उठाया। बस रोटी पलटी। "क्यों?"
"श्रीपत ने कहा — एक टोकन बुझेगा।"
माँ ने तवा उतार दिया। मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था — डर नहीं, थकान।
"तेरे पापा ने भी एक रात ऐसा ही कहा था।" उसने कहा। "और वो अगली सुबह घर नहीं लौटे।"
"मैं लौटूँगा।"
"लौटना ही सब कुछ नहीं होता।" माँ ने रोटी प्लेट में रखी। "लौटकर भी आदमी वही नहीं रहता जो जाता है।"
वह उठकर पानी का गिलास लेने गई। मैंने उसका पीछा नहीं किया।
रात नौ बजे मैं, बंसी और राजेंद्र हवेली के पीछे वाली गली में पहुँचे। हवा ठंडी थी, और चाँद आधा छिपा था। हवेली के पिछले दरवाज़े पर ताला लगा था, पर ताला नया था।
"ये ताला कल नहीं था।" बंसी ने धीरे से कहा।
राजेंद्र ने आगे बढ़कर ताला छुआ। "आज सुबह का है। मोहर भी नई है।"
मैंने जेब से टोकन निकाला। हाथ में रखा। ठंडा था।
तभी — कुछ हुआ। टोकन मेरी हथेली पर गरम हुआ। धीरे-धीरे, फिर तेज़ी से। इतना गरम कि मैंने कसम खाकर उसे हथेली से हटाया।
"क्या?" बंसी ने पूछा।
"गरम हो गया।"
राजेंद्र ने टॉर्च जलाई। टोकन पर एक नई लकीर उभर रही थी — सत्रहवीं। मेरे देखते-देखते वह पूरी उभर आई। फिर लकीर के नीचे दो शब्द आए।
"हिसाब। चालू।"
बंसी ने साँस रोक ली।
मैंने पीछे देखा — गली ख़ाली थी। पर दूर, हवेली के मुख्य दरवाज़े की तरफ़ से एक रोशनी आ रही थी। किसी ने वहाँ बत्ती जलाई थी।
"वो कौन है?" राजेंद्र ने पूछा।
"पता नहीं।" मैंने कहा। "पर श्रीपत ने कहा था — दोनों टोकन एक दूसरे को खींचेंगे।"
मैंने टोकन मुट्ठी में कसकर पकड़ा। वह अब भी गरम था, पर कम।
"चल।" मैंने कहा। "देखते हैं, आज रात कौन जाग रहा है।"
हम गली के मोड़ पर पहुँचे तो रोशनी बुझ चुकी थी। हवेली का मुख्य दरवाज़ा खुला था और अंदर आँगन में एक दीया जल रहा था — छोटा, पीली मिट्टी का। उसके पास कोई नहीं था।
राजेंद्र ने टॉर्च आँगन में घुमाई। फ़र्श पर पैरों के निशान थे, ताज़े — जैसे किसी ने अभी-अभी दीया जलाकर पीछे की तरफ़ भागा हो।
मैं आँगन में गया। दीये के पास एक काग़ज़ रखा था, मुड़ा हुआ। मैंने उठाया।
उस पर मेरी ही लिखाई में एक लाइन थी — "तू सही जगह आया। अब सिर्फ़ एक टोकन बुझेगा, और वो तेरा नहीं है।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए। बंसी ने काग़ज़ पढ़ा और फुसफुसाया, "ये तेरी लिखाई है।"
"मैंने नहीं लिखी।"
"मुझे पता है।" बंसी ने काग़ज़ की तरफ़ देखा। "पर सवाल ये है — जिसने लिखी, उसने तेरी लिखाई कहाँ से चुराई?"
