The Token System – Chapter 1012
शेखर बाबू के दफ़्तार की मोहर।
मेरी साँस रुक गई। मैंने काग़ज़ को करीब लाकर देखा। मोहर के नीचे तारीख़ थी — दो हज़ार इक्कीस, चौथा महीना। यानी दो महीने पहले।
मैं रुक गया। मैंने भवानी की तरफ़ देखा। वो मुस्कुरा रहा था, जैसे सब तय हो गया हो।
"भवानी सिंह," मैंने कहा। मेरी आवाज़ तेज़ थी, साफ़। "यह काग़ज़ बीस साल पुराना नहीं है।"
भवानी की मुस्कुराहट वहीं रुक गई।
"यह काग़ज़ दो महीने पहले शेखर बाबू के रिकॉर्ड से निकाला गया है," मैंने कहा। "नीचे उनकी मोहर है, और तारीख़ भी। दो हज़ार इक्कीस, चौथा महीना।"
अदालत में हलचल मच गई। जज साहब ने काग़ज़ मँगवाया और खुद देखा। उन्होंने मोहर पर उँगली रखी।
"यह सही है," जज साहब ने कहा। "इस काग़ज़ पर दो हज़ार इक्कीस की मोहर है। यह बीस साल पुराना नहीं हो सकता।"
भवानी का चेहरा बदल गया। वो एक कदम पीछे हटा। उसका वकील कुछ कहने को हुआ, पर भवानी ने हाथ से रोक दिया।
"यह… यह मोहर गलती से लग गई होगी," भवानी ने कहा। उसकी आवाज़ में अब वो भरोसा नहीं था। "पुराने काग़ज़ात के साथ रखे जाते हैं…"
"तो काग़ज़ भी गलती से बदल गया?" मैंने कहा।
सक्सेना उठीं। "माई लॉर्ड, यह गंभीर बात है। अगर यह काग़ज़ नकली है, तो सवाल यह उठता है — इसे किसने बनवाया? और क्यों?"
जज साहब ने भवानी की तरफ़ देखा। "ठाकुर भवानी सिंह, आपको इस काग़ज़ के बारे में क्या कहना है?"
भवानी चुप रहा। उसके माथे पर पसीना था। उसने अपने वकील की तरफ़ देखा, पर वकील भी चुप था।
मैंने काग़ज़ को मोड़ा और अपनी जेब में रख लिया।
"यह काग़ज़ मेरे पास नहीं रहेगा," मैंने कहा। "यह अदालत की कस्टडी में जाएगा। और जिसने भी यह जाल बुना है, वो भी अंदर जाएगा।"
मैंने भवानी की तरफ़ देखा। हमारे बीच सिर्फ़ तीन कदम की दूरी थी।
"भवानी बाबू," मैंने कहा, "अब बताइए — यह काग़ज़ आपको किसने दिया?"
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब वो डर नहीं था जो कल था। कुछ और था। गुस्सा।
"तुम…" उसने धीरे से कहा, "तुम नहीं जानते कि तुमने किससे पंगा लिया है।"
"जानता हूँ," मैंने कहा। "और अब आप भी जान जाइए — यह केस आपके ख़िलाफ़ नहीं, उसके ख़िलाफ़ भी है जिसने यह काग़ज़ बनवाया।"
जज साहब ने घंटी बजाई।
"यह काग़ज़ अदालत की कस्टडी में जाएगा," उन्होंने कहा। "और इसकी जाँच होगी। सुनवाई कल तक के लिए स्थगित।"
भवानी मुड़ा और तेज़ कदमों से बाहर चला। उसके आदमी पीछे भागे। पर इस बार वो किसी से नहीं बोला।
राजेंद्र मेरे पास आया। उसका चेहरा हवा में बदल रहा था — पहले डर, फिर हैरानी, फिर हँसी। "तू… तूने यह कैसे किया? वो मोहर…"
"मैंने काग़ज़ पलटा, तो कोना दिखा," मैंने कहा। "बस एक बार देखा, और सब साफ़ हो गया।"
सक्सेना पास आईं। उन्होंने मेरी जेब की तरफ़ देखा। "काग़ज़ अदालत को देना होगा। मैं जानती हूँ यह तुम्हारे पास है।"
"दूँगा," मैंने कहा। "पर पहले मुझे एक बात जाननी है — शेखर बाबू के रिकॉर्ड से यह काग़ज़ किसने निकाला?"
सक्सेना ने अपनी पीली फ़ाइल खोली। "मैंने आज सुबह उन्हें फ़ोन किया था। उनका कहना है कि यह काग़ज़ उनके दफ़्तार से चोरी हुआ था — दो महीने पहले। और उन्होंने अभी तक पुलिस में शिकायत नहीं की।"
"क्यों नहीं की?"
सक्सेना ने मेरी तरफ़ देखा। "क्योंकि उन्हें डराया गया था। किसी ने उन्हें कहा था कि अगर वो चुप नहीं रहे, तो उनका दफ़्तार बंद करवा दिया जाएगा।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए। "कौन?"
"शेखर बाबू ने नाम नहीं बताया," सक्सेना ने कहा। "पर उन्होंने यह ज़रूर कहा कि वो आदमी भवानी का नहीं था। कोई और था, जिसके लिए भवानी भी काम कर रहा था।"
मैं वहीं खड़ा रह गया। भवानी भी किसी के लिए काम कर रहा था?
बाहर आकर पापा ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी आँखें लाल थीं, पर इस बार आँसू नहीं थे। "बेटा, तूने आज मेरी इज़्ज़त बचा ली।"
"बापू, इज़्ज़त आपने कमाई है," मैंने कहा। "मैंने तो बस सच बोला।"
राजेंद्र ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "कल भवानी वो आदमी का नाम बताएगा या नहीं?"
"नहीं बताएगा," मैंने कहा। "वो खुद डरा हुआ है। पर अब हमें उस आदमी तक पहुँचना है — वो कौन है जिसके लिए भवानी भी काम करता है।"
मैंने जेब से टोकन निकाला। वो ठंडा था। उस पर कोई नया शब्द नहीं उभरा था। बस एक हल्की गरमाहट किनारे पर, जैसे कोई चीज़ अंदर से जाग रही हो।
मैंने उसे मुट्ठी में बंद किया। सामने सड़क पर भवानी की गाड़ी धूल उड़ाती निकल गई। और मुझे लगा कि यह लड़ाई अब सिर्फ़ ज़मीन की नहीं, किसी बड़े खेल की हो गई है जिसमें भवानी सिर्फ़ एक मोहरा था।
॥
भवानी का वह गुस्सा क्षण भर में उतर गया। उसने पीछे कदम खींचा, अपने दो आदमियों की तरफ़ देखा और सिर के इशारे से कुछ कहा। दोनों आगे बढ़े।
राजेंद्र की सीटी बजी। दो सिपाही सीढ़ियों से ऊपर आ चुके थे और एक नीचे के दरवाज़े पर खड़ा हो गया। भवानी के आदमी बीच में फँस गए।
"यह काग़ज़ मेरी जानकारी में नहीं है," भवानी ने ज़ोर से कहा, ताकि पूरा बरामदा सुन ले। "मेरे दफ़्तार से कोई काग़ज़ उठाकर यहाँ लाया है। मुझे धोखा दिया गया है। मेरा इससे कोई वास्ता नहीं।"
"बयान अदालत में दीजिए, ठाकुर साहब," राजेंद्र ने कहा।
भवानी का वकील पीछे से आया। उसने भवानी का कंधा पकड़ा, उसे कोने में खींचा और धीरे से बोला, "ठाकुर साहब, अब सुनिए। यह काग़ज़ अदालत की कस्टडी में है। अब इसकी जाँच होगी। अगर इसमें किशन के हस्ताक्षर की नक़ल साबित हुई, तो यह जालसाज़ी का मुकदमा बन जाएगा। और सबूत की कड़ी सीधे आपके दफ़्तार से जुड़ी है।"
"तुम मुझे डरा रहे हो?" भवानी ने दाँत भींचकर कहा।
"मैं वकील हूँ," वकील ने कहा। "मेरा काम आपको सच बताना है। आपको अब ख़ुद जवाब देना पड़ेगा। वो भी इसी अदालत में।"
भवानी ने वकील की तरफ़ से नज़र हटा ली। उसने एक बार मेरी तरफ़ देखा। फिर सीढ़ियों की तरफ़ चला। उसके आदमी रास्ता साफ़ करते चले।
राजेंद्र ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "जा। पापा को ले जा। यहाँ देर ठीक नहीं।"
मैंने पापा का हाथ पकड़ा। वो सीढ़ियों तक चुपचाप चले पर नीचे उतरते-उतरते उनका हाथ और ज़ोर से मेरी बाँह पर चिपक गया।
"बेटा," पापा ने गली के मोड़ पर कहा, "मैंने कभी कोई काग़ज़ नहीं साइन किया। नशे में भी नहीं। मुझे नशा ही नहीं करता। तू जानता है।"
"जानता हूँ, बापू," मैंने कहा। "वो काग़ज़ दो महीने पुराना है। उस पर शेखर बाबू के दफ़्तार की मोहर है।"
पापा रुक गए। "मोहर?"
"हाँ। जिस कमरे में वो काग़ज़ रखा था, वहाँ दो महीने पहले किसी ने हाथ लगाया। और वो कोई भवानी का आदमी नहीं था।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ टूटा सा दिखा। "तो फिर कौन?"
"यही मैं जानना चाहता हूँ," मैंने कहा। "और मुझे लगता है यह सूत्र शेखर बाबू के पास ही है।"
मैंने मोबाइल निकाला। सुमन को फ़ोन लगाया। दो घंटी बजी और आवाज़ आई।
"शेखर बाबू कहाँ हैं?" मैंने सीधा पूछा।
"अस्पताल में ही हैं," सुमन ने कहा। "पर मन्नू, वो कुछ बताना चाहते हैं। सुबह से काग़ज़ों का बंडल गोद में रखे बैठे हैं और किसी से कुछ कहते नहीं। बस तुम्हारा नाम ले रहे हैं।"
"मैं आ रहा हूँ," मैंने कहा। "और सुमन, एक काम कीजिए — उनके केबिन के बाहर किसी को बैठा दीजिए। कोई भी अंदर न जाए।"
"पहले से बैठा हुआ है," सुमन ने कहा। "लक्ष्मी को बैठा दिया है।"
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