मैंने काग़ज़ जेब में डाला और आँगन के बीच खड़ा हो गया। ऊपर की मंज़िल की खिड़कियों से अंधेरा झाँक रहा था।
पीछे से आवाज़ आई।
"मनोहर।"
मैं मुड़ा। सीढ़ियों पर भवानी खड़ा था। अकेला। हाथ में कोई काग़ज़।
"तू यहाँ?" मैंने कहा।
वह नीचे उतरा। हर सीढ़ी पर लाठी टिकाता। आँगन में आकर रुका। "मुझे भी वही काग़ज़ मिला। बिलकुल वैसा ही।" उसने अपना काग़ज़ बढ़ाया। "पर इस पर लिखा है — 'अब सिर्फ़ एक टोकन बुझेगा, और वो भवानी का नहीं है।"
मैंने दोनों काग़ज़ मिलाए। एक ही काग़ज़ के दो टुकड़े, एक ही स्याही, एक ही मोड़।
"किसी ने ये दोनों रखे।" मैंने कहा। "और वो जानता है कि हम दोनों यहाँ आएँगे।"
भवानी ने आँगन में चारों तरफ़ देखा। "तेरे साथ कौन है?"
"बंसी और राजेंद्र।"
"अच्छा।" भवानी ने गर्दन झुकाई। "तो सुन। मैं आज यहाँ अपने हिसाब के लिए आया हूँ, तेरे हिसाब के लिए नहीं। श्रीपत ने कहा — एक टोकन बुझेगा। मुझे लगा वो मेरा होगा। अब लगता है वो किसी और का है — वो जो ये दीया जलाकर भागा।"
"कौन?"
भवानी ने सीढ़ियों की तरफ़ देखा। "मेरा दादा हरि सिंह।"
आँगन में सन्नाटा फैल गया। बंसी ने गिलास जेब में ठूँसा।
"हरि सिंह दस साल से मरा है।" मैंने कहा।
"हाँ।" भवानी ने कहा। "मरा है। पर उसका हिसाब नहीं मरा। और जिसका हिसाब न मरे, वो काग़ज़ लिखता रहता है, दीया जलाता रहता है, टोकन बुझाता रहता है।"
ऊपर, पहली मंज़िल के बंद कमरे की खिड़की में कुछ हिला। मैंने चारों तरफ़ देखा। पर कुछ नहीं दिखा, सिर्फ़ फ़र्श पर दीये की लौ काँप रही थी।
राजेंद्र ने मेरा कंधा थामा। "मन्नू, देख।"
दीये के पास, जहाँ काग़ज़ पड़ा था, अब एक और चीज़ रखी थी। छोटी, मुड़ी हुई, पीतल की।
मैंने उठाई। एक छोटी चाबी थी — तीन दाँते। मेरे टोकन के कोने पर खुदे निशान से मिलता हुआ निशान उल्टा था। बिलकुल श्रीपत के टोकन जैसा, पर उलटा।
उसी वक़्त ऊपर से आवाज़ आई — हल्की, हँसी जैसी, दबी हुई।
फिर आँगन में एक पर्ची गिरी। मैंने काग़ज़ कसकर पकड़ा।
उस पर लिखा था — "तीन हिस्से, तीन दोस्त, एक हवेली। तीसरा हिस्सा आज खुलेगा। और चौथा — जो तुम सब भूल गए।"
भवानी ने पर्ची मेरे हाथ से छीन ली। पढ़कर उसका चेहरा बदल गया। वह पीछे हटा, सीढ़ियों पर रखी लाठी उठाई।
"चौथा हिस्सा?" मैंने कहा।
भवानी ने जवाब नहीं दिया। वह सीढ़ियाँ चढ़ने लगा, दो-दो पायदान एक साथ।
मैंने उसके पीछे देखा। आँगन में दीया अब भी जल रहा था। और टोकन मेरी जेब में अब भी गरम था, धीरे-धीरे, जैसे कोई दूसरा हिसाब चल रहा हो — और मेरा नहीं।
॥
मैंने पीतल की चाबी जेब में डाली और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। भवानी दो-दो पायदान चढ़ रहा था, लाठी की ठक-ठक पूरे आँगन में गूँज रही थी।
"भवानी!" मैंने आवाज़ दी।
वह रुका, पर मुड़ा नहीं।
"तेरे पास जो काग़ज़ है, वो किसी और का है। तेरे हाथ में रखा हुआ भी तेरा नहीं है। तू जानता है ना?"
